नई दिल्ली: पहाड़ों में ऊंचाई पर रहने वाले लोगों में समुद्र तल पर रहने वालों की तुलना में टाइप 2 डायबिटीज होने की संभावना कम होती है. यह रुझान एंडीज, हिमालय और अन्य ऊंचाई वाले इलाकों की आबादी में देखा गया है.
वैज्ञानिक लंबे समय से मानते रहे हैं कि पतली हवा, जहां ऑक्सीजन का स्तर कम होता है, शरीर के ऊर्जा संभालने के तरीके को बदल देती है. ऊंचाई पर शरीर ज्यादा कैलोरी जलाता है, ज्यादा लाल रक्त कोशिकाएं बनाता है और खून में मौजूद मुख्य शुगर यानी ग्लूकोज का इस्तेमाल करने का तरीका बदल देता है. लेकिन डायबिटीज का खतरा कम क्यों होता है, इसका असली जैविक कारण साफ नहीं था.
ग्लैडस्टोन इंस्टीट्यूट्स के शोधकर्ताओं को अब लगता है कि उन्हें इसका जवाब मिल गया है.
19 फरवरी को सेल मेटाबॉलिज्म नाम की सेल प्रेस जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी में पाया गया कि लाल रक्त कोशिकाएं यानी आरबीसी, जिन्हें ऑक्सीजन ढोने के लिए जाना जाता है, ऑक्सीजन कम होने पर ग्लूकोज की बड़ी खपत करने लगती हैं. यह खोज आरबीसी को सिर्फ ऑक्सीजन ढोने वाला निष्क्रिय वाहक मानने की पुरानी सोच को चुनौती देती है. स्टडी बताती है कि कम ऑक्सीजन की स्थिति में ये कोशिकाएं “ग्लूकोज सिंक” की तरह काम करती हैं, यानी खून से शुगर खींचकर अपने अंदर लेती हैं और ऑक्सीजन पहुंचाने की क्षमता सुधारने में उसका उपयोग करती हैं.
“लाल रक्त कोशिकाएं ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म का एक छिपा हुआ हिस्सा हैं, जिसे अब तक सही तरह से समझा नहीं गया था,” सीनियर लेखक ईशा जैन ने कहा जो ग्लैडस्टोन की शोधकर्ता और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन फ्रांसिस्को में बायोकैमिस्ट्री की प्रोफेसर हैं.
उन्होंने कहा कि यह खोज ब्लड शुगर को संभालने के नए रास्ते खोलती है.
यह भारत के संदर्भ में खास तौर पर महत्वपूर्ण है. इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, 20 से 79 साल के कम से कम 7.7 करोड़ भारतीय डायबिटीज के साथ जी रहे थे और यह संख्या 2045 तक 13.42 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद थी. 2017 में केवल डायबिटीज पर ही एक औसत भारतीय परिवार की कमाई का लगभग 5 से 25 प्रतिशत खर्च हो जाता था. डायबिटीज प्रबंधन पर लगभग 31 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च होते थे.
RBC: एक ‘ग्लूकोज सिंक’
इस स्टडी का विचार पहले किए गए प्रयोगों से आया, जिनमें चूहों को हाइपोक्सिया यानी कम ऑक्सीजन वाली स्थिति में रखा गया, जैसा ऊंचाई वाले इलाकों में होता है. इन चूहों में शुरुआत में ब्लड शुगर कम पाया गया.
खाना खाने के बाद उनके खून से शुगर सामान्य से कहीं ज्यादा तेजी से गायब हो जाती थी. कम ब्लड शुगर को आम तौर पर डायबिटीज के कम खतरे से जोड़ा जाता है.
लेकिन यहां एक रहस्य था.
जब शोधकर्ताओं ने उन मुख्य अंगों की जांच की जो आम तौर पर शुगर का उपयोग करते हैं, जैसे लिवर, मांसपेशियां और दिमाग, तो वे समझ नहीं पाए कि सारी शुगर कहां चली गई.
खास स्कैनिंग टूल्स की मदद से वैज्ञानिकों ने एक अनपेक्षित खोज की. आरबीसी बहुत ज्यादा शुगर सोख लेती हैं. कम ऑक्सीजन की स्थिति में चूहों ने न सिर्फ ज्यादा लाल रक्त कोशिकाएं बनाईं, बल्कि हर एक आरबीसी ने सामान्य से ज्यादा शुगर का इस्तेमाल किया.
आगे जांच करने पर पता चला कि आरबीसी अतिरिक्त शुगर का उपयोग इस बात की रफ्तार बढ़ाने के लिए कर रही थीं कि वे शरीर के ऊतकों तक ऑक्सीजन कितनी तेजी से पहुंचाती हैं. यह खास तौर पर तब जरूरी होता है जब ऑक्सीजन कम हो.
सरल शब्दों में, ये कोशिकाएं शुगर को ईंधन की तरह इस्तेमाल कर रही थीं ताकि ऑक्सीजन की आपूर्ति बेहतर हो सके. नतीजतन, खून में कम शुगर बचती थी.
क्या इससे डायबिटीज का इलाज हो सकता है.
यह असर तुरंत खत्म नहीं हुआ. चूहों को सामान्य ऑक्सीजन वाले माहौल में वापस लाने के बाद भी उनका बेहतर ब्लड शुगर नियंत्रण कई हफ्तों या महीनों तक बना रहा.
शोधकर्ताओं ने हाइपोक्सीस्टैट नाम की एक नई दवा का भी परीक्षण किया. यह दवा शरीर में कम ऑक्सीजन जैसे कुछ प्रभाव पैदा करने के लिए बनाई गई है. इसे पहले माइटोकॉन्ड्रियल बीमारियों के इलाज के लिए विकसित किया गया था. ये दुर्लभ आनुवंशिक रोग होते हैं जिनमें कोशिकाएं पर्याप्त ऊर्जा नहीं बना पातीं.
हीमोग्लोबिन, जो लाल रक्त कोशिकाओं में ऑक्सीजन ढोने वाला प्रोटीन है, उसके ऑक्सीजन से जुड़ने के तरीके को बदलकर हाइपोक्सीस्टैट दवा ऊतकों तक पहुंचने वाली ऑक्सीजन की मात्रा को नियंत्रित करती है और कोशिकाओं के ऊर्जा संतुलन को बेहतर बनाती है.
नई स्टडी में वैज्ञानिकों ने पहले यह जांचा कि क्या यही तरीका ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है. डायबिटीज वाले चूहों में हाइपोक्सीस्टैट ने उच्च ब्लड ग्लूकोज स्तर को काफी कम किया और कुछ मामलों में सामान्य इलाज से बेहतर प्रदर्शन किया.
फिलहाल डायबिटीज का इलाज दवाओं से किया जाता है, जैसे इंसुलिन इंजेक्शन, मेटफॉर्मिन जो लिवर में ग्लूकोज बनने को कम करता है, एसजीएलटी2 इनहिबिटर जो किडनी के जरिए अतिरिक्त शुगर को पेशाब के साथ बाहर निकालने में मदद करते हैं, या जीएलपी-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट जो इंसुलिन स्राव बढ़ाते हैं और भूख कम करते हैं.
ये इलाज मुख्य रूप से इंसुलिन के काम या अग्न्याशय, लिवर और किडनी जैसे अंगों को निशाना बनाते हैं.
“माइटोकॉन्ड्रियल बीमारी के बाहर हाइपोक्सीस्टैट का यह शुरुआती उपयोगों में से एक है,” लेखक ने कहा. “यह डायबिटीज के इलाज को बिल्कुल अलग तरीके से सोचने का रास्ता खोलता है. यानी लाल रक्त कोशिकाओं को ग्लूकोज सिंक के रूप में इस्तेमाल करके.”
स्टडी के महत्व को समझाते हुए, फोर्टिस सी-डॉक हॉस्पिटल फॉर डायबिटीज एंड एलाइड साइंसेज, नई दिल्ली के चेयरपर्सन डॉ. अनूप मिश्रा ने दिप्रिंट से कहा, “यह एक महत्वपूर्ण पशु अध्ययन लगता है जो लाल रक्त कोशिकाओं में ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म को समझने के लिए एक नया अध्याय खोलता है.”
“सख्त और सक्रिय जीवनशैली के साथ मिलकर, यह ऊंचाई पर रहने वालों में डायबिटीज के कम प्रसार को दिखा सकता है. हालांकि, नए संभावित इलाज की दिशा में आगे बढ़ने के लिए इंसानों में साफ प्रमाण की जरूरत है,” उन्होंने जोड़ा.
दुनियाभर में करोड़ों लोगों को प्रभावित करने वाली डायबिटीज के बीच, यह स्टडी ब्लड शुगर नियंत्रण के लिए उम्मीद की किरण है. लाल रक्त कोशिकाओं में इस मेटाबॉलिक बीमारी से लड़ने की अब तक अनछुई क्षमता हो सकती है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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