हमीरपुर (उत्तर प्रदेश): धनी राम, 88, अपने एक कमरे वाले मिट्टी के घर के बाहर बैठे हैं, और कुछ बड़बड़ा रहे हैं जिसे कोई सुन और समझ नहीं सकता. उसका पतला, कांपता हुआ शरीर दीवार से टिका हुआ है. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अभी हाल ही में उन्हें 40 साल पुरानी हत्या के मामले से बरी किया है.
लेकिन धनी राम समय के गुजरने और देरी से मिली न्याय की परवाह नहीं करते. वह आखिरकार आज़ाद हैं. लेकिन इसके बारे में पूछे जाने पर वह केवल बड़बड़ाते हैं, “क्या… क्या… क्या?”
उनकी याददाश्त कमजोर हो गई है, सुनाई नहीं देता, समझ नहीं आता. उनकी आज़ादी केवल कागज़ों पर है, जबकि वह वर्षों के खोए हुए समय का मौन गवाह बने रहते हैं.
उनके बेटे लल्लू राम, 42, ने कहा, “वह इसे समझ नहीं पाते, लेकिन अब वह सचमुच आज़ाद हैं. हालांकि यह बहुत देर से हुआ, फिर भी हम खुश हैं कि मेरे पिता को उस मामले से मुक्त कर दिया गया, जिसमें उन्हें फंसाया गया था और जिसमें वह इतने लंबे समय तक उलझे रहे.”
धनी राम के लिए यह फ़ैसला शायद ज्यादा मायने नहीं रखता. सालों में अदालत के समन आते रहे, वकीलों ने सुनवाई संभाली, और उनके आस-पास जीवन चलता रहा. बरी होने का यह फ़ैसला तब आया है जब समय और उम्र ने इसकी सारी अहमियत छीन ली है.
“मैं उस समय बहुत छोटा था, इसलिए मुझे कुछ भी याद नहीं. मैं उसी समय के आसपास पैदा हुआ था. मेरे पिता हमेशा जमानत पर बाहर रहते थे, खेतों में काम करते हुए हम बड़े हो रहे थे. हम कभी उस मामले के बारे में बात नहीं करते थे. वह कभी किसी पुलिस स्टेशन या अदालत में नहीं गए.”
भुवसी के प्रधान और धनी राम के बेटे लल्लू राम
गांव में, यह मामला रोज़मर्रा की बातचीत से लंबे समय पहले गायब हो गया था. कई लोगों को इसके बारे में केवल यह पता था कि यह किसी पुराने समय की बात है.
गांव के निवासी पर्मेश ने कहा, “हमें पता था कि उनके साथ कोई पुराना मामला जुड़ा था, लेकिन हम कभी इसके बारे में बात नहीं करते थे. यह कई दशक पुरानी बात है, और उस समय के लोग अब गांव में मौजूद नहीं हैं.”
यह मामला 1982 में शुरू हुआ, जब एक ज़मीन विवाद हत्या में बदल गया. धनी राम पर दो अन्य लोगों के साथ आरोप लगे—माइकू, जो घटना के बाद फरार हो गया, और सत्ती दीन, जो मुकदमे के दौरान मृत्यु हो गई. धनी राम अकेले अदालतों की कार्रवाई का सामना करते रहे. हालांकि उन्हें 1984 में जमानत मिल गई थी, उनके दोषसिद्धि के खिलाफ अपील दशकों तक चली.
गांव से उनके साथियों और पीड़ित के परिवार के चले जाने के बाद, धनी राम की ज़िंदगी पर केवल लंबा कानूनी साया ही रह गया.
फिर 21 जनवरी 2026 को, जस्टिस चंद्रधारी सिंह और संजिव कुमार की अगुवाई वाली डिवीजन बेंच ने, हमीरपुर सेशंस कोर्ट द्वारा 1984 में सुनाई गई आजीवन कारावास की सज़ा को पलट दिया. उन्होंने सबूतों में मौजूद गंभीर कमियों और धनी राम को असाधारण देरी के कारण हुई पीड़ा की ओर भी ध्यान दिलाया.
बेंच ने कहा, “जहां अपराध अपनी संदेह से परे साबित नहीं होता, वहां न्याय, निष्पक्षता और मानव गरिमा के अनुरूप एकमात्र परिणाम पूर्ण बरी करना ही है.”
कैसे एक ज़मीन का विवाद चार दशक तक चले मुकदमे में बदल गया
1982 में, भुवसी गांव में कृषि भूमि विवाद ने एक खतरनाक रूप ले लिया. धनी राम, उस समय अपने शुरुआती चालीस के दशक में, एक ग्रामीण गुनुवा की हत्या के आरोप में फंस गए, उनके साथ उनके भाई सत्ती दीन और भतीजा माइकू भी शामिल थे.
जहाँ यह घटना हुई थी, वह जगह अब यादों और कागज़ों में भी लगभग मिट चुकी है.
बिजेश लाल, 50, भुवसी निवासी, ने कहा, “किसी को भी सही-सही याद नहीं है कि वह जगह कहां थी. अब वहां नए घर, दुकानें और खेत बन गए हैं.”
ज्यादातर पुराने निवासी मर चुके हैं या गांव छोड़ चुके हैं, इसलिए मामले का विवरण अब मुख्यतः अदालत के रिकॉर्ड में ही मौजूद है.
गुनुवा के भाई राजा भैया ने 9 अगस्त 1982 को मऊदाहा पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज कराई, जिसमें एक भयंकर हत्या का विवरण है. एफआईआर में कहा गया कि वह और गुनुवा पानी लाकर लौट रहे थे, तभी तीन लोगों ने उन पर हमला कर दिया: माइकू पिस्टल के साथ, सत्ती दीन भाला लिए, और धनी राम कुल्हाड़ी लिए हुए. एफआईआर में यह भी कहा गया कि दोनों पुरुषों ने माइकू को उकसाया ताकि वह गुनुवा की जान ले ले. माइकू ने कथित तौर पर पीड़ित को पीठ में गोली मारी, जबकि सत्ती दीन ने भाले से वार किया. गुनुवा वहीं मौत के घाट उतर गया.
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, पुलिस टीम के साथ उप-निरीक्षक करुणा शंकर शुक्ला ने अगले दिन गांव में पहुंच कर सबूत जुटाए. टीम ने खून से सनी मिट्टी, गोली के खोल, मृतक द्वारा पहनी हुई धोती, और एक मिट्टी का बर्तन एकत्र किया. गांव के रामा, करैयलाल, मुकंदो, और परमा से बयान लिए गए, जिन्होंने हमले का साक्षी देखा था. पोस्टमार्टम 11 अगस्त 1982 को किया गया.

सभी आरोपियों ने शुरू में गिरफ्तारी से बचने की कोशिश की, लेकिन धनी राम ने 18 अगस्त को आत्मसमर्पण कर दिया.
“लोग चार-चार हत्या के मामले झेलकर भी खुले घूमते हैं, तो भला कोई 40 साल पुराने मामले को क्यों याद रखेगा? अगर फ़ैसला थोड़ा और देर से आता, तो धनी को इसके बारे में जाने बिना ही मौत आ जाती.”
– कल्लू राम, 60, भुवसी निवासी
पीड़ित का परिवार घटना के कुछ समय बाद ही गाँव से गायब हो गया.
एक पड़ोसी ने कहा, “हमें नहीं पता कि गुनुवा का परिवार कहां चला गया.” अदालत में मामला चलने के बावजूद, हत्या की चर्चा चौपाल से धीरे-धीरे खत्म हो गई.
1984 में, हमीरपुर सेशंस कोर्ट ने धनी राम और सत्ती दीन को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 34 के तहत दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई. दोनों ने इस फैसले के खिलाफ अपील की. धनी राम को 1984 में जमानत मिल गई, जबकि सत्ती दीन की हाई कोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान मृत्यु हो गई. लेकिन धनी राम की दोषसिद्धि को रद्द कराने की अपील अगले चार दशकों तक आगे नहीं बढ़ सकी.

लल्लू राम ने कहा, “मैं उस समय बहुत छोटा था, क्योंकि मेरा जन्म उसी दौर में हुआ था. जब हम बड़े हो रहे थे, तब मेरे पिता हमेशा जमानत पर बाहर रहते थे और खेतों में काम करते थे. हमने कभी उस मामले के बारे में बातचीत नहीं की. वह कभी किसी पुलिस स्टेशन या अदालत नहीं गए.”
जब धनी राम की मानसिक स्थिति कमजोर होने लगी, तब वकील से संपर्क बनाए रखने की जिम्मेदारी लल्लू ने संभाली. खबरें बहुत कम मिलती थीं, और सालों बीतते गए बिना किसी साफ नतीजे के. फिर एक दिन वह फोन आया, जिसने दशकों की अनिश्चितता को खत्म कर दिया.
लल्लू राम ने कहा, “जनवरी में ही वकील का फोन आया और उन्होंने हमें फैसले की जानकारी दी.”
गांव में फुसफुसाहटें
लल्लू राम भुवसी में काफी प्रभाव रखते हैं. चार साल पहले वह गांव के प्रधान चुने गए थे. जहां बेटा पूरे गांव का नेतृत्व करता है, वहीं उनके पिता धनी राम एक कमरे के मिट्टी के घर में अकेले रहते हैं. कभी-कभार लल्लू राम, उनकी पत्नी और उनके दो बच्चे उनसे मिलने आ जाते हैं.
अब जाकर लल्लू राम को उत्सुक ग्रामीणों और मीडिया के लोगों के सवालों का सामना करना पड़ रहा है, जो 40 साल से भी पुराने अपराध की यादों को कुरेदने की कोशिश कर रहे हैं.

हत्या के आरोप का दाग अगली पीढ़ी तक नहीं पहुंचा. लल्लू राम की शादी 18 साल पहले हुई थी, लेकिन उनकी पत्नी लज्जावती को इस केस की ज्यादा जानकारी नहीं थी.
लज्जावती ने कहा, “मुझे बस इतना पता था कि मेरे ससुर पर किसी जमीन विवाद के मामले में आरोप लगा था, लेकिन मुझे कोई विवरण नहीं मालूम था. जब मैंने अपने पति से पूछने की कोशिश की, तो उन्हें भी कुछ याद नहीं था.”
गांव के किनारे एक छोटी किराना दुकान के पास कुछ लोग—बूढ़े और युवा—खड़े बातचीत कर रहे थे. जैसे ही उन्होंने प्रधान के घर के पास अनजान लोगों की भीड़ देखी, उनकी आवाज़ धीमी हो गई और हंसी थम सी गई. कुछ राहगीर भी रुककर देखने लगे.
लेकिन गांव के ज्यादातर बुजुर्ग इस मामले पर ज्यादा बात नहीं करना चाहते.

बिजेश ने कहा, “यह भी वैसे ही एक जमीन का विवाद था, जैसा हर जगह होता है. कौन इन बातों को याद रखता है?”
सरसों के खेत के किनारे बैठे 60 साल के कल्लू राम ने भी इसी तरह की बात कही.
दशकों की देरी
हमीरपुर जिला अदालत की एक सर्द सुबह में, काले कोट पहने वकील इधर-उधर घूम रहे थे और फाइलों के बंडल एक लकड़ी की मेज से दूसरी मेज पर जा रहे थे. यहीं धनी राम की केस फाइल सालों तक धूल खाती रही, जब तक कि कुछ महीने पहले उसे इलाहाबाद हाई कोर्ट भेजा नहीं गया.
हमीरपुर जिला अदालत में एक तरह की उदासीनता और थकान साफ दिखाई देती है. वकील लंबी देरी और न्याय प्रणाली की “तारीख़ पर तारीख़” की परंपरा के साथ जीने के आदी हैं. धनी राम कोई असाधारण मामला नहीं हैं. वह तो उस व्यवस्था की सामान्य तस्वीर का हिस्सा हैं, जो अदालतों पर पड़े बोझ की कहानी को और मजबूत करती है.
एक वकील ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “ऐसे सैकड़ों मामले फाइलों के नीचे दबे पड़े हैं. लेकिन सब इसी की बात क्यों कर रहे हैं? क्योंकि मीडिया ने इसे ‘100 साल के बुज़ुर्ग’ का मामला बना दिया है.”
“लल्लू राम 2018 में यह मामला लेकर मेरे पास आए थे. मैं उनसे इलाहाबाद में दो-तीन बार मिला, लेकिन मेरी कभी धनी राम से मुलाकात नहीं हुई. उम्र के कारण वह न कभी अदालत आए, न फोन किया.”
रमेश प्रजापति, 46, वकील
अब धनी राम की फाइल को हाई कोर्ट की प्रक्रिया के तहत डिजिटल किया जा रहा है, ताकि पुराने रिकॉर्ड इलेक्ट्रॉनिक रूप में सुरक्षित हो सकें. हाथ से लिखी गई एफआईआर और ट्रायल की कार्यवाही जल्द ही कंप्यूटर स्क्रीन पर उपलब्ध होगी.
इस मामले में मोड़ 2018 में आया, जब लल्लू राम को पता चला कि उनका पुराना वकील अदालत में पेश नहीं हो रहा है. तब उन्होंने अधिवक्ता रमेश प्रजापति से संपर्क किया.
मामला संभालने के बाद, प्रजापति ने जल्दी सुनवाई की तारीख की मांग शुरू की. उन्होंने अदालत को धनी राम की बढ़ती उम्र और अपील में हो रही असाधारण देरी की ओर ध्यान दिलाया. अदालत ने इस पर ध्यान दिया.

सालों में कई सुनवाई हुईं, जिनमें सरकारी वकील ने अभियोजन पक्ष रखा. लेकिन हाई कोर्ट में धनी राम के खिलाफ कोई गवाह पेश नहीं हुआ.
रमेश प्रजापति ने कहा, “मामले की ज्यादातर जानकारी मैं फोन पर लल्लू राम को देता था. यह अकेला ऐसा पुराना मामला नहीं था जिसे मैं देख रहा था. ऐसे मामलों में समय लगता है, क्योंकि हर सुनवाई के बाद अक्सर अगली तारीख मिल जाती है.”
जब हाई कोर्ट ने मामले की गहराई से जांच की, तो अभियोजन पक्ष की कहानी में गंभीर कमियाँ पाईं. गवाहों के बयान, एफआईआर और मेडिकल सबूतों में विरोधाभास थे. अदालत ने कहा कि मुखबिर राजा भैया को पूरी तरह विश्वसनीय नहीं माना जा सकता. धनी राम ने घातक गोली नहीं चलाई थी, और यह आरोप कि उन्होंने हमलावर को उकसाया, कमजोर गवाही पर आधारित था.
जिरह के दौरान यह भी सामने आया कि गुनुवा की हत्या किसी दूसरे समूह ने भी की हो सकती है, जिन्हें पहले उसके एक और भाई की हत्या में दोषी ठहराया गया था.
अदालत ने कहा, “जब घटना की शुरुआत और तरीका ही संदेह के घेरे में हो, तो अपीलकर्ताओं को दोषी नहीं ठहराया जा सकता,” और इसके लिए 2016 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला दिया.
अदालत ने 2025 के सुप्रीम कोर्ट के एक मामले, स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश बनाम श्यामलाल, का भी उल्लेख किया, जिसमें तीन दशक से अधिक समय तक लंबित अपील वाले बुज़ुर्ग आरोपी की हत्या की सजा को घटाकर गैर-इरादतन हत्या में बदल दिया गया था.
अदालत ने कहा, “जब व्यवस्था स्वयं उचित समय में अंतिम निर्णय देने में असफल रही हो, तो राहत देते समय अदालतों का संतुलित और मानवीय दृष्टिकोण अपनाना उचित है,” और धनी राम को बरी कर दिया.
रमेश प्रजापति ने कहा, “लंबे इंतजार के बाद यह फैसला जरूरी था. न्याय प्रणाली पर पुराने मामलों का बहुत दबाव है, इसलिए जब गवाह और सबूत कमजोर हों, तो ऐसे मामलों में देरी हो जाती है. वह 42 साल बाद फैसला पाने के लिए भी खुद को भाग्यशाली मान सकते हैं. कई लोगों को न्याय तब मिलता है, जब वे इस दुनिया में नहीं रहते.”
भुवसी में, धनी राम की जिंदगी अपील की प्रतीक्षा के दौरान कभी पूरी तरह रुकी नहीं. लेकिन उनकी साधारण जिंदगी के पीछे, अदालत या पुलिस स्टेशन से बुलावे की संभावना हमेशा बनी रही, भले ही वह इसके बारे में कम बोलते थे.
लल्लू राम ने कहा, “मामले का बोझ हमेशा बना रहा.”
अब आखिरकार बेगुनाह साबित होने के बाद भी धनी राम के पास कहने के लिए कोई विजयी शब्द नहीं हैं. वह अपने ऊपर बरसते सवालों को सुन भी नहीं पा रहे थे. माइक्रोफोन लिए खड़े लोगों की भीड़ की ओर इशारा करते हुए उन्होंने बस इतना कहा.
धनी राम ने कहा, “आओ, यहां बैठो.”
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