काठमांडू: कुछ महीने पहले तक वे काठमांडू की सड़कों पर आंसू गैस से बचते हुए भाग रहे थे. आज वे घर-घर जाकर लोगों से मिल रहे हैं, गठबंधन के दस्तावेज़ तैयार कर रहे हैं और नेपाल के करीब 1.9 करोड़ मतदाताओं से कह रहे हैं कि देश में सुधार की जिम्मेदारी अब उनकी पीढ़ी को दें.
जब सितंबर 2025 में नेपाल के युवा प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे और जवाबदेही की मांग की तथा जिसे वे “पुरानी राजनीति” कहते थे उसे खत्म करने की बात कही, तब इसके बाद कुछ असाधारण हुआ: उनमें से कुछ ने चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया. ये सभी लगभग 25 साल के हैं—वकील, कंसल्टेंट, क्लाइमेट एक्टिविस्ट और पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं. सिर्फ छह महीने में वे बैरिकेड से निकलकर अब चुनाव मैदान तक पहुंच गए हैं.
5 मार्च को होने वाले संसदीय चुनाव के साथ जेन ज़ी आंदोलन की ताकत की पहली बड़ी परीक्षा होने जा रही है. इसी आंदोलन ने के.पी शर्मा ओली की सरकार को गिरा दिया था. हिमालयी देश नेपाल में मतदाता प्रतिनिधि सभा के 275 सदस्यों को चुनेंगे—165 सीधे चुनाव से और 110 पार्टी सूची के आधार पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व से.
26 साल के मनीष खनाल, जो नेपाल के पूर्वी नवलपरासी से राष्ट्रीय स्वतंत्रता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं, ने कहा, “हमें भाषण नहीं चाहिए. हमें काम का लागू होना चाहिए.”

पीढ़ी के फर्क पर उनकी बात और साफ है. खनाल ने कहा, “पुराने लोग अपने लिए कानून बनाते हैं. हम जनता के लिए कानून बनाना चाहते हैं.”
चीन और भारत के बीच स्थित नेपाल में 1990 के बाद से अब तक 32 बार सरकार बदल चुकी है. देश की अर्थव्यवस्था ज्यादातर खेती पर आधारित है, इसलिए पढ़ाई और काम की तलाश में बहुत से लोगों को विदेश जाना पड़ता है.
डिजिटल अधिकार से लेकर सरकार बदलने तक
नेपाल को हिलाकर रख देने वाले ये प्रदर्शन एक छोटी मांग से शुरू हुए थे: सोशल मीडिया पर लगे बैन को हटाया जाए. हालांकि, उस समय की ओली सरकार ने यह बैन हटा लिया था, लेकिन प्रदर्शन जल्दी ही भ्रष्टाचार विरोधी सुधार और अच्छे शासन की बड़ी मांग में बदल गए.
जब सुरक्षा बलों ने बल प्रयोग किया और कम से कम 77 लोग मारे गए, तब आंदोलन और सख्त हो गया. बाद में इसमें हिंसा भी हुई—पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा और उनकी पत्नी पर हमला हुआ और पूर्व प्रधानमंत्री झालानाथ खनाल की पत्नी राज्यलक्ष्मी चित्राकार की मौत हो गई जब आगजनी करने वालों ने उनके घर में आग लगा दी.
26 साल की रक्ष्या बाम, जो मास्टर्स की छात्रा हैं और अंतरिम प्रशासन के साथ काम कर रही हैं, सितंबर के प्रदर्शनों में सबसे शुरुआती प्रतिभागियों में थीं. बाद में जब ओली ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया तो अंतरिम प्रशासन बनाने में भी उनकी भूमिका रही.
अब बाम नेपाल जेन ज़ी फ्रंट नाम के सिविल सोसाइटी समूह को चला रही हैं, जो आंदोलन के बाद बनाया गया था. उन्होंने कहा कि यह एक गैर-राजनीतिक और जवाबदेही पर ध्यान देने वाला संगठन है.
उन्होंने कहा, “अभी यह अंतरिम सरकार से भी सवाल पूछ रहा है, पुराने दलों से भी और नए दलों से भी. अभी हम सिर्फ सवाल पूछ रहे हैं और चुनाव का इंतज़ार कर रहे हैं.”
अशांति के बाद एक ड्राफ्टिंग कमेटी—जिसमें मनीष खनाल भी शामिल थे, ने अंतरिम प्रशासन के साथ छह बिंदुओं का समझौता किया. इस अंतरिम प्रशासन का नेतृत्व पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की कर रही थीं. इस समझौते में जवाबदेही, शासन सुधार और युवाओं की भागीदारी से जुड़े वादे शामिल थे.
खनाल को वह पल साफ याद है.
उन्होंने कहा, “स्थिति बहुत अव्यवस्थित थी…प्रदर्शन के बाद हम इकट्ठा हुए और बातचीत की पहल की.”
नागरिक अधिकार कार्यकर्ता आकृति घिमिरे, जो प्रदर्शन के दौरान युवाओं की एक प्रमुख आवाज़ थीं और नागरिक मंच HowtoDeshBikas की संस्थापक हैं, ने कहा कि आने वाली सरकार को इसी समझौते के आधार पर परखा जाना चाहिए.
उन्होंने कहा, “आगे हमारी उम्मीद यही है कि जो भी चुनाव जीतेगा, वह पहले दिन से जेन ज़ी समझौते को लागू करना शुरू करेगा.”
एक आंदोलन, कई रणनीतियां
लेकिन एकता यहीं खत्म हो जाती है.
कई प्रदर्शन नेताओं—जिनमें सुदन गुरुंग, जो हामी नेपाल के संयोजक हैं और ताशी ल्हाजोम ने आरएसपी में शामिल हो गए हैं. यह तीन साल पुरानी पार्टी है, जिसने खुद को व्यवस्था के खिलाफ एक विकल्प के रूप में पेश किया है. काठमांडू के मेयर बालेंद्र शाह, जिन्हें आम तौर पर बालेंन कहा जाता है, इस पार्टी का प्रधानमंत्री पद का चेहरा हैं.

कुछ युवा नेता नेपाली कांग्रेस के साथ खड़े हो गए हैं, खासकर पार्टी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार गगन थापा के आसपास. वे संसद सदस्य हैं और एक जाने-पहचाने राजनीतिक चेहरा हैं, जिन्होंने सुधारों का वादा किया है और कुछ लोग स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतर गए हैं, जो बिना किसी पार्टी के अपने अभियान में आंदोलन की भाषा लेकर चल रहे हैं.
चुनावी दौड़ में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूनिफाइड मार्क्सिस्ट–लेनिनिस्ट) (यूएमएल) भी शामिल है, जिसका नेतृत्व के. पी. शर्मा ओली कर रहे हैं. यह पार्टी कई दशकों से नेपाल की राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावशाली रही है.
सामान्य समर्थकों के बीच यह धारणा है कि नई पार्टियां जेन ज़ी के एजेंडे को आगे बढ़ा रही हैं और आरएसपी को प्रदर्शन की लहर का सबसे बड़ा फायदा उठाने वाला माना जा रहा है, लेकिन कुछ जगहों पर इस धारणा पर संदेह भी जताया जा रहा है.
आकृति घिमिरे ने कहा, “जेन ज़ी के कई दोस्तों ने अपनी विचारधारा और अवसर के आधार पर अलग-अलग पार्टियां चुनी हैं.”
उन्होंने कहा, “कुछ लोग पार्टी नेतृत्व में शामिल हो गए हैं. कुछ सीधे चुनाव लड़ रहे हैं. कुछ आनुपातिक प्रतिनिधित्व की सूची में हैं. और कुछ लोगों ने निगरानी करने वालों की भूमिका चुनी है और नई सिविल सोसाइटी बनाने में लगे हैं. हर कोई शायद अलग-अलग लोगों का समर्थन करेगा—और यही तो लोकतंत्र की असली बात है.”
26 साल की तनुजा पाण्डेय, जो मानवाधिकार वकील हैं और बाम और गुरुंग के साथ प्रदर्शनों का एक प्रमुख चेहरा थीं, उन्होंने इस बिखराव को साफ तौर पर बताया, सिविक फोरम जो पार्टी राजनीति से दूर रहना चाहता है, जेन ज़ी मूवमेंट अलायंस, जेन ज़ी फ्रंट; और काउंसिल ऑफ जेन ज़ी, जिसे सुदन गुरुंग ने बनाया है.
पांडेय ने कहा, “अभी ऐसा कोई एक समूह नहीं है जिसे सभी लोग समर्थन दे रहे हों.”
2025 का आंदोलन, जिसे पांडेय ने आंशिक रूप से अपने इंस्टाग्राम हैंडल Instagram @gen.znepal के जरिए संगठित करने में मदद की थी—जिसके करीब 23,000 फॉलोअर हैं, का मकसद शांतिपूर्ण आंदोलन करना था. उनका कहना है कि बाद में हिंसक भीड़ ने इस आंदोलन को “हाइजैक” कर लिया और हिंसा अचानक नहीं बल्कि योजनाबद्ध थी.
उन्होंने पूछा, “जो आंदोलन सार्वजनिक पैसे के सही इस्तेमाल के लिए लड़ता है, वह उसी पैसे से बनी संस्थाओं को कैसे जला सकता है?”
रक्ष्या बाम ने इस बंटवारे को साफ शब्दों में बताया.
उन्होंने कहा, “इस मुद्दे पर हमारे बीच बंटवारा है. हमारे कुछ दोस्त नई पार्टियों में हैं, कुछ पुराने दलों में हैं, जैसे नेपाली कांग्रेस, जो जेन ज़ी की मांगों को स्वीकार करता है.”
बाम ने कहा कि पारंपरिक पार्टियों के भीतर हुए बदलाव इस बात का सबूत हैं कि आंदोलन के दबाव का असर देश की राजनीति पर पड़ चुका है.
उन्होंने कहा, “उन्होंने (नेपाली कांग्रेस) पार्टी के अंदर विशेष चुनाव कराए हैं और अब उनके पास नया नेतृत्व है. इसलिए हमारे कुछ दोस्त उस पार्टी में हैं, कुछ नई पार्टी में हैं और हममें से कुछ अब भी सड़कों पर रहकर सवाल पूछ रहे हैं.”
जवाबदेही की कमी
सबसे बड़ा सवाल एक ही है: सितंबर के प्रदर्शनों के दौरान हुई मौतों की जांच का क्या हुआ. अंतरिम प्रशासन ने इन मौतों की जांच के लिए एक न्यायिक समिति बनाई थी, लेकिन उसकी रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है. युवा नेताओं का कहना है कि उन्होंने सरकार से कहा है कि पद छोड़ने से पहले यह रिपोर्ट जारी की जाए.
24 साल के प्रदीप ग्यावाली, जो प्रदर्शन आयोजक से आगे बढ़कर आरएसपी की केंद्रीय समिति के सदस्य बने हैं, उन्होंने कहा, “हमने पहले भी कई रिपोर्टें देखी हैं जो कभी प्रकाशित नहीं हुईं. सभी को पता होना चाहिए कि क्या हुआ था.”
तनुजा पाण्डेय इससे भी ज्यादा आलोचनात्मक हैं.
उन्होंने कहा, “ऐसा लगता है कि प्रशासन कुछ लोगों को बचाने की कोशिश कर रहा है.” उन्होंने यह भी बताया कि स्थानीय अखबारों में खबर आई थी कि आरएसपी के कुछ प्रमुख उम्मीदवार, जिनमें सुदन गुरुंग भी शामिल हैं, उस दिन संसद भवन के बाहर देखे गए थे जब उसे आग लगा दी गई थी.
प्रदर्शनों के दौरान के. पी. शर्मा ओली के इस्तीफा देने के बाद भी लोगों का गुस्सा कम नहीं हुआ था. प्रदर्शनकारियों ने नेपाल भर में सरकारी इमारतों और राजनीतिक नेताओं के घरों को निशाना बनाया. काठमांडू में संसद भवन में भी तोड़फोड़ की गई और उसे आग लगा दी गई.
पाण्डेय के लिए एक और बड़ी चिंता राजनीतिक अवसरवाद है, यानी यह संभावना कि पुराने और नए दोनों राजनीतिक दल युवाओं के गुस्से का फायदा उठाएं, लेकिन असली ढांचागत सुधार करने के लिए प्रतिबद्ध न हों.
उन्होंने कहा, “लोग सोचते हैं कि चेहरे बदलने से व्यवस्था भी बदल जाती है. लेकिन चेहरे बदलने से ढांचा अपने आप नहीं बदलता.”
वे आंदोलन के मकसद को लेकर भी साफ हैं.
उन्होंने कहा, “हम मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के भीतर सुधार चाहते थे. अगर आप इसे ‘क्रांति’ कहेंगे, तो आपको मानना होगा कि क्रांतियां खून-खराबा और बदले की कार्रवाई लाती हैं. हमारा ऐसा कोई इरादा नहीं था.”
सरकार चलाना आंदोलन करने से ज्यादा कठिन
ग्राउंड पर, प्रदर्शन से चुनाव लड़ने तक का सफर बिल्कुल आसान नहीं रहा है.
नवलपरासी में मनीष खनाल के चुनावी मुद्दे राष्ट्रीय और स्थानीय दोनों स्तर के हैं: भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई, डिजिटल शासन और आंदोलन के समझौते को लागू करना, साथ ही नारायणी नदी के किनारे बाढ़ नियंत्रण, चितवन नेशनल पार्क के पास इंसान-वन्यजीव संघर्ष को संभालना और स्थानीय किसानों के लिए बाजार बढ़ाना.
26 साल की उम्र में उनकी पहली चुनौती यह रही है कि मतदाताओं को भरोसा दिलाया जाए कि वे इस जिम्मेदारी के लिए तैयार हैं.
उन्होंने कहा, “वे मुझे अपने बेटे या छोटे भाई की तरह देखते हैं.” लेकिन वे इस बात को मानते नहीं. उन्होंने कहा, “मैं यहीं बड़ा हुआ हूं. मुझे यहां की समस्याएं पता हैं.”
कई जिलों में युवा उम्मीदवारों का कहना है कि उन्हें बुजुर्ग मतदाताओं से संदेह, नए मतदाताओं से उत्साह और एक ही सवाल मिलता है—क्या यह पीढ़ी सच में काम कर पाएगी?
आरएसपी के प्रदीप ग्यावाली ने कहा, “लोग परेशान हो चुके हैं. वे पारदर्शिता, जवाबदेही और भागीदारी चाहते हैं. वे चाहते हैं कि चुनावों के बीच भी उनकी बात सुनी जाए, सिर्फ चुनाव के समय नहीं.”
उन्होंने पिछले छह महीनों को शासन की समझ का तेज़ अनुभव बताया. उन्होंने कहा, “यह देश के लिए कठिन समय था. हमने लोकतंत्र, स्थिरता और सुरक्षा के बारे में वास्तविक समय में सीखा.”
नेपाल के युवा नेता चाहते हैं कि 26 से 40 साल की उम्र के सांसद संसद में एक मजबूत समूह बनाएं—सिर्फ प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि एजेंडा तय करने वाले के रूप में. इस ऊर्जा का बड़ा हिस्सा काठमांडू के मेयर बालेंद्र शाह के आसपास दिखाई देता है. काठमांडू में उनके काम को इस बात के सबूत के रूप में देखा जाता है कि युवा नेता चुनाव जीत भी सकते हैं और सरकार भी चला सकते हैं. हालांकि, कुछ कार्यकर्ताओं को निजी तौर पर चिंता है कि औपचारिक राजनीति में आने के बाद सड़कों वाला जोश कम हो जाता है.
फिर भी अनुभव की अहमियत होती है.
नेपाल में गुरुवार का चुनाव इस क्षेत्र का दूसरा चुनाव होगा—बांग्लादेश के बाद, जो जेन ज़ी के प्रदर्शनों के कारण हुआ, जिनसे सत्तारूढ़ सरकारें हट गईं, लेकिन बांग्लादेश में युवाओं की पार्टी को इस फरवरी हुए आम चुनाव में 300 सदस्यीय संसद में सिर्फ छह सीटें ही मिलीं.
आगे क्या होगा
रक्ष्या बाम इस बारे में सावधान हैं, लेकिन उन्हें साफ पता है कि वह क्या देखना चाहती हैं.
उन्होंने कहा, “इस समय मुझे उम्मीद है कि जिस व्यवस्था में बदलाव की हमने मांग की थी, वह होगा और नई चुनी हुई सरकार ज्यादा जवाबदेह, ज्यादा पारदर्शी होगी और देश के कानूनों और संस्थाओं में सुधार करने के लिए प्रतिबद्ध होगी. युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक रोज़गार के अवसरों की कमी है. इसी वजह से कई युवाओं को देश छोड़कर जाना पड़ता है. हम इसे पूरी तरह रोक नहीं सकते, लेकिन हमें इसे कम जरूर करना होगा.”
देश छोड़कर बाहर जाने के बारे में बाम ने कहा कि लोगों को देश से बाहर जाने से पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन “हमें उस अनुपात या उस दर को कम करना होगा.”
यूनाईटेड नेशन्स के 2019 के एक अनुमान के मुताबिक, नेपाल के लगभग आधे घरों में परिवार का कम से कम एक सदस्य ऐसा था जो या तो विदेश में काम कर रहा था या फिर वहां से लौट चुका था.
उन्होंने कहा, “इस देश के युवाओं को अपने ही देश के अंदर इस देश को विकसित करने का सपना देखना चाहिए.”
चुनाव को इतिहास किस तरह याद रखेगा, इस सवाल पर बाम ने साफ कहा, “हमें नहीं पता, लेकिन मैं सिर्फ सड़कों के प्रदर्शनों के लिए याद नहीं की जाना चाहती. मैं चाहती हूं कि लोग हमें उस काम के लिए याद रखें जो हमने उसके बाद बनाया. मैं हमेशा खुलकर बोलती रही हूं और आगे भी बोलती रहूंगी.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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