क्या आपको उम्मीद थी कि मौजूदा ईरान संघर्ष में दुबई निशाना बनेगा? मुझे तो बिल्कुल नहीं थी. और मुझे लगता है कि दुबई में रहने वाले लोगों को भी इसकी उम्मीद नहीं रही होगी.
जब मैंने शहर में धमाकों की खबर सुनी, तो मेरी पहली प्रतिक्रिया यही थी कि ये उन मिसाइलों को रोकने की वजह से हुए होंगे जो दुबई के ऊपर से उड़ते हुए इस इलाके में मौजूद अमेरिकी ठिकानों की ओर जा रही थीं. मेरे दिमाग में यह ख्याल तक नहीं आया कि ईरान ड्रोन भेजकर दुबई के नागरिक ठिकानों पर हमला करेगा, और खास तौर पर ऐसे स्थान चुनेगा जहां विदेशी पर्यटकों और आगंतुकों को नुकसान पहुंचने की संभावना सबसे ज्यादा हो.
मुझे अभी भी नहीं पता कि ईरानियों ने ऐसा क्यों किया, जब तक कि उनका मकसद मुस्लिम दुनिया के दूसरे हिस्सों को अपने खिलाफ करना न हो. शायद शीर्ष नेतृत्व के खत्म हो जाने के बाद कमान की पूरी श्रृंखला टूट गई हो और ईरान हर दिशा में बेतरतीब तरीके से वार कर रहा हो. या फिर वह इलाके में ऐसे आसान निशाने ढूंढ रहा हो, ताकि हवाई हमलों के अभियान में किसी तरह की सफलता का दावा कर सके.
लेकिन मुझे ईरान के रणनीतिक योजनाकारों की मंशा से ज्यादा दो दूसरी चीजों ने चौंकाया. एक, कुछ भारतीयों की इन हमलों पर प्रतिक्रिया. और दूसरी, दुबई के नेतृत्व ने हमलों के बाद हालात को कैसे संभाला.
सोशल मीडिया पर खिल्ली
भारतीयों का—जो भारत में रहते हैं, प्रवासी नहीं—दुबई के साथ किसी भी दूसरे विदेशी शहर से ज्यादा गहरा रिश्ता है. सबसे पहले तो यह बहुत दूर नहीं है. और उड़ानें इतनी ज्यादा हैं कि कई भारतीय पश्चिम की यात्रा के लिए दुबई को हब की तरह इस्तेमाल करते हैं. दुबई पश्चिमी देशों की तुलना में ज्यादा स्वागत करने वाला भी है. यहां वीजा आम तौर पर समस्या नहीं होता, और इमिग्रेशन अधिकारी आपको ऐसे नहीं देखते जैसे आप कोई बेकार अपराधी हों जो चुपके से घुसने की कोशिश कर रहा हो.
दुबई में हर आय स्तर के भारतीयों के लिए घर जैसा माहौल महसूस करना आसान है. अटलांटिस जैसे महंगे होटलों में भी बहुत से भारतीय मिल जाते हैं, और सैकड़ों साधारण होटल भी हैं जो ठीक-ठाक दाम में आरामदायक ठहरने की सुविधा देते हैं. हमारे जैसे उपमहाद्वीप के लोगों के लिए एक अपनापन भी है. अगर आप टैक्सी में बैठकर हिंदी में बात करें, तो आपको ड्राइवर से बात करने में कोई दिक्कत नहीं होगी, क्योंकि वह अक्सर भारतीय, नेपाली या पाकिस्तानी होता है. भारतीय खाना भी आसानी से मिल जाता है. आपको दुनिया के इकलौते तीन मिशेलिन स्टार पाने वाले भारतीय रेस्टोरेंट ट्रेसिंड स्टूडियो जाने की जरूरत नहीं है. हर दाम पर शानदार भारतीय खाना हर जगह मिलता है.
मैं दुबई को केरल की विदेशी राजधानी कहता हूं, क्योंकि शहर को चलाने में मलयाली लोगों की बड़ी भूमिका है. लेकिन दुबई में रहने वाले भारतीयों और, मान लीजिए, न्यू जर्सी में रहने वाले भारतीयों में बहुत बड़ा फर्क है. अमेरिका और यूरोप में रहने वाले कई प्रवासी भारतीय वहां स्थायी रूप से बसने का फैसला कर चुके हैं. उन्होंने भारतीय पासपोर्ट छोड़ दिए हैं और अपने नए देश की नागरिकता लेने की कोशिश करते हैं. उन्हें पता है कि अगर वे सफल नहीं भी हुए, तो कम से कम उनके बच्चे नागरिक बन जाएंगे. उनके लिए भारत बस वह जगह है जहां से वे आए थे और जिसकी फिल्में उन्हें पसंद हैं. वह उनका घर नहीं है और वे वापस नहीं जाएंगे.
दुबई में रहने वाले भारतीय अलग हैं. वे खुद को अब भी भारतीय मानते हैं, अपने पासपोर्ट रखते हैं और जानते हैं कि एक दिन वे लौटकर भारत आएंगे. वे दुबई से प्यार करते हैं और वहां मिले आर्थिक अवसरों के लिए आभारी हैं, लेकिन वे अमीराती बनने का सपना नहीं देखते. दूसरी ओर, ब्रिटेन और अमेरिका में रहने वाले भारतीय खुद को ब्रिटिश या अमेरिकी मानते हैं.
मैं इस पर कोई मूल्य निर्णय नहीं दे रहा हूं. मेरे अपने परिवार के कई लोग अमेरिका में रहते हैं, और मुझे उनके बारे में इसलिए ज्यादा या कम नहीं लगता कि उनके पास अमेरिकी पासपोर्ट है. (हालांकि, गर्व से गुजराती होने के बावजूद वे मुझे भारतीय राजनीति पर भाषण नहीं देते या उस देश के बारे में आक्रामक राय नहीं ठूंसते जिसमें उनका कोई दांव नहीं है. काश ज्यादा गुजराती ऐसे होते.)
तो आप सोचेंगे कि जब दुबई पर हमला हुआ, तो भारत में रहने वाले लोगों के बीच सहानुभूति और चिंता होगी. और काफी हद तक आप सही भी होंगे.
लेकिन दुर्भाग्य से एक छोटा लेकिन बहुत शोर मचाने वाला समूह ऐसा भी था जिसने हमें शर्मिंदा कर दिया. सोशल मीडिया पर फैली झूठी और बढ़ा-चढ़ाकर कही गई खबरों और टीवी चैनलों की सनसनीखेज रिपोर्टिंग से उकसकर (जैसे, “बुर्ज खलीफा नष्ट हो गया” या “पाम में आग लग गई” जैसे शीर्षक), उन्होंने सबसे बदसूरत रास्ता चुना. वे तंज कसने लगे और खुशियां मनाने लगे.
इस प्रतिक्रिया ने मुझे चौंका दिया. लेकिन उससे भी ज्यादा हैरानी की बात यह थी कि उनका मजाक दुबई सरकार पर नहीं, बल्कि दुबई में रहने वाले भारतीयों पर था. कहा जा रहा था कि वे लोग टैक्स से बचने के लिए भारत छोड़कर वहां भाग गए थे. वे लोग थे जो समझते थे कि दुबई ज्यादा सुरक्षित है. “हां. अब देखो उनका क्या हाल है.” यही उनका सामान्य लहजा था.
कैसा बेशर्म इंसान ऐसा व्यवहार करता है? कौन सा भारतीय संकट के समय अपने ही देशवासियों पर हंसना ठीक समझता है? कौन ऐसे शहर की बदकिस्मती पर खुश होता है जिसने भारतीयों के लिए इतना कुछ किया है?
बाद में मैंने इस तरह के व्यवहार के कई स्पष्टीकरण सुने. शायद यह ईर्ष्या से पैदा हुआ हो. ये वे लोग थे जो दुबई में दूसरे भारतीयों को मिले अवसरों से जलते थे. ऑनलाइन मजाक उड़ाने वालों में से कई ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ज्यादा सुरक्षित और महान देश है, इसलिए शायद इसमें राजनीतिक कोण भी था. मैंने जिन पोस्टों को देखा, उनमें बहुत कम दक्षिण भारतीयों के थे (मलयालियों के तो लगभग नहीं), इसलिए शायद इसमें क्षेत्रीय नाराजगी का तत्व भी हो.
ईमानदारी से कहूं तो मुझे नहीं पता कि वजह क्या थी. लेकिन इससे भारत की छवि खराब हुई. हम छोटे और घटिया लोग जैसे लगे. और यह समझाना मुश्किल हो गया कि ये गंदी पोस्ट सोशल मीडिया की गंदगी से आई थीं और वे भारत के अधिकांश लोगों की राय नहीं दर्शाती थीं.
दुबई से सीखिए
जब कुछ भारतीय नफरत उगल रहे थे, तब दुबई की सरकार अपना काम कर रही थी. जो भारतीय अक्सर हवाई यात्रा करते हैं, वे जानते हैं कि जब हमारे देश में बड़ी संख्या में उड़ानें रद्द होती हैं, तो आमतौर पर इसकी वजह किसी एयरलाइन का लालच होता है जो उल्टा पड़ जाता है. और जब ऐसा होता है, तो हमारा नागरिक उड्डयन मंत्रालय लाचार दिखता है, और अव्यवस्था जरूरत से ज्यादा लंबे समय तक चलती रहती है. मंत्री और अफसर फंसे हुए यात्रियों की परवाह नहीं करते. और जिन लोगों के लालच की वजह से हजारों यात्री फंस जाते हैं, वे अगले दिन फिर उड़ान भरने को तैयार रहते हैं.
इसके उलट दुबई को देखिए, जहां सरकार को ऐसी स्थिति संभालनी पड़ी जो असल में युद्ध जैसी थी. शहर पर खतरा होने के बावजूद (एयरपोर्ट पर हमला हुआ था), अधिकारियों ने तुरंत कदम उठाए. जो लोग होटल का खर्च नहीं उठा सकते थे, उन्हें मुफ्त होटल में ठहरने की सुविधा दी गई, यात्रियों को लगातार जानकारी दी जाती रही, और कोशिश की गई कि एक सुरक्षित रास्ता बनाया जाए ताकि उड़ानें उड़ान भर सकें.
निवासियों को भरोसा दिलाने के लिए यूएई के राष्ट्रपति और दुबई के क्राउन प्रिंस व्यस्त दुबई मॉल में घूमते हुए दिखाई दिए. इसके बाद वे एक ऐसे रेस्टोरेंट में बैठे और खाना खाया जो सीधे सार्वजनिक इलाके में खुलता है.
अगर यही भारत में हुआ होता, तो a) जनता को भरोसा दिलाने की कोई कोशिश नहीं होती, और b) अगर कोई वीआईपी मॉल में आता, तो सबसे पहले सुरक्षा के नाम पर वहां से सबको बाहर निकाल दिया जाता और फिर दो घंटे के लिए सड़कें बंद कर दी जातीं.
दुबई से बहुत कुछ सीखा जा सकता है. उसने ऐसी स्थिति का सामना किया जिस पर उसका कोई नियंत्रण नहीं था और जहां किसी भी समय हमला हो सकता था. लेकिन उसने इसे शानदार तरीके से संभाला, क्योंकि उसके नेतृत्व की गुणवत्ता अच्छी थी.
इसकी तुलना भारत से कीजिए, जहां पायलटों के ड्यूटी टाइम लिमिट में बदलाव होते ही उड्डयन व्यवस्था ठप हो जाती है. और जहां एआई समिट के दौरान वीआईपी संस्कृति लाखों आम नागरिकों के लिए भारी परेशानी खड़ी कर देती है.
अगर किसी को शेखी बघारने का हक है, तो वह दुबई के लोग हैं. और निश्चित रूप से वे भारतीय नहीं, जिन्होंने उन हमलों में फंसे अपने ही लोगों की हालत पर तंज कसा और हंसी उड़ाई, जिनकी उन्हें बिल्कुल उम्मीद नहीं थी.
वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार हैं और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: मुसलमानों को ‘गोली मारने’ वाले हिमंत बिस्वा सरमा के वीडियो पर कानून क्या कहता है
