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Wednesday, 4 March, 2026
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ऑपरेशन गजब लिल-हक को सही ठहराने के लिए पाकिस्तान को भारत के क्षेत्रों पर अपना दावा छोड़ना होगा

अब जब चीन को बड़े दांव वाले युद्ध पर नज़र रखने में व्यस्त किया जा रहा है, यह छोटा पड़ोसी संघर्ष पाकिस्तान को भू-रणनीतिक युद्ध का ज़रूरी सबक सिखा सकता है.

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अगर आप अपने आंगन में सांप पालते हैं, तो वे देर-सबेर आपको ही डसेंगे. यह मेरी पसंदीदा और बार-बार दोहराई जाने वाली लाइन है. हिलेरी क्लिंटन ने 2011 में पाकिस्तान द्वारा सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देने के संदर्भ में इसका इस्तेमाल किया था. यह उदाहरण इस्लामाबाद के सामने खड़ी संरचनात्मक समस्या को बहुत सही तरीके से दिखाता है.

आज़ादी के बाद से, सैन्य प्रॉक्सी पाकिस्तान के लिए रणनीतिक गहराई हासिल करने का साधन रहे हैं. इनके ज़रिए उसने पड़ोसी देशों में अपने हितों के अनुसार हालात को प्रभावित किया, लेकिन आज स्थिति उलट गई है. तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) जैसे समूह अब अफगान की ज़मीन से काम कर रहे हैं और पाकिस्तान के अंदर हमले कर रहे हैं. साथ ही, काबुल इस्लामाबाद की सीमा नियंत्रण कोशिशों का विरोध कर रहा है.

2021 से, जब तालिबान सत्ता में आया और काबुल की कमान संभाली, तब से दोनों इस्लामी पड़ोसियों के बीच तनाव बढ़ रहा है. जो समूह पहले बाहरी दबाव बनाने का साधन थे, वही अब पाकिस्तान की आंतरिक कमज़ोरी का कारण बन गए हैं.

सबक सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक भी है: जो देश अस्थिर सीमाओं को संभालने के लिए ढीले-ढाले हथियारबंद समूहों का इस्तेमाल करते हैं, उनकी अपनी सीमाएं कमज़ोर हो जाती हैं और अंदरूनी सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाती है.

पाकिस्तान की पुरानी आदत रही है कि वह बाहरी सीमाओं पर विवाद करता है, लेकिन अंदरूनी मामलों में पाक-साफ होने की बात करता है. अब वही रवैया उसके खिलाफ पड़ रहा है. भारत के लिए यह रणनीतिक स्पष्टता का मौका है और क्षेत्रीय भू-राजनीतिक हालात को फिर से परखने का अवसर भी.

डूरंड लाइन मसला

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच मौजूदा संघर्ष की जड़ दोनों के बीच अंतरराष्ट्रीय सीमा को लेकर लंबे समय से चले आ रहे तनाव में है. डूरंड लाइन 1893 में अफगान अमीरात और ब्रिटिश साम्राज्य के बीच हुए समझौते से बनी थी, ताकि कूटनीतिक रिश्ते और व्यापार बेहतर हों और प्रभाव क्षेत्रों को तय किया जा सके.

यह 2,640 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो पश्चिम में ईरान से लेकर पूर्व में चीन तक जाती है. 1947 में आज़ादी के समय यह सीमा पाकिस्तान को मिली और यह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुज़रती है, जो भारत का हिस्सा है.

इस लाइन के कारण अफगानिस्तान को रूस और पाकिस्तान के बीच एक बफर जोन की तरह रखा गया. भू-राजनीतिक नज़रिए से यह आधुनिक दुनिया की सबसे खतरनाक सीमाओं में से एक मानी जाती है.

अफगानिस्तान ने इस सीमा को कभी औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया. उसका कहना है कि यह औपनिवेशिक दौर की जबरन बनाई गई लाइन है, जिसने पश्तून समुदायों को गलत तरीके से बांट दिया.

पाकिस्तान डूरंड लाइन को अंतरराष्ट्रीय कानून से तय सीमा मानता है और उसने इस कमज़ोर लाइन पर बाड़ लगाने की कई बार कोशिश की है, जहां से नशा, हथियार और आतंकवाद आसानी से आते-जाते हैं, लेकिन अफगान सरकारों ने इन कोशिशों का विरोध किया है. 95 प्रतिशत से ज्यादा सीमा पर बाड़ लग चुकी है, जिससे दोनों ओर के पश्तून समुदाय बंट गए हैं, फिर भी यह सीमा दोनों इस्लामी देशों के बीच तनाव का कारण बनी हुई है. पश्तून आबादी अपनी ज़मीन में दखल या बंटवारे को स्वीकार नहीं करती.

जो इतिहास भूल जाते हैं, वे उसे दोहराने को मजबूर होते हैं. दशकों की आपसी दखलअंदाजी ने पाकिस्तान-अफगानिस्तान संबंधों की परीक्षा ली है. सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने अमेरिका के समर्थन से मुजाहिदीन का साथ दिया, जो आज के तालिबान के पूर्ववर्ती थे और उन्हें इसी कमज़ोर लाइन के रास्ते अमेरिकी हथियार दिए गए.

9/11 के बाद की दुनिया में अफगान शरणार्थी पाकिस्तान आए और इस्लामाबाद ने उन्हें जगह दी. साथ ही उसने काबुल पर बलूच अलगाववादियों और अन्य चरमपंथी समूहों को समर्थन देने का आरोप लगाया. दूसरी ओर, अफगानिस्तान ने पाकिस्तान पर तालिबान और ऐसे ही उग्रवादी समूहों को प्रॉक्सी की तरह इस्तेमाल करने का आरोप लगाया.

2021 में जब तालिबान सत्ता में आया, तो पाकिस्तान ने शुरुआत में उनका स्वागत किया. उसे उम्मीद थी कि तालिबान टीटीपी के खिलाफ उसका साथ देगा. टीटीपी तालिबान से अलग हुआ एक गुट है, जो पाकिस्तान की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन गया था और हज़ारों मौतों के लिए जिम्मेदार था.

लेकिन 2023 से 2025 के बीच आतंकी हमले बढ़ गए. इस दौरान इस्लामाबाद, बाजौर और बन्नू में 500 से ज्यादा पाकिस्तानी नागरिक और सुरक्षा कर्मी मारे गए. अफगान तालिबान पर नंगरहार, खोस्त और अन्य इलाकों में पाकिस्तान-विरोधी समूहों को पनाह देने का आरोप लगा.

इसी समय पाकिस्तान ने 17 लाख से ज्यादा अफगान शरणार्थियों को सीमा पार धकेलकर बाहर कर दिया, जिससे अफगानिस्तान के सीमा क्षेत्रों में अस्थिरता और अनिश्चितता बढ़ी.

फरवरी 2026 में सीमा पर झड़पें तेज़ हो गईं और तनाव बढ़ गया. 21-22 फरवरी को पाकिस्तान ने अफगानिस्तान पर हमला किया और रणनीतिक व लक्षित जीत का दावा किया. अफगानिस्तान ने भी तुरंत जवाबी कार्रवाई की और खैबर, बाजौर जैसे पाकिस्तान के सीमा इलाकों में ज़मीनी और हवाई हमले किए.

27 फरवरी को पाकिस्तान ने ऑपरेशन ग़ज़ब लिल-हक शुरू किया, जिसका अरबी में मतलब है “सच के लिए गुस्सा” या “न्यायपूर्ण क्रोध”, लेकिन पाकिस्तान ने अपने गलत इरादों के साथ हिंसा और छल का रास्ता अपनाया है, जो किसी भी तरह से न्यायपूर्ण नहीं कहा जा सकता.

पीओके पर दोहरा रवैया

पश्चिमी मोर्चे पर पाकिस्तान जोर देता है कि डूरंड लाइन को अंतरराष्ट्रीय सीमा माना जाए, लेकिन पूर्वी मोर्चे पर इस्लामाबाद जम्मू और कश्मीर की पूर्व रियासत के भारत में शामिल होने की कानूनी अंतिम स्थिति को मानने से इनकार करता है. यह शामिल होना 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह द्वारा हस्ताक्षर किए गए औपचारिक ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ के जरिए हुआ था, जिसे अगले दिन गवर्नर-जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने स्वीकार किया था.

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के तहत बने कानूनी ढांचे के अनुसार, रियासतों को यह अधिकार था कि वे किसी भी डोमिनियन में शामिल हो सकती थीं. जम्मू-कश्मीर का भारत में शामिल होना भी उसी संवैधानिक प्रक्रिया से हुआ था, जिससे 560 से अधिक अन्य रियासतें जुड़ी थीं.

इस शामिल होने की संवैधानिक वैधता का समर्थन कई प्रसिद्ध विधि विशेषज्ञों ने लगातार किया है. इनमें पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मेहर चंद महाजन भी शामिल हैं, जो उस समय जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री थे. अपनी आत्मकथा ‘Looking Back’ में उन्होंने पाकिस्तान की ओर से हुए सशस्त्र हमलों के बीच इस शामिल होने की परिस्थितियों का वर्णन किया है.

1971 के युद्ध और भारत-पाकिस्तान के बीच शिमला समझौते के बाद, नियंत्रण रेखा (LoC) को अंतिम समाधान तक वास्तविक अंतरराष्ट्रीय सीमा माना गया, लेकिन पाकिस्तान ने इस व्यवस्था को अस्थायी कदम के रूप में भी पूरी तरह स्वीकार नहीं किया. पाकिस्तान के अलग-अलग नेताओं ने इस द्विपक्षीय मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय बनाने की लगातार कोशिश की और आज तक इस मुद्दे को ज़िंदा रखा है.

इस तरह पाकिस्तान की स्थिति एक विरोधाभास पर टिकी है. एक तरफ वह पश्चिम में औपनिवेशिक दौर की सीमाओं की पवित्रता की मांग करता है, जबकि पूर्व में कानूनी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घोषित किए गए भारत में शामिल होने के फैसले पर सवाल उठाता है. यानी, जब सीमाएं औपनिवेशिक हुकूमत से मिली हों तो वे स्थायी मानी जाती हैं, लेकिन जब वे संवैधानिक प्रक्रिया से तय हों तो उन्हें स्वीकार नहीं किया जाता.

पाकिस्तान के लिए रणनीतिक सबक

दशकों तक इस्लामाबाद ने सीमा विवादों पर राजनीति की, लेकिन भूगोल को अपनी सुविधा की कहानी के हिसाब से बदला नहीं जा सकता. सीमा पार आतंकवाद में निवेश करके भौगोलिक बढ़त साबित करने की कोशिश करने वाला पाकिस्तान अब उन्हीं समूहों से अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता के लिए खतरा झेल रहा है, जिन्हें उसने खुद बनाया था. भारत की सीमा और संवैधानिक ढांचे को चुनौती देकर उसने क्षेत्रीय अंतिमता के सिद्धांत को कमजोर किया. अब वही सिद्धांत उसके खिलाफ इस्तेमाल हो रहा है. आंगन में पाले गए सांप वाली बात फिर याद आती है.

भारत एक संतुलित लेकिन स्पष्ट और मजबूत बौद्धिक रुख के साथ तीन-स्तरीय रणनीति अपना सकता है.

1. सिद्धांतों में एकरूपता स्थापित करना: भारत को साफ तौर पर दोहराना चाहिए कि तय हो चुकी सीमाएं स्थायी होती हैं—चाहे वे इतिहास से बनी हों, युद्ध से तय हुई हों या संवैधानिक रूप से वैध शामिल होने से. इनका दोनों पक्षों द्वारा सम्मान ज़रूरी है.

2. काबुल के साथ संतुलित कूटनीति: भारत सावधानी से काबुल के साथ अपने संबंध बढ़ा सकता है, खासकर विकास और कनेक्टिविटी पर ध्यान देते हुए. विदेश मंत्रालय ने कहा है कि वह “अफगान क्षेत्र पर पाकिस्तान के हवाई हमलों की कड़ी निंदा करता है, जिनमें रमज़ान के पाक महीने के दौरान महिलाओं और बच्चों सहित नागरिकों की मौत हुई है.”

3. ग्लोबल लेवल पर संदेश तय करना: भारत इस मौके का उपयोग यह बताने के लिए कर सकता है कि क्षेत्रीय अखंडता का सिद्धांत सब पर समान रूप से लागू होता है, चुनिंदा तरीके से नहीं. अगर डूरंड लाइन को अंतरराष्ट्रीय सीमा माना जाता है और उस पर बाड़ लगाई जाती है, तो फिर पाकिस्तान के पास पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को अपना क्षेत्र बताने का कोई कारण नहीं है. उसे तुरंत जम्मू-कश्मीर राज्य पर अपने सभी दावे छोड़ देने चाहिए, जो भारत का अभिन्न हिस्सा है और हमेशा रहेगा.

4. इस्लामाबाद को तुरंत प्रभाव से 1947 से अवैध रूप से कब्ज़े में लिए गए सभी भारतीय क्षेत्रों पर अपने दावे छोड़ देने चाहिए. तभी वह ऑपरेशन ग़ज़ब लिल-हक की नैतिकता को सही ठहरा सकता है.

पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच बढ़ता तनाव दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत हो सकता है. पाकिस्तान की पारंपरिक चिंता हमेशा भारत को लेकर रही है. अब जब उसे पश्चिमी मोर्चे पर, कभी सहयोगी रहे अफगानिस्तान से टकराव का सामना करना पड़ रहा है, और बलूचिस्तान में भी एक नया मोर्चा खुल रहा है, तो इस्लामाबाद को उन समूहों के खिलाफ सख्त रुख अपनाना होगा जो अब उसी को नुकसान पहुंचा रहे हैं.

अब जब चीन का ध्यान बड़े दांव वाले युद्ध की ओर लगा हुआ है, तो यह छोटा पड़ोसी संघर्ष पाकिस्तान को भू-रणनीतिक युद्ध का ज़रूरी सबक सिखा सकता है.

मीनाक्षी लेखी बीजेपी लीडर, वकील और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @M_Lekhi है. विचार व्यक्तिगत हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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