शशि थरूर की आशंकाएं सच नहीं हुईं. न ही मोदी सरकार की. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी, अध्यक्ष तारिक रहमान के नेतृत्व में, 12 फरवरी को हुए 13वें राष्ट्रीय संसदीय चुनाव में जीत गई है और लोगों को उस डर की याद आ रही है जिसने पिछले साल के अंत से ही दिल्ली के रणनीतिक हलकों की नींद उड़ा दी थी, जब बांग्लादेश की सबसे बड़ी इस्लामिक पार्टी, बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी, ने देश की कई यूनिवर्सिटियों में छात्र संघ चुनाव जीतने शुरू कर दिए थे.
11 सितंबर को, जब जमात की छात्र इकाई ने ढाका यूनिवर्सिटी का चुनाव जीता, तो थरूर ने खुलकर सोचा था कि आने वाले आम चुनावों में इसका क्या असर होगा. उन्होंने लिखा था, “यह शायद ज्यादातर भारतीयों के दिमाग में एक छोटी सी खबर रही हो, लेकिन यह आने वाले वक्त के लिए चिंताजनक संकेत है.”
12 फरवरी की देर शाम, जब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने जमात के नेतृत्व वाले 11-दलीय गठबंधन से काफी आगे निकलकर निर्णायक जीत दर्ज की, तो भारत में इसे रिश्ते सुधारने के मौके के रूप में देखा गया.
फिलहाल इस्लामिक खतरा टला
दिल्ली के पास चिंता करने के एक से ज्यादा कारण थे. सबसे पहले, जमात ने 1971 के स्वतंत्रता युद्ध के दौरान पाकिस्तान का समर्थन किया था और इस इस्लामिक पार्टी ने शरीया कानून लागू करने की बात भी कही है. सितंबर 2025 में न्यूयॉर्क में बोलते हुए, जमात के उप प्रमुख सैयद अब्दुल्ला मोहम्मद ताहेर ने कहा था कि अगर भारत ने बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में “हस्तक्षेप करने की हिम्मत” की, तो पांच मिलियन बांग्लादेशी युवाओं के साथ पाक युद्ध छेड़ा जाएगा. दिल्ली और ढाका के रिश्तों में खटास के मुख्य कारणों में भारत की सुरक्षा चिंताएं और मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार की बांग्लादेशी समाज और राजनीति में बढ़ते कट्टरपंथ को रोकने में असमर्थता, या उसमें मिलीभगत, शामिल थे. इससे न सिर्फ देश की कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब हुई, बल्कि इसका असर भारत पर भी पड़ने का खतरा था.
5 अगस्त 2024 को शेख हसीना सरकार के गिरने के तुरंत बाद, ढाका ट्रिब्यून ने खबर दी थी कि जमात ने देश के शीर्ष कौमी उलेमा के साथ बैठक की, जहां प्रतिभागियों ने जमात प्रमुख डॉ. शफीकुर रहमान के नेतृत्व में इस्लामी नियमों पर आधारित देश बनाने को लेकर आशावाद जताया. बांग्लादेश खिलाफत आंदोलन के अमीर शरियत मुफ्ती अबू जफर कासेमी ने कहा, “हमें अपने पुराने मतभेद भूल जाने चाहिए और किसी भी राजनीतिक पार्टी को मौका नहीं देना चाहिए” और देश की सभी इस्लामिक ताकतों के बीच एकता की अपील की.
बांग्लादेश में भारत की पूर्व उच्चायुक्त वीना सिकरी ने दिप्रिंट को बताया कि अगस्त 2024 में अंतरिम सरकार की नियुक्ति से पहले की घटनाओं में जमात-ए-इस्लामी की अहम भूमिका थी. सिकरी ने कहा, “जमात ने यूनुस सरकार पर काफी प्रभाव बनाए रखा, जो सरकार के फैसलों में दिखाई देता था.”
दिल्ली को और चिंता तब हुई जब अमेरिका प्रशासन की जमात के साथ बढ़ती नज़दीकी की खबरें आईं. 24 जनवरी 2026 की एक रिपोर्ट में, इकोनॉमिक टाइम्स ने लिखा कि चुनाव से पहले इस कट्टर इस्लामिक पार्टी को साधने की अमेरिकी कोशिशों ने कूटनीतिक हलकों और बांग्लादेश विशेषज्ञों के बीच सवाल खड़े किए हैं.
यह तब सामने आया जब वॉशिंगटन पोस्ट ने ढाका में एक अमेरिकी राजनयिक की ऑडियो रिकॉर्डिंग हासिल की और रिपोर्ट किया, जिसमें बताया गया कि वॉशिंगटन जमात-ए-इस्लामी के साथ जुड़ना चाहता है.
तनावपूर्ण अतीत से आगे
शेख हसीना सरकार के गिरने के साथ ही बांग्लादेश में भारत-विरोधी भावना तेज़ी से बढ़ी. भारत ने हसीना को शरण दी है, यह बात बांग्लादेश के सिविल सोसायटी और राजनीतिक दलों को पसंद नहीं आई. हसीना के शासन के दौरान दोनों देश करीबी रणनीतिक सहयोगी थे, लेकिन उनके हटने के बाद दिल्ली-ढाका संबंध तेज़ी से बिगड़ गए.
चीज़ें एक रात में नहीं बदलेंगी. एक कारण यह है कि 2001-06 का दौर, जब जमात, बीएनपी के नेतृत्व वाली सरकार में गठबंधन सहयोगी थी, भारत–बांग्लादेश रिश्तों के लिए सबसे खराब दौरों में से एक था. सिकरी, जो 2003 से 2006 तक बांग्लादेश में थीं, ने दिप्रिंट को बताया कि उस समय बांग्लादेश की ज़मीन का इस्तेमाल पाकिस्तान स्थित आतंकवादी समूह भारत के खिलाफ कर रहे थे और यह देश उत्तर-पूर्व के उग्रवादियों के लिए सुरक्षित ठिकाना बन गया था.
फ्रंटलाइन की एक रिपोर्ट में लिखा था, “तारिक (रहमान) उस सरकार में एक अहम व्यक्ति थे. उनके पास कोई आधिकारिक पद नहीं था, लेकिन उनके पास बहुत ज्यादा शक्ति थी और कोई जवाबदेही नहीं थी. भारतीय सुरक्षा तंत्र 2004 के चिटगांव हथियार बरामदगी मामले में उनकी कथित भूमिका को आसानी से नहीं भूलेगा, जिसे यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (ULFA) के साथ मिलकर भारत के उत्तर-पूर्व में हिंसा फैलाने की साजिश का हिस्सा बताया गया था.”
दिल्ली अतीत को पीछे छोड़ने को तैयार है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्व बीएनपी अध्यक्ष बेगम खालिदा ज़िया के निधन पर शोक जताया.
Deeply saddened to learn about the passing away of former Prime Minister and BNP Chairperson Begum Khaleda Zia in Dhaka.
Our sincerest condolences to her family and all the people of Bangladesh. May the Almighty grant her family the fortitude to bear this tragic loss.
As the… pic.twitter.com/BLg6K52vak
— Narendra Modi (@narendramodi) December 30, 2025
विदेश मंत्री एस जयशंकर, जो ज़िया के अंतिम संस्कार में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, उन्होंने उनके बेटे तारिक से मुलाकात की और मोदी की ओर से शोक पत्र सौंपा. यूनुस प्रशासन के साथ ठंडे संबंधों के बीच जयशंकर का ढाका जाकर व्यक्तिगत रूप से शोक व्यक्त करना महत्वपूर्ण माना गया.
अब, जब बीएनपी सत्ता में आ गई है और जमात को स्पष्ट हार मिली है, तो भारत और बांग्लादेश एक नई शुरुआत की उम्मीद कर सकते हैं.
दीप हलदर एक लेखक और दिप्रिंट में कॉन्ट्रिब्यूटिंग एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @deepscribble है. व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं.
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