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Tuesday, 24 February, 2026
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एक वायरल बंदर, एक IKEA का प्लश टॉय और US सुप्रीम कोर्ट का फैसला: टैरिफ के बारे में क्या बताते हैं

पंच का अपने प्लश टॉय से लगाव उसके देश से नहीं, बल्कि उससे मिलने वाले आराम से है. इसी तरह, ग्राहक जियोपॉलिटिकल लेबल से ज्यादा भरोसे और डिजाइन को प्राथमिकता देते हैं.

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जापान में एक छोटा बंदर और सुप्रीम कोर्ट ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स आमतौर पर एक ही आर्थिक चर्चा का हिस्सा नहीं होते. हालांकि, इस हफ्ते एक अपवाद देखने को मिला.

Ichikawa City Zoo में, छह महीने के एक मकाक बंदर जिसका नाम पंच, या पंची-कुन है, अपनी मां द्वारा छोड़े जाने के बाद एक प्लश ओरंगुटान को पकड़े हुए था. इसका वीडियो पूरी दुनिया में वायरल हो गया. इसका असर सिर्फ भावनाओं तक सीमित नहीं रहा. रिपोर्ट बताती हैं कि पंच द्वारा पकड़े गए IKEA के प्लश टॉय की बिक्री कहानी फैलने के बाद तेज़ी से बढ़ गई और कई बाज़ारों में यह प्रोडक्ट आउट ऑफ स्टॉक हो गया.

इसी समय, वॉशिंगटन में, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डॉनाल्ड ट्रंप द्वारा इमरजेंसी टैरिफ पावर के इस्तेमाल को रद्द कर दिया, जिससे यह बहस फिर शुरू हो गई कि सरकारों को इंपोर्ट पर टैक्स कब और कैसे लगाना चाहिए.

एक वायरल बंदर, एक संवैधानिक फैसला और प्लश टॉय की बढ़ती बिक्री—ये सभी मिलकर एक महत्वपूर्ण सवाल उठाते हैं: जब किसी प्रोडक्ट पर टैरिफ लगाया जाता है, तो वास्तव में किस चीज पर टैक्स लगाया जा रहा होता है?

टैरिफ आखिर होते क्यों हैं

इस सवाल का जवाब देने से पहले, यह साफ करना ज़रूरी है कि टैरिफ अपने आप में गलत नहीं होते. कुछ टैरिफ के पीछे आर्थिक कारण होते हैं.

देश इनका इस्तेमाल डंपिंग का मुकाबला करने के लिए करते हैं, जिसमें विदेशी कंपनियां घरेलू प्रतिस्पर्धा खत्म करने के लिए सामान को लागत से कम कीमत पर बेचती हैं. जब प्रतिस्पर्धियों को सरकार से ज्यादा मदद मिलती है, तो देश एंटी-सब्सिडी ड्यूटी लगाते हैं. टैरिफ का इस्तेमाल करेंसी में गड़बड़ी के जवाब में भी किया जा सकता है, जिससे एक्सपोर्ट की कीमतें कृत्रिम रूप से कम हो जाती हैं. स्ट्रैटेजिक टैरिफ नए उद्योगों की सुरक्षा या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सेक्टर की रक्षा के लिए भी लगाए जा सकते हैं.

इसी वजह से विश्व व्यापार संगठन के नियम कुछ खास स्थितियों में एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग ड्यूटी की अनुमति देते हैं. ट्रेड डिफेंस के उपाय ज़रूरी होते हैं क्योंकि बाज़ार हमेशा पूरी तरह से बराबरी वाले नहीं होते. इसलिए, कुछ टैरिफ, खासकर जो टारगेटेड और नियमों पर आधारित होते हैं, उनके लिए मजबूत आधार मौजूद है.

हालांकि, पंच के हाथ में जो प्लश टॉय है, वह यह समझने का मौका देता है कि ग्लोबल सप्लाई चेन में टैरिफ कैसे काम करते हैं.

एक टॉय जिसका कोई पासपोर्ट नहीं

पंच जिस ओरंगुटान टॉय को पकड़े हुए है, वह संभवतः एक बंटी हुई ग्लोबल वैल्यू चेन का प्रोडक्ट है. इसका डिजाइन एक देश में बना हो सकता है, कच्चा माल दूसरे देश से आया हो सकता है और सिलाई व असेंबली तीसरे देश में हुई हो सकती है. शिपिंग नेटवर्क इसे समुद्र पार ले जाते हैं, जापान में रिटेलर इसे बेचते हैं और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इसकी लोकप्रियता बढ़ाते हैं. जब तक यह पंच तक पहुंचता है, तब तक इसमें कई देशों का योगदान शामिल होता है.

लेकिन टैरिफ आमतौर पर मानते हैं कि किसी प्रोडक्ट की एक ही नेशनलिटी होती है. जब कोई प्रोडक्ट सीमा पार करता है, तो उसे “विदेशी” कहा जाता है और उस पर टैक्स लगाया जाता है. यह सोच उस समय सही थी जब प्रोडक्शन एक ही जगह होता था, लेकिन जब प्रोडक्शन अलग-अलग देशों में होता है, तो यह ज्यादा जटिल हो जाता है.

अगर पंच के टॉय पर टैरिफ लगाया जाए, तो सवाल उठता है: इसका बोझ कौन उठाएगा? क्या विदेश में असेंबली प्लांट, या उसे डिजाइन करने वाली कंपनी, या उसे इंपोर्ट करने वाला घरेलू रिटेलर, या शिपिंग कंपनी, या ग्राहक, या वे घरेलू सप्लायर जिन्होंने पहले इसमें कुछ पार्ट दिए थे? इसका जवाब सीधा नहीं होता.

आज के ट्रेड में, टैरिफ सिर्फ देशों पर टैक्स नहीं लगाते; वे पूरी सप्लाई चेन पर टैक्स लगाते हैं.

असल में वैल्यू कहां होती है

टैरिफ पर चर्चा में एक चीज जिसे अक्सर नज़रअंदाज किया जाता है, वह है इंडस्ट्री में वैल्यू का बंटवारा. कई सेक्टर में, फाइनल असेंबली प्रोसेस कुल वैल्यू का सिर्फ एक छोटा हिस्सा होता है. इसके बजाय, डिजाइन, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी, ब्रांडिंग, लॉजिस्टिक्स, और रिटेल मार्जिन जैसे फैक्टर फाइनल कीमत तय करने में ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं. कई बार, यह गैर-भौतिक वैल्यू असली प्रोडक्शन की लागत से भी ज्यादा होती है. उदाहरण के लिए, पंच का अपने प्लश टॉय से लगाव उसके देश से नहीं, बल्कि उससे मिलने वाले आराम से है. इसी तरह, ग्राहक जियोपॉलिटिकल लेबल से ज्यादा भरोसा, पहचान, और डिजाइन को प्राथमिकता देते हैं.

जब बॉर्डर पर टैरिफ लगाया जाता है, तो यह प्रोडक्ट की पूरी घोषित वैल्यू को प्रभावित करता है. यह खास तौर पर उस हिस्से को टारगेट नहीं करता जो किसी सब्सिडी वाले फैक्ट्री में बना हो या जिसे करेंसी गड़बड़ी का फायदा मिला हो. इसका नतीजा यह होता है कि प्रोडक्ट से जुड़ी पूरी वैल्यू चेन की लागत बढ़ जाती है.

साफ आर्थिक बॉर्डर की सीमाएं

इसका मतलब यह नहीं है कि टारगेटेड ट्रेड उपाय गलत हैं. जब डंपिंग या गलत सब्सिडी के कारण बाज़ार में गड़बड़ी होती है, तो सुधार के कदम ज़रूरी होते हैं.

लेकिन बड़े टैरिफ, खासकर जब उन्हें किसी दूसरे देश पर टैक्स लगाने के तरीके के रूप में पेश किया जाता है, तो वे आज के प्रोडक्शन की जटिल सच्चाई को छुपा देते हैं. पंच के टॉय की वायरल सफलता इस जटिलता को दिखाती है. अलग-अलग बाज़ारों में इसकी बढ़ती बिक्री दिखाती है कि कैसे ध्यान को कमाई में बदला जा सकता है और यह राष्ट्रीय सीमाओं से आगे निकल जाता है. अब इस प्रोडक्ट की भावनात्मक और डिजिटल लोकप्रियता, इसकी मैन्युफैक्चरिंग लागत से काफी ज्यादा हो सकती है.

फिर भी, ट्रेड पॉलिसी अभी भी भौतिक बॉर्डर पर ही काम करती है. वायरल बंदर और टैरिफ की शक्ति पर संवैधानिक बहस एक बुनियादी तनाव को दिखाती है. पॉलिसी बनाने वाले विदेशी सामान पर टैक्स की बात करते हैं, जबकि कंपनियां कई देशों के नेटवर्क में काम करती हैं और ग्राहक देश के बजाय ब्रांड और कीमत को प्राथमिकता देते हैं. पंच के हाथ में जो प्लश ओरंगुटान है, वह सभी टैरिफ के खिलाफ तर्क नहीं देता; बल्कि यह याद दिलाता है कि आज की अर्थव्यवस्था में, टैरिफ शायद ही कभी सिर्फ एक देश को निशाना बनाता है. इसके बजाय, यह आपस में जुड़े कई लोगों और संस्थाओं के नेटवर्क को प्रभावित करता है.

एक ग्लोबलाइज्ड इकोनॉमी में, जहां एक साधारण स्टफ्ड टॉय भी अलग-अलग महाद्वीपों में बनता है, पूरी तरह से विदेशी प्रोडक्ट की धारणा आर्थिक सच्चाई से ज्यादा राजनीतिक शॉर्टकट है. टैरिफ पर कोई भी गंभीर चर्चा इस सच्चाई को स्वीकार करने से शुरू होनी चाहिए.

बिदिशा भट्टाचार्य चिंतन रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @Bidishabh है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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