(माणिक गुप्ता)
नयी दिल्ली, एक मार्च (भाषा) देश के अलग-अलग हिस्सों में हालिया कुछ समय में भयावह आपराधिक घटनाएं सामने आईं जिनमें अपने ही लोग अपराधी बनकर सामने आए हैं। लखनऊ में एक बेटे ने बहस के बाद अपने पिता को गोली मार दी और फिर शव के टुकड़े कर दिए। वहीं, दिल्ली के समयपुर बादली में एक व्यक्ति ने अपनी गर्भवती पत्नी और तीन, चार व पांच वर्ष की तीन बेटियों का कथित तौर पर गला रेत दिया।
परिवार में होने वाले अपराध से अलग तरह का डर पैदा होता है। इससे लगता है कि कभी-कभी घर ही खतरे की जगह बन सकता है। ऐसे मामलों में केवल हत्या नहीं होती बल्कि विश्वासघात भी होता है। यानी लोग अपने ही लोगों के खून के प्यासे हो जाते हैं।
बाल और किशोर मनोचिकित्सक डॉ. कविता अरोड़ा ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, “सभी मनुष्यों में आक्रामकता स्वाभाविक होती है। हालांकि, अधिकांश लोग समय के साथ विकसित नैतिकता, सहानुभूति, विश्वास और सुरक्षित जुड़ाव के माध्यम से अपने हिंसक व्यवहार को नियंत्रित करते हैं।”
उन्होंने कहा, “कभी-कभी नैतिकता का यह धागा टूट जाता है जिसके बाद अत्यधिक हिंसा होती है। क्रूरता समाज को झकझोर देती है और सभी के मन में यही सवाल होता है कि ऐसा क्यों हुआ।”
अरोड़ा ने कहा, “करीबी रिश्ते इसलिए बनाए जाते हैं ताकि हम सुरक्षित और अपनापन महसूस कर सकें। अगर इन रिश्तों में हिंसा होती है, तो इसका मतलब है कि भरोसा टूट गया है।”
देश में परिवारों में होने वाली हिंसा नयी बात नहीं है। सिर्फ एक बार गूगल पर खोज करने से ही पुरानी कई दुखद घटनाओं की यादें सामने आ जाती हैं।
उदाहरण के लिए, 1995 का ‘तंदूर कांड’ याद किया जा सकता है, जिसमें युवा कांग्रेस के पूर्व सदस्य सुशील शर्मा ने विवाहेत्तर संबंधों के शक में अपनी पत्नी नलिनी साहनी को गोली मार दी और फिर शव को तंदूर में फेंकने की कोशिश की थी। यह मामला आज भी लोगों की यादों में ताजा है।
ऐसी सिलसिलेवार घटनाएं सामने आती रहती हैं। पिछले 15 दिन में भी इसी तरह की सिलसिलेवार घटनाएं सामने आईँ।
दिल्ली के समयपुर बादली इलाके में पिछले हफ्ते एक महिला और उसकी तीन नाबालिग बेटियों के गले कटे हुए शव मिले। वारदात के बाद लापता हुए महिला के पति को शनिवार को राजस्थान के किशनगढ़ से गिरफ्तार कर लिया गया।
इससे ठीक पहले, 20 फरवरी को लखनऊ में एक 21 वर्षीय युवक ने कथित तौर पर झगड़े के बाद अपने पिता को गोली मार दी। शव के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और धड़ को एक ड्रम में छिपा दिया। वहीं बिहार के बक्सर में, एक व्यक्ति ने शादी के दौरान एक महिला को गोली मार दी। इस घटना का वीडियो वायरल हो गया जिसने सभी के रोंगटे खड़े कर दिए।
क्लीनिकल मनोवैज्ञानिक श्वेता शर्मा के अनुसार, ऐसे मामलों में कई चीजें असर डालती हैं, जिनमें व्यक्तित्व से जुड़े पहलू, पुराना दुख या आघात, बचपन में हिंसा देखना जैसी चीजें शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि इसके अलावा, साथी को अपनी मिल्कियत समझना, अपनी गलती दूसरों पर डालना, हिंसा को सही ठहराना आदि मिलकर रिश्तों में हिंसक व्यवहार को बढ़ावा दे सकते हैं।
हालांकि आंकड़ों के अनुसार पुरुषों की ओर से हिंसा किए जाने के अधिक मामले सामने आए हैं। लेकिन पिछले साल कई मामलों में दूसरी कहानी भी सामने आई। पिछले साल परिवारों में हुई हिंसा की कई घटनाओं में महिलाएं मुख्य आरोपी के तौर पर सामने आईं।
जून 2025 में सोनम रघुवंशी ने मेघालय में हनीमून के दौरान अपने पति राजा रघुवंशी की हत्या की साजिश रची। राजा का क्षत-विक्षत शव बाद में सोहरा की एक खाई में मिला।
मार्च में, मेरठ में मुस्कान रस्तोगी नामक महिला ने कथित तौर पर अपने प्रेमी साहिल शुक्ला के साथ मिलकर अपने पति सौरभ राजपूत की चाकू मारकर हत्या कर दी, शव के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और उन्हें सीमेंट से भरे ड्रम में भर दिया।
अप्रैल में, बिजनौर की शिवानी नामक महिला ने पहले दावा किया कि उसके पति दीपक की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई; पुलिस ने बाद में पाया कि उसने गला घोंटकर उसकी हत्या की थी। उसी महीने भिवानी में, यूट्यूबर रवीना ने कथित तौर पर अपने पति की एक पुरुष मित्र के साथ मिलकर हत्या कर दी, क्योंकि पति ने रवीना और उसके दोस्त के बीच की ‘घनिष्ठता’ और रवीना की सोशल मीडिया गतिविधियों पर आपत्ति जताई थी।
जून में, सांगली की निवासी राधिका ने कथित तौर पर शादी के महज 15 दिन बाद अपने पति अनिल की हत्या कर दी। अक्टूबर में, दक्षिण दिल्ली में एक 28 वर्षीय व्यक्ति बुरी तरह जल गया, जब उसकी पत्नी ने कथित तौर पर सोते समय उस पर उबलता तेल और मिर्च पाउडर डाल दिया।
शर्मा ने कहा, ‘हालांकि आंकड़ों में लैंगिक मामले में कुछ बदलाव दिख सकता है, लेकिन ऐसा नहीं होता कि किसी के पुरुष होने की वजह से उसके खिलाफ अपराध हुआ हो। वास्तव में, इतनी गंभीर हिंसा अक्सर किसी व्यक्ति के खराब व्यक्तित्व , पुराने आघात, भावनात्मक असंतुलन और रिश्तों के बारे में गलत सोच से जुड़ी होती है।’
उन्होंने कहा, ‘इस मुद्दे को एक ही लिंग तक सीमित करने से ऐसे व्यवहार को बढ़ावा देने वाले गहरे मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारकों को नज़रअंदाज़ करने का जोखिम होता है।”
सबसे जरूरी सवाल जिस पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है, वह यह नहीं है कि ऐसा क्यों होता है, बल्कि यह है कि इसे उस स्थिति तक पहुंचने से पहले कैसे रोका जा सकता है जहां से लौटना असंभव हो।
भाषा जोहेब नरेश
नरेश
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