प्रयागराज, 26 फरवरी (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पत्नी और तीन बच्चों की हत्या के आरोप में लगभग 23 साल से जेल में बंद एक व्यक्ति को इस आधार पर बरी कर दिया है कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्य से यह साबित नहीं हुआ कि यह अपराध उस व्यक्ति द्वारा किया गया।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की पीठ ने कहा कि यह मामला ‘‘हमारी आपराधिक न्याय व्यवस्था पर एक दुखद टिप्पणी है और इसका आत्म निरीक्षण करने की आवश्यकता है।’’
पीठ ने 16 फरवरी को दिए एक निर्णय में कहा कि न्यायाधीशों, उनके सहयोगी कर्मचारियों की संख्या और आधारभूत सुविधा बढ़ाना जैसे वास्तविक सुधारात्मक उपाय आज के समय की जरूरत है क्योंकि महज सम्मेलन और बैठकें आयोजित करने से स्थिति में सुधार नहीं होगा।
आरोपी को बरी करते हुए पीठ ने कहा कि उसका ‘‘वास्तविक दंड खत्म नहीं हुआ है, बल्कि उसकी रिहाई के बाद उसकी असल अग्नि परीक्षा शुरू होगी।’’
पीठ ने कहा, “उसके माता पिता और भाई बहन संभवतः जीवित नहीं होंगे। उसकी पत्नी और तीन बच्चों की पहले ही मौत हो चुकी है और उसका जीवित बेटा अजीम जिसकी उम्र 25-26 वर्ष हो गई होगी, अपने पिता का घर में स्वागत करेगा, यह भी निश्चित नहीं है।”
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, 29 अगस्त, 2003 की रात रईस ने घरेलू झगड़े के बाद अपनी पत्नी और तीन बच्चों का गला कथित रूप से एक चाकू से रेत कर उनकी हत्या कर दी थी। इस संबंध में उसकी पत्नी के चाचा ने प्राथमिकी दर्ज कराई थी। अधीनस्थ अदालत ने रईस को चार लोगों की हत्या का दोषी पाते हुए उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
हालांकि, रईस की अपील पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्य का परीक्षण किया और कथित प्रत्यक्षदर्शी रईस के बेटे अजीम के बयान पर गौर किया जिसकी घटना के समय उम्र पांच वर्ष थी।
अदालत ने जिरह के दौरान पाया कि उस बच्चे ने स्वीकार किया कि उसने ‘‘मुखबिर और एक सरकारी वकील के इशारे पर सिखाया गया बयान’’ दिया था। उसने स्वीकार किया कि उसे यह धमकी दी गई थी कि यदि वह निर्देश के मुताबिक बयान नहीं देगा तो उसे घर से निकाल दिया जाएगा।
अदालत ने यह भी पाया कि एक जमीन के विवाद को लेकर शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच पुरानी दुश्मनी थी जिससे शिकायतकर्ता की मंशा पर संदेह पैदा होता है। पीठ ने चिकित्सकीय साक्ष्य को भी संज्ञान में लिया जिसमें अपराध के लिए हथियार के इस्तेमाल पर विरोधाभास पाया गया।
मृतकों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से संकेत मिला कि वह घातक हमला किसी बहुत भारी हथियार से किया गया था जिससे मृतकों की गर्दन उनकी शरीर से लगभग अलग हो गई थी। इस तरह का घाव एक साधारण चाकू से नहीं हो सकता था।
इस प्रकार से अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए अपीलकर्ता को बरी कर दिया और किसी अन्य मामले में वांछित नहीं होने की स्थिति में उसे तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया।
भाषा सं राजेंद्र सिम्मी
सिम्मी
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