कथित “कल्याणकारी राज्य” सरकार के उस पुराने सिद्धांत को दिया गया नया नाम है, जिसके अनुसार योजनाकार या सरकारी अधिकारी, सभी परिस्थितियों में, जनता के भौतिक (आर्थिक) कल्याण की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लेते हैं. सरकार के आर्थिक क्षेत्र में किए गए कार्य स्वाभाविक रूप से मानव जीवन से जुड़े अन्य पहलुओं को भी प्रभावित करते हैं, जो कई मामलों में अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं. कल्याण की धारणा दो मूल विचारों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती है—संपत्ति और समानता. ये दोनों विचार कभी पूरी तरह एक-दूसरे से मेल नहीं खाते. कल्याणवाद को लागू करते समय अक्सर स्वतंत्रता और संपत्ति — इन दोनों का त्याग करना पड़ता है. मानव जीवन के विकास का मूल सिद्धांत यह रहा है कि पहले जीवन का अधिकार, फिर स्वतंत्रता का अधिकार, और उसके बाद संपत्ति का अधिकार सुनिश्चित किया जाए.
कल्याणवाद के पैरोकार जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देने के नाम पर संपत्ति के अधिकार को बर्बाद कर देते हैं. लेकिन जनता को अधिक सुख-सुविधा देने की प्रक्रिया के दौरान वे उस स्वतंत्रता को छीन लेते हैं जिसका आश्वासन उन्हें दिया गया होता है. यह विषय गहरा है क्योंकि यह मनुष्य की गरिमा और आत्मसम्मान से जुड़ा है. सरकार का ये काम नहीं है कि वह एक व्यक्ति की स्वतंत्रता कम करके दूसरे की स्वतंत्रता बढ़ाए. कल्याणवाद का भ्रम मुख्य रूप से इस बात में निहित है कि वह सबको एक साथ पूरी तरह स्वतंत्र बनाने का वादा करता है.
समानता के समर्थकों द्वारा विकसित कल्याणकारी राज्य अपने आप में एक विरोधाभास है. संघीय इकाइयां कानून के तहत कुछ विशेष वर्गों—जैसे किसान, कारखाना मजदूर, उपभोक्ता—को अलग और विशेष लाभ देती हैं, ताकि समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संतुलन बनाए रखा जा सके. जब राज्य सरकारें कुछ समूहों को आगे बढ़ाती हैं, तो केंद्र सरकार दूसरों को पीछे खींचती है.
कल्याण अपने आप में एक लक्ष्य है, न कि किसी और लक्ष्य को पाने का साधन. भारत में कल्याणवादी केवल इस लक्ष्य की प्राप्ति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे ऐसी कठोर नीतियों का समर्थन करते हैं जो उनके अनुसार कल्याणकारी राज्य की ओर ले जाती हैं. उनकी ये नीतियां आम नागरिकों की शासन में भागीदारी और साझेदारी की भावना को कमजोर कर देंगी. वे भूल जाते हैं कि यही नागरिक भागीदारी लोकतंत्र को मजबूत बनाती है.
कल्याणकारी राज्य का व्यावहारिक विकल्प “नियंत्रण-रहित पूंजीवाद” या “कट्टर व्यक्तिवाद” नहीं है, ना ही पूंजीवाद के लिये घिसे-पिटे अन्य वाक्यांश. मैं इसे “मुक्त अर्थव्यवस्था” कहना पसंद करूंगा, यदि “मुक्त” शब्द के अर्थ को गलत न समझा जाए.
एक अच्छे समाज का एक उद्देश्य सुरक्षा भी होना चाहिए. इसलिए कल्याणकारी राज्य के स्थान पर ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें उत्पादकता, उत्कृष्टता, रचनात्मकता, साहस, गरिमा और जोखिम लेने के अवसर जैसे गुण सुरक्षित और प्रोत्साहित हों. ऐसा समाज केवल सरकार पर निर्भर नहीं करता, बल्कि लोगों द्वारा स्वयं स्थापित संगठनों पर निर्भर करता है. इसलिये, जब लोगों को आपसी सहायता के लिए अपने संगठन बनाने की स्वतंत्रता होती है, तभी सच्चा कल्याण उभरता है.
मैं ऐसे समाज की अवधारणा नहीं चाहता जिसमें सरकार ही न हो. सरकार की एक निश्चित भूमिका है—जैसे सार्वजनिक निर्माण कार्य, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण आदि—जो निजी संगठनों द्वारा बड़े स्तर पर हमेशा प्रभावी ढंग से नहीं किए जा सकते. परंतु आत्मनिर्भर आधार पर कल्याण कोई काल्पनिक सपना नहीं है. यह एक व्यावहारिक विचार है, जो लोगों की प्रयोग करने की भावना और सीमित सरकार पर निर्भर करता है.
मुक्त अर्थव्यवस्था ही जनसामान्य का सच्चा कल्याण करती है, क्योंकि वह दो सिद्धांतों का पालन करती है:
- जब किसी समुदाय के कल्याण के लिए सामूहिक कार्य आवश्यक हो, तो उस कार्य की एकता उच्च स्तर के संगठन द्वारा सुनिश्चित की जानी चाहिए.
- जब कोई कार्य व्यक्ति या छोटे सामाजिक समूहों द्वारा सफलतापूर्वक किया जा सकता हो, तो उसे उन्हीं पर छोड़ देना चाहिए. क्योंकि स्वतंत्र समाज की शक्ति ऊपर बैठे शासकों की देन से नहीं, बल्कि लोगों की पहल से आती है.
भारत के कल्याणवादी चाहते हैं कि सरकार लोगों की इच्छा की परवाह किए बिना कल्याण वाले कार्यक्रम लागू करे. लेकिन सच्चा कल्याणकारी राज्य आपसी सहयोग और स्वेच्छा से विकसित होता है, न कि ज़बरदस्ती या हिंसा से. जब ऐसा होता है तो लोकतंत्र समाप्त हो जाता है और उसके स्थान पर नियंत्रणवाद और तानाशाही आ जाती है. तब व्यक्ति की गरिमा और सामाजिक प्रतिष्ठा खतरे में पड़ जाती है. केवल दबाव डालकर अलग-अलग उपायों से अच्छा समाज स्थापित नहीं किया जा सकता. अच्छा समाज उन कल्याणकारी उपायों को स्वीकार नहीं करता जो व्यक्तित्व को दबाते हैं और जिम्मेदारी को खत्म करते हैं. मुक्त अर्थव्यवस्था में प्राप्त कल्याण अधिक स्थायी होता है, क्योंकि उसमें अधिकार और प्रशासन अलग-अलग रहते हैं, और व्यक्ति की गरिमा तथा स्वतंत्रता सुरक्षित रहती है.
सत्तावादी व्यवस्था अंततः अपनी अस्थिरता के कारण गिर जाती है. लेकिन एक बार जब वह स्थापित हो जाती है, तो उससे वापस लोकतंत्र की ओर लौटना लगभग असंभव हो जाता है. तानाशाही का अंतिम परिणाम स्वतंत्रता और व्यक्तिगत गरिमा का विनाश होता है. सत्ता के नशे में चूर लोग दूसरों के पैसे को “कल्याण” के नाम पर खर्च करने की शक्ति स्वेच्छा से कभी नहीं छोड़ते.
जीवन हमेशा एक दौड़ की तरह रहा है और रहेगा. लेकिन उस दौड़ में कोई आनंद नहीं, जिसमें पहले से ही निर्णायक यह तय कर दें कि सभी प्रतियोगी एक साथ लक्ष्य तक पहुंचेंगे. यह मेरा नहीं, बल्कि अलेक्ज़ेंडर ग्रे का कथन है.
अब प्रश्न यह है—क्या आप ऐसी दौड़ में भाग लेना चाहेंगे, या ऐसी दौड़ में जिसमें आपकी योग्यता को पहचाना और पुरस्कृत किया जाए?
यह लेख सेंटर फ़ॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इस लेख को ‘द इंडियन लिबरटेरियन’ से लिया गया है, जिसका प्रकाशन मार्च 1959 में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
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