नई दिल्ली: भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 12 फरवरी को कर्नाटक के कलबुर्गी जिले की लाडले मशक दरगाह की प्रबंध समिति के सचिव की उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें परिसर में महाशिवरात्रि पूजा कराए जाने से रोक लगाने की मांग की गई थी.
पिछले साल फरवरी में कर्नाटक हाई कोर्ट ने 15 श्रद्धालुओं को उस स्थल पर राघव चैतन्य शिवलिंग पर महाशिवरात्रि के अनुष्ठान करने की अनुमति दी थी. यह आदेश 2022 में दरगाह में धार्मिक अधिकारों को लेकर हुए सांप्रदायिक तनाव के बाद हिंदू श्रद्धालुओं द्वारा दायर याचिका पर आया था.
दरगाह समिति के सचिव की ताजा याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया गया था कि स्थल पर किसी भी तरह का निर्माण या बदलाव रोका जाए, जिससे उसके धार्मिक स्वरूप में परिवर्तन हो सकता है. सचिव ने अनुच्छेद 32 का हवाला दिया था, जो नागरिकों को अपने मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने की अनुमति देता है.
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की दो जजों की बेंच ने कहा कि जब मामला पहले से ही कर्नाटक हाई कोर्ट में लंबित है, तब संविधान के अनुच्छेद 32 का सहारा नहीं लिया जा सकता.

लाडले मशक दरगाह की याचिका विवादित धार्मिक स्थलों को लेकर बढ़ती कानूनी और संवैधानिक लड़ाई को सामने लाती है. यह ऐतिहासिक पूजा स्थलों की स्थिति और उपयोग को चुनौती देने वाली याचिकाओं के व्यापक रुझान को दिखाती है. दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट का दखल देने से इनकार करना यह भी दर्शाता है कि न्यायपालिका कई लंबित विवादों, जिनमें ज्ञानवापी जैसे चर्चित मामले भी शामिल हैं, के बीच यथास्थिति बनाए रखने की कोशिश कर रही है.
दरगाह समिति के सचिव की याचिका में यह कहा गया था कि अदालतों से अंतरिम आदेश लेकर धार्मिक स्थलों के स्वरूप को बदलने की कोशिशों का एक “गंभीर रूप से चिंताजनक” पैटर्न सामने आ रहा है. इसमें आरोप लगाया गया था कि हर साल महाशिवरात्रि के दौरान प्रवेश की अनुमति मांगी जाती है, लेकिन बाद में वही अनुमति स्थायी प्रथा में बदल जाती है. याचिका में यह भी कहा गया था कि लाडले मशाक दरगाह 14वीं सदी के एक सूफी संत और 15वीं सदी के एक हिंदू संत से जुड़ी है और ऐतिहासिक रूप से यह साझा पूजा स्थल रहा है.
पूजा स्थल अधिनियम, 1991
इससे पहले 12 दिसंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने देश भर की अदालतों को निर्देश दिया था कि पूजा स्थलों के धार्मिक स्वरूप से जुड़े लंबित मुकदमों में कोई अंतरिम या अंतिम आदेश, या सर्वे का निर्देश, न दिया जाए.
यह निर्देश 1991 के पूजा स्थल विशेष प्रावधान अधिनियम से जुड़ा है. यह कानून 15 अगस्त 1947 को जैसे पूजा स्थल थे, उनके धार्मिक स्वरूप को उसी स्थिति में बनाए रखने का प्रावधान करता है और अदालतों को उस स्थिति को बदलने से जुड़ी याचिकाएं सुनने से रोकता है.
इस कानून के तहत केवल राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद को अपवाद के रूप में रखा गया था.
हालांकि, 2019 के अयोध्या फैसले के बाद यह पहली बार नहीं है कि कोई धार्मिक विवाद अदालतों तक पहुंचा हो.
पिछले छह वर्षों में ऐसे कई मामले अदालतों में पहुंचे हैं.
उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में ज्ञानवापी मस्जिद, शाही ईदगाह मस्जिद, जौनपुर की अटाला मस्जिद, संभल की शाही जामा मस्जिद, लखनऊ की टीले वाली मस्जिद और बदायूं की शम्सी जामा मस्जिद से जुड़े विवाद अदालतों में सुने गए हैं.
उत्तर प्रदेश के बाहर, दिल्ली की कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद, अजमेर शरीफ दरगाह, भोजशाला कमाल मौला मस्जिद, सिकंदर बादूशा दरगाह और मलाली जुम्मा मस्जिद भी ऐसे विवादों का सामना कर चुके हैं और इन पर याचिकाएं अदालतों में दायर हुई हैं.
इन धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों में बढ़ोतरी का कारण 2019 के अयोध्या फैसले को बताते हुए एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड श्रीराम परक्कट ने दिप्रिंट से कहा, “जब अयोध्या का फैसला आया, तो उसने कई स्थानों को हिंदू मंदिर घोषित करने के लिए पेंडोरा बॉक्स खोल दिया.”

परक्कट ने यह भी कहा कि इन में से कई मुकदमे सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत दायर किए गए और 1991 के कानून के संदर्भ में चुनौती दिए गए. उन्होंने कहा, “सीपीसी के तहत अगर कोई मुकदमा ट्रायल में जाता है, तो अगले चरण में सबूत जुटाने पड़ते हैं. लेकिन 13वीं सदी के दावों के लिए सबूत कैसे पेश किए जाएंगे? जैसे ही स्थगन हटेगा, ऐसे मामलों की संख्या बढ़ेगी.”
पिछले साल फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने अपने सामने आ रहे ऐसे धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों की बढ़ती संख्या पर नाराजगी जताई थी. उस समय के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने कहा था, “याचिकाएं दायर करने की भी एक सीमा होती है. अब बहुत हो चुका.”
उस समय सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि जब तक 1991 के कानून को लेकर कोई नया कानूनी आधार न हो, वह इस कानून से जुड़ी और याचिकाएं स्वीकार नहीं करेगा. अदालत को यह भी बताया गया था कि केंद्र सरकार ने अब तक 1991 के कानून को चुनौती देने वाली लंबित याचिका पर अपना जवाब दाखिल नहीं किया है.
1991 के कानून को चुनौती
धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों पर दायर याचिकाओं के कारण असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और पूजा स्थल विशेष प्रावधान अधिनियम 1991 को सख्ती से लागू करने की मांग की.
मौजूदा याचिका में भी यह कहा गया कि धार्मिक स्थलों के स्वरूप में कोई बदलाव न हो और कानून को सही तरीके से लागू किया जाए.
पिछले साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने ओवैसी की उस याचिका को, जिसमें 1991 के कानून को लागू करने की मांग की गई थी, अन्य याचिकाओं के साथ जोड़ दिया. ये याचिकाएं सुब्रमण्यम स्वामी और अश्विनी कुमार उपाध्याय जैसे राजनीतिक नेताओं और वकीलों ने दायर की थीं. उन्होंने 1991 के कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी और कहा था कि यह संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है.
स्वामी और उपाध्याय की याचिका में कहा गया कि 1192 के बाद से मुस्लिम शासकों और बाद में अंग्रेजों जैसी विदेशी ताकतों ने भारत के कुछ हिस्सों पर शासन किया और मंदिरों को तोड़ा.
उन्होंने कहा कि 15 अगस्त 1947 के बाद किसी पूजा स्थल के धार्मिक स्वरूप में बदलाव पर रोक लगाने वाला यह कानून हिंदुओं, सिखों, जैनों और बौद्धों को अपने पूजा स्थलों को पुनर्स्थापित करने से रोकता है और उनके समानता और भेदभाव से मुक्त होने के अधिकार का उल्लंघन करता है.
कानूनी विशेषज्ञ क्या कहते हैं
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश राजीव शकधर ने दिप्रिंट से कहा कि 1991 का कानून 15 अगस्त 1947 को जैसे पूजा स्थल थे, उनके धार्मिक स्वरूप को उसी स्थिति में स्थिर कर देता है. इससे इन ढांचों के नीचे क्या है, यह पता करने के लिए खुदाई या खुदाई करने से रोका जाता है. उन्होंने कहा कि ऐसा करना सभी समुदायों के हित के खिलाफ होगा.
पूर्व दिल्ली हाई कोर्ट जज ने कहा कि 1991 का कानून सभी समुदायों जैसे हिंदू, सिख, मुस्लिम और ईसाई के बीच सद्भाव बनाए रखने के लिए लाया गया था. उन्होंने कहा कि भारत कई बोलियों, अलग-अलग धर्मों, जनजातियों और पंथों का देश है.
उन्होंने कहा, “हिंदू धर्म के भीतर भी शैव और वैष्णव जैसे कई पंथ हैं और जनजातियां हैं जो अलग अलग रीति रिवाज और परंपराएं मानती हैं.”
जज ने कहा कि ऐसे मामलों को स्वीकार करना कई नई समस्याओं को जन्म दे सकता है. उन्होंने कहा, “अगर कल किसी जनजाति ने अपने देवता का एक मंदिर बनाया है, तो क्या आप उसे खोदकर कहेंगे कि यह किसी और का है? मेरी राय में, ऐसे मामलों में सर्वे की अनुमति देना कानून के उद्देश्य और मकसद को पूरी तरह खत्म कर देगा.”
जस्टिस शकधर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को इस मुद्दे को पूरी तरह खत्म करना चाहिए. उन्होंने कहा, “सिर्फ स्थगन काफी नहीं है. 1991 के कानून को दी गई चुनौती पर एक बार में अंतिम फैसला होना चाहिए, नहीं तो यह मामला सड़ता रहेगा. इसके अलावा, संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 हर व्यक्ति को अपना धर्म मानने, मानने की घोषणा करने और प्रचार करने की अनुमति देते हैं. जो अनुमति नहीं है, वह गैरकानूनी धर्म परिवर्तन है.”
एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड चारु माथुर ने कहा कि ऐसे धार्मिक स्थलों के विवादों में बढ़ोतरी 1991 के कानून की मूल भावना को कमजोर करती है. उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “संसद ने जानबूझकर 15 अगस्त 1947 की स्थिति को तय किया था और अंतहीन ऐतिहासिक विवादों को रोकने का फैसला किया था जो धर्मनिरपेक्ष सद्भाव को खतरे में डालते हैं. एकमात्र अपवाद अयोध्या था.”
माथुर ने बताया कि दिसंबर 2024 में मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने देश भर में इस तरह के नए मुकदमे दर्ज करने पर अंतरिम रोक लगा दी थी. उन्होंने कहा कि जब तक कानून की संवैधानिक वैधता पर फैसला नहीं हो जाता, तब तक अदालतें कोई आदेश, यहां तक कि सर्वे का आदेश भी नहीं देंगी.
यह अंतरिम आदेश अब तक लागू है.
माथुर ने कहा, “याचिका साझा स्थल पर महाशिवरात्रि पूजा को रोकने के लिए थी. अदालत ने सही कहा कि असाधारण उपाय चल रही कार्यवाही को सक्षम मंचों में बीच में नहीं रोक सकते.”
माथुर ने कहा कि कानून से जुड़े संवैधानिक सवाल अभी भी खुले हैं और ऐतिहासिक शिकायतों को वर्तमान को अस्थिर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती.
एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड पारस नाथ सिंह ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश बिल्कुल साफ है. आगे के आदेश तक भारत में किसी भी पूजा स्थल के खिलाफ कोई नया मुकदमा दर्ज नहीं होगा. साथ ही अलग अलग अदालतों में पहले से लंबित मामलों में भी आगे के आदेश तक कोई प्रभावी या अंतिम आदेश नहीं दिया जाएगा.”
पारस ने कहा कि इससे विवादित या विवादित किए जाने की कोशिश हो रहे ढांचों के धार्मिक स्वरूप की मौजूदा स्थिति बनी रहती है. उन्होंने कहा कि जब तक सुप्रीम कोर्ट खुद अपने अंतरिम आदेश में बदलाव नहीं करता या 1991 के कानून की वैधता पर अंतिम फैसला नहीं देता, तब तक यह आदेश सभी अदालतों पर बाध्यकारी रहेगा.
ज्ञानवापी विवाद
यह मामला अगस्त 2021 से जुड़ा है, जब मां श्रृंगार गौरी की पांच महिला श्रद्धालुओं ने वाराणसी जिला अदालत में याचिका दायर कर मस्जिद परिसर की बाहरी पश्चिमी दीवार पर स्थित मां श्रृंगार गौरी मंदिर में रोज पूजा करने के अधिकार की मांग की. यह स्थल वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर के पास है.
2022 में यह विवाद और तेज हो गया, जब महिला श्रद्धालुओं ने दशकों पुराने मुकदमे में यह दलील दी कि 17वीं सदी में वहां काशी विश्वनाथ मंदिर था.
उन्होंने दावा किया कि मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश पर मंदिर तोड़ा गया था. उन्होंने यह भी कहा कि 18वीं सदी में रानी अहिल्याबाई होल्कर के आदेश पर वहां मंदिर का निर्माण हुआ था.
पिछले पांच वर्षों में यह मामला मजिस्ट्रेट अदालत से जिला अदालत, फिर इलाहाबाद हाई कोर्ट और अंत में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा है.
फरवरी 2025 में इलाहाबाद हाई हकोर्ट ने ज्ञानवापी मस्जिद समिति को राहत देने से इनकार कर दिया. वह वाराणसी जिला अदालत के उस आदेश को चुनौती दे रही थी जिसमें मस्जिद के तहखाने में हिंदू पूजा की अनुमति दी गई थी.
मामला अभी भी अंतिम फैसले का इंतजार कर रहा है.
अगस्त 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को विवादित स्थल पर सर्वे या खुदाई करने की अनुमति दी थी.
ऐसा करते हुए उसने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा था, जिसमें वाराणसी अदालत द्वारा दिए गए एएसआई सर्वे के आदेश को चुनौती देने वाली मस्जिद समिति की याचिका खारिज कर दी गई थी.
शाही ईदगाह मस्जिद कृष्ण जन्मभूमि
जुलाई 2025 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने शाही ईदगाह मस्जिद को विवादित धार्मिक स्थल घोषित करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी. याचिका में दावा किया गया था कि कृष्ण जन्मभूमि के पास स्थित यह मस्जिद 17वीं सदी में औरंगजेब द्वारा मंदिर तोड़े जाने के बाद वहां बनाई गई थी. एक अन्य याचिका में वृंदावन और मथुरा के बीच स्थित इस मस्जिद को हटाने की मांग की गई थी.
दोनों याचिकाएं 2020 की हैं.
हालांकि 2023 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मामले में जमा हुई कुल 18 याचिकाओं को एक साथ सुनना शुरू किया.
बाद में मई 2025 में अदालत ने एक याचिका खारिज कर दी जिसमें देवी राधा को लंबित 18 याचिकाओं में से एक में पक्षकार बनाने की मांग की गई थी.
याचिकाकर्ताओं ने अपने दावों के समर्थन में कहा कि मंदिर में दिखने वाले कमल के स्तंभ आमतौर पर हिंदू धार्मिक स्थलों में पाए जाते हैं.
दूसरी ओर, केंद्रीय वक्फ बोर्ड और मस्जिद समिति ने कहा कि ये दावे सही नहीं हैं और स्थल विवादित नहीं है.
दिसंबर 2023 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने शाही ईदगाह मस्जिद का सर्वे कराने का आदेश दिया था ताकि दावों की सच्चाई की जांच हो सके. लेकिन जनवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद समिति की चुनौती के बाद इस आदेश पर रोक लगा दी. जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी रोक को आगे बढ़ा दिया और अगले आदेश तक सर्वे पर रोक जारी रखी.
कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद
दिल्ली के महरौली इलाके में स्थित कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद के अंदर हिंदू और जैन देवताओं की पुनर्स्थापना की मांग करते हुए 2020 में भगवान विष्णु की ओर से एक मुकदमा दायर किया गया था.
याचिका में दावा किया गया कि इस मस्जिद के निर्माण के लिए 27 मंदिरों को तोड़ा गया था.

हालांकि 2021 में एक दिल्ली अदालत ने इस याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन उसके आदेश को अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के सामने चुनौती दी गई.
वकील विष्णु शंकर जैन और उनके पिता हरि शंकर जैन द्वारा दायर याचिका में कहा गया था, “मौजूदा इमारत की दीवारों, खंभों और छत पर देवी देवताओं की मूर्तियां और अन्य धार्मिक और पवित्र हिंदू प्रतीक उकेरे गए हैं, जिनमें श्री गणेश, विष्णु, यक्ष, यक्षिणी, द्वारपाल, भगवान पार्श्वनाथ, भगवान महावीर, नटराज और मंगल कलश, शंख, गदा, कमल के चिन्ह, श्री यंत्र, मंदिर की घंटियां और पवित्र कमल जैसे प्रतीक शामिल हैं.”
विष्णु शंकर जैन और हरि शंकर जैन ने 1991 के कानून से जुड़े 12 मामलों में हिंदू पक्ष का प्रतिनिधित्व किया है, जिनमें ज्ञानवापी मस्जिद काशी विश्वनाथ मंदिर विवाद भी शामिल है.
अटाला मस्जिद, जौनपुर
दिसंबर 2024 में जौनपुर की एक अदालत ने 14वीं सदी की अटाला मस्जिद का एएसआई सर्वे कराने से इनकार कर दिया. एक याचिका में दावा किया गया था कि यह पहले मंदिर था, जिसे 14वीं सदी के शासक फिरोज शाह तुगलक ने तोड़ दिया था.

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के 2024 के अंतरिम आदेश का भी हवाला दिया, जिसमें पूजा स्थलों के धार्मिक स्वरूप से जुड़े लंबित मामलों में आदेश देने से अदालतों को रोका गया था.
दिसंबर 2024 में मस्जिद समिति ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया और स्थानीय अदालत के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें यह मुकदमा स्वीकार किया गया था कि मस्जिद पहले अटाला देवी मंदिर थी.
मस्जिद पक्ष ने कहा कि अटाला मस्जिद, जिसका निर्माण 1376 से 1408 के बीच फिरोज शाह तुगलक ने कराया था, कभी भी इस्लाम के अलावा किसी अन्य धर्म के कब्जे में नहीं रही.
संभल की शाही जामा मस्जिद
नवंबर 2024 में उत्तर प्रदेश के संभल की शाही जामा मस्जिद विवाद का केंद्र बन गई. यह मस्जिद 1524 में कथित तौर पर बाबर के एक अधिकारी द्वारा बनवाई गई थी. उत्तर प्रदेश की एक ट्रायल कोर्ट ने मुगल काल की इस मस्जिद का सर्वे कराने की अनुमति दे दी थी.

अदालत के आदेश के बाद इलाके में कई लोगों की मौत और दंगों की खबरें सामने आईं.
स्थानीय अदालत ने कुछ हिंदू पक्षकारों की याचिका पर यह आदेश दिया था, जिन्होंने दावा किया था कि मस्जिद एक हिंदू मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी.
अदालत के आदेश से सर्वे होने के पांच दिन बाद सुप्रीम कोर्ट ने दखल दिया और ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगा दी. साथ ही कहा कि पूजा स्थलों के सर्वे की मांग वाले नए मुकदमे स्वीकार नहीं किए जाएं.
अन्य मामले
इसके अलावा राजस्थान की अजमेर शरीफ दरगाह, लखनऊ की टीले वाली मस्जिद, मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला मंदिर कमाल मौला मस्जिद परिसर, तमिलनाडु की सिकंदर बादूशा दरगाह, बदायूं की शम्सी जामा मस्जिद और मैंगलोर की मलाली जुम्मा मस्जिद से जुड़े भी इसी तरह के मामले अदालतों में दायर हुए हैं.
तमिलनाडु के मदुरै में थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर स्थित 13वीं सदी की सूफी दरगाह, सुल्तान सिकंदर बादूशा शहीद की दरगाह, जो हिंदू सुब्रमणिया स्वामी मंदिर के पास है, वह भी कानूनी विवाद का हिस्सा बन गई है.

इस साल फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया, जिसमें स्थल के पास पहाड़ी पर स्थित पत्थर के स्तंभ पर कार्तिगई दीपम जलाने की अनुमति दी गई थी. साथ ही पहाड़ी स्थल पर रमजान और बकरीद के अलावा मुस्लिम नमाज पर रोक लगाई गई थी. हाई कोर्ट ने यह भी साफ किया था कि वहां पशु बलि की अनुमति नहीं होगी.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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