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Sunday, 1 March, 2026
होममत-विमतमोदी-इज़राइल संबंधों को ‘भारतीय मुसलमानों की ठेस’ से न जोड़ें—विदेश नीति आस्था से अलग है

मोदी-इज़राइल संबंधों को ‘भारतीय मुसलमानों की ठेस’ से न जोड़ें—विदेश नीति आस्था से अलग है

जो बात मुझे परेशान करती है, वह यह है कि हर चीज़ को बहुत जल्दी वफादारी की कसौटी पर कसा जाने लगता है. जैसे भारतीय मुसलमानों को एक तरह से सोचना चाहिए और भारतीय हिंदुओं को दूसरी तरह से. इसका अंत कहां है?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इज़राइल यात्रा ने न सिर्फ देश के भीतर सुर्खियां बटोरी हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी खास ध्यान खींचा है. इसका वक्त भी अहम है. इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने हाल ही में एक नए क्षेत्रीय गठबंधन बनाने की बात कही है और पश्चिम एशिया को “कट्टर सुन्नी और शिया धुरों” में बंटा हुआ बताया है.

उन्होंने जिस प्रस्ताव की बात की, उसे कुछ विश्लेषक “हेक्सागन गठबंधन” कह रहे हैं. ऐसे व्यापक भू-राजनीतिक माहौल में हर कूटनीतिक कदम का गहरा मतलब निकाला जाता है.

भारत और इज़राइल के रिश्ते नए नहीं हैं. रक्षा सहयोग, खुफिया जानकारी साझा करना और तकनीकी आदान-प्रदान—ये संबंध कई दशकों में लगातार मजबूत हुए हैं और भारत में अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारों के दौरान भी जारी रहे हैं, लेकिन जब मोदी ऐसे समय में इज़राइल जाते हैं, जब नए क्षेत्रीय गुटों की कल्पना की जा रही है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है.

क्या भारत बदलती क्षेत्रीय व्यवस्था में अपनी जगह तय कर रहा है? क्या यह सुरक्षा साझेदारी, आतंकवाद-रोधी सहयोग और तकनीक से जुड़ा कदम है? या फिर यह एक संतुलित रणनीति है क्योंकि भारत के खाड़ी देशों से पुराने संबंध हैं और पश्चिम एशिया में बड़ी भारतीय आबादी रहती है?

आपसी फायदे वाला रिश्ता

भारत ने ज्यादातर वक्त पश्चिम एशिया की सुन्नी-शिया या “यह गुट बनाम वह गुट” वाली राजनीति में खुद को फंसने से बचाया है. हमारा नज़रिया विचारधारा से ज्यादा व्यावहारिक रहा है. हमने इज़राइल से रिश्ते बनाए, लेकिन साथ ही ईरान, सऊदी अरब, यूएई और दूसरे मध्य-पूर्वी देशों से भी संबंध बनाए रखे. हमने सब से बात की.

एक ऐसे क्षेत्र में, जहां गठबंधन सुर्खियों से भी तेज़ बदल जाते हैं, भारत की ताकत कभी जोर से किसी एक पक्ष को चुनना नहीं रही. भारत सभी पक्षों के साथ एक ही मेज पर बैठ सकता है—कभी चुपचाप, कभी रणनीतिक तरीके से—बिना कूटनीति को ड्रामा बनाए.

इसी वजह से भारत की इज़राइल नीति हमेशा दो समानांतर रास्तों पर चली है. एक तरफ, भारत ऐतिहासिक रूप से फिलिस्तीन के समर्थन में खड़ा रहा है और मानवाधिकार तथा दो-राष्ट्र समाधान की बात करता रहा है. दूसरी तरफ, उसने इज़राइल के साथ रणनीतिक रिश्ते लगातार मजबूत किए हैं. दशकों तक नई दिल्ली ने इन दोनों स्थितियों को बिना टकराव के साथ रखा.

भारत और इज़राइल का रिश्ता ज्यादातर आपसी फायदे वाला रहा है. भारत के लिए रक्षा, खुफिया सहयोग, जल प्रबंधन और कृषि तकनीक में इज़राइल का सहयोग अहम रहा है. जब कई भारतीय राज्य सूखे और कमजोर खेती के तरीकों से जूझ रहे थे, तब इज़राइल की ड्रिप इरिगेशन और कृषि तकनीक साझेदारी व्यावहारिक समाधान साबित हुई, न कि वैचारिक.

इज़राइल के लिए भारत भी उतना ही अहम रहा—एक बड़ा बाज़ार, तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और एक बड़ा लोकतंत्र, जो ऐसे समय में खुलकर जुड़ने को तैयार था जब इज़राइल को दुनिया के कई हिस्सों से कूटनीतिक विरोध का सामना करना पड़ता था. यह हमेशा राष्ट्रीय हित का सवाल रहा है.

भारत की विदेश नीति को लेकर मेरी समझ हमेशा यही रही है, लेकिन इस यात्रा को लेकर सोशल मीडिया पर जो बहस देखी, वह…बहुत कुछ दिखाने वाली रही है.

मजबूत कूटनीति

मैंने ऐसे कई कमेंट देखे हैं जिनमें कहा गया कि भारत को इज़राइल से करीबी रिश्ते नहीं रखने चाहिए, क्योंकि यह “भारतीय मुसलमानों को ठेस” पहुंचाता है. मुझे यह तर्क पूरी तरह गलत लगता है. यह मान लेता है कि भारतीय मुसलमान सिर्फ वैश्विक धार्मिक नज़रिये से सोचते हैं और उनकी पहली वफादारी कहीं और है. यह उन्हें सिर्फ एक भावनात्मक पहचान तक सीमित कर देता है और इस सच को नज़रअंदाज़ करता है कि वे सबसे पहले भारत के नागरिक हैं और राष्ट्रीय हित में उनकी भी उतनी ही हिस्सेदारी है जितनी किसी और की.

अगर बात इंसानियत, आम लोगों के दुख और युद्ध पर नैतिक रुख जैसे मुद्दों के आधार पर की जाती, तो वह अलग चर्चा होती. वह बातचीत ज़रूरी है, लेकिन जब इसे “यह भारतीय मुसलमानों को ठेस पहुंचाता है” कहकर पेश किया जाता है, तो बात दूसरी दिशा में चली जाती है. इससे यह संकेत मिलता है कि भारत के मुसलमान विदेश नीति और आस्था, भू-राजनीति और पहचान के बीच फर्क नहीं कर सकते. जबकि सच यह है कि कई अरब देशों ने पहले ही इज़राइल के साथ रिश्ते सामान्य कर लिए हैं (अब्राहम समझौते).

अब अपने पड़ोस को देखें. बांग्लादेश में इस समय हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा को लेकर गंभीर चिंताएं हैं. क्या इसका मतलब यह है कि भारत को बांग्लादेश सरकार से कूटनीतिक और रणनीतिक संबंध तोड़ लेने चाहिए, क्योंकि इससे भारतीय हिंदुओं को भावनात्मक ठेस पहुंच सकती है? बिल्कुल नहीं. देश अपने हित, स्थिरता और लंबी रणनीति के आधार पर फैसले लेते हैं. मानवाधिकार के मुद्दे उठाए जाने चाहिए, लेकिन कूटनीति भावनात्मक बहिष्कार से नहीं चलती.

जो बात मुझे परेशान करती है, वह यह है कि हर चीज़ को कितनी जल्दी वफादारी की कसौटी पर परखा जाने लगता है. जैसे हर समुदाय की अपनी अलग विदेश नीति होनी चाहिए. जैसे भारतीय मुसलमान एक तरह से सोचें और भारतीय हिंदू दूसरी तरह से. इसका अंत कहां होगा?

ऐसा लगता है कि हम धीरे-धीरे भारत को छोटे-छोटे शक भरे खेमों में बांट रहे हैं, जहां हर कोई दूसरे की वफादारी पर नज़र रख रहा है. साझा नागरिकता या साझा इंसानियत के लिए जगह कम होती जा रही है. और शायद यह किसी भी कूटनीतिक यात्रा से ज्यादा खतरनाक है.

जहां तक “हेक्सागन गठबंधन” की बात है, तो नाटकीय अंदाज़ से थोड़ा पीछे हटकर देखने की ज़रूरत है. फिलहाल यह ज्यादा बयानबाजी जैसा लगता है, ठोस हकीकत कम. किसी भी सरकार ने इसे सार्वजनिक रूप से समर्थन नहीं दिया है. जिन देशों—ग्रीस और साइप्रस—का नाम नेतन्याहू ने लिया, वे इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (आईसीसी) के सदस्य हैं.

गाज़ा के मामले में उनके खिलाफ कथित तौर पर आईसीसी का गिरफ्तारी वारंट लंबित है. ऐसे में अगर वे इन देशों में जाते हैं, तो कानूनी रूप से उन देशों को कार्रवाई करनी होगी. यही दिखाता है कि ऐसे बड़े गठबंधन बनाना कितना जटिल और नाजुक हो सकता है. कूटनीतिक भाषण अलग बात है, टिकाऊ गठबंधन बनाना अलग.

आमना बेगम अंसारी एक स्तंभकार और टीवी समाचार पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय आमना एंड खालिद’ नाम से एक साप्ताहिक यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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