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Wednesday, 4 March, 2026
होममत-विमतX के पोर्न बैन का अंजाम भी गुटखा, अल्कोहल और पटाखों के बैन जैसा ही होने वाला है

X के पोर्न बैन का अंजाम भी गुटखा, अल्कोहल और पटाखों के बैन जैसा ही होने वाला है

बिना लागू किए बैन सिंबॉलिज़्म है. बिना सोशल चेंज के बैन ड्रामा है. और धीरे-धीरे, नागरिक हर नई रोक को कानून नहीं, बल्कि बैकग्राउंड नॉइज़ मानने लगते हैं.

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सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X ने कथित तौर पर भारत में कई ऐसे अकाउंट्स को बैन कर दिया, जो बच्चों के यौन शोषण और बिना सहमति वाली अश्लील तस्वीरों से जुड़ा कंटेंट प्रमोट कर रहे थे, ऐसा कई यूज़र्स ने दावा किया. हमने ‘बैन’ शब्द पहले भी कई बार सुना है, लेकिन भारत में सच में कुछ भी पूरी तरह बैन नहीं होता. यह बस एक और चीज़ है जो लिस्ट में जुड़ जाती है.

2015 में भारत में पोर्न बैन किया गया था. लेकिन वह सारा कंटेंट आज भी बस एक सर्च दूर है. 2022 में दिल्ली में सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर बैन लगा. लेकिन अगर आप किसी भी बाजार में इधर-उधर देख लें, तो समझ जाएंगे कि ‘बैन’ शब्द कितना बड़ा मज़ाक है. ऊपर से सुप्रीम कोर्ट ने दिवाली पर पटाखों पर बैन लगाया है. लेकिन रात होते ही तेज़ आवाज़ें, जो एक दिन से ज्यादा चलती हैं, और AQI ऐसे बैन का मज़ाक उड़ाते हैं.

मुझे याद भी नहीं कि सरकार ने कितनी बार गुटखा बेचने पर बैन लगाया है. लेकिन हर कुछ मीटर पर एक दुकान मिल जाएगी जो यह सामान बेच रही होती है. यहां तक कि कोविड-19 महामारी के दौरान, जब सब कुछ बंद था, तब भी लोग एक-दूसरे को फोन करके गुटखे के डिब्बे थोक में खरीद रहे थे.

गुजरात से लेकर बिहार तक, कई राज्यों में सालों पहले शराब पर बैन लगा दिया गया. लेकिन समानांतर बाजार बड़े पैमाने पर शराब बेचते हैं. यानी जो भी बैन होता है, वह आसानी से मिल जाता है. और पोर्न तो दुनिया में सबसे आसानी से मिलने वाला कंटेंट है. ट्विटर ने कथित तौर पर कई अकाउंट्स बैन किए, लेकिन ये अकाउंट्स कई नए आईडी बना सकते हैं.

बिना लागू किया गया बैन: एक दिखावा 

यह बात बैन के पीछे की मंशा को नकारने के लिए नहीं है. बच्चों के शोषण वाले कंटेंट को नियंत्रित करना, प्लास्टिक कचरा कम करना या प्रदूषण पर रोक लगाना जरूरी लक्ष्य हैं. लेकिन अगर लगातार सख्ती से पालन न हो, लोगों का साथ न मिले और सिस्टम स्तर पर काम आगे न बढ़े, तो बैन सिर्फ प्रतीकात्मक कदम बन जाता है.

और 1.4 अरब लोगों के देश में प्रतीकात्मक कदम शायद ही व्यवहार बदल पाते हैं.

शायद असली सवाल यह नहीं है कि कुछ बैन हुआ या नहीं, बल्कि यह है कि क्या संस्थाएं लगातार सख्ती, डिजिटल जागरूकता, बुनियादी ढांचे और सामाजिक बदलाव में निवेश करने को तैयार हैं. क्योंकि भारत में लगातार कोशिश के बिना लगाया गया प्रतिबंध सिर्फ कागज़ी कार्रवाई बनकर रह जाता है. और ट्विटर वही पुरानी गलतियां दोहरा रहा है जो दूसरी संस्थाएं कर चुकी हैं. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने बताया कि उसने यह फैसला क्यों लिया.

कंपनी ने कहा, “हमने इस स्थिति की पूरी समीक्षा के बाद किसी भी अकाउंट का सस्पेंशन वापस नहीं लिया. सभी अकाउंट अब भी सस्पेंड हैं. इस रिपोर्टिंग अवधि के दौरान हमें ट्विटर अकाउंट्स से जुड़े 12 सामान्य सवालों के अनुरोध भी मिले.”

एक समय था जब “बैन” का मतलब पूरी तरह बंद होना होता था. आज यह ऐसा लगता है जैसे एक पॉज बटन, जिसे कोई दबाता नहीं है, वह बस यूं ही मौजूद रहता है.

समस्या बैन लगाने की कार्रवाई नहीं है, बल्कि शायद यह है कि हम उसे पहला और आखिरी समाधान मान लेते हैं. भारत में बैन से तुरंत सख्ती, नैतिकता और नियंत्रण का संदेश जाता है. कई बार बैन को शासन का विकल्प बना दिया जाता है. लेकिन सिर्फ घोषणा से व्यवहार खत्म नहीं होता. किसी वेबसाइट या अकाउंट को ब्लॉक कर देने से मांग खत्म नहीं होती. एक सर्कुलर जारी कर देने से प्रदूषण कम नहीं होता.

बिना लागू किए बैन सिंबॉलिज़्म है. बिना सोशल चेंज के बैन ड्रामा है. और धीरे-धीरे, नागरिक हर नई रोक को कानून नहीं, बल्कि बैकग्राउंड नॉइज़ मानने लगते हैं.

विचार निजी है.


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