नयी दिल्ली, 11 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देने वाली उत्तर प्रदेश सरकार की याचिका पर बुधवार को सुनवाई करने पर सहमति जताई, जिसमें 2007 के ‘रामपुर सीआरपीएफ शिविर’ आतंकी हमले के मामले में चार आरोपियों को दी गई मौत की सजा और एक अन्य को दी गई आजीवन कारावास की सजा निरस्त कर दी गयी थी।
रामपुर स्थित केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के शिविर पर 31 दिसंबर 2007 की रात को हुए हमले में सीआरपीएफ के आठ जवान मारे गए थे और पांच घायल हो गए थे।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने राज्य सरकार की याचिका पर आरोपियों को नोटिस जारी किये और मामले की सुनवाई चार सप्ताह बाद निर्धारित की।
पांचों आरोपियों की ओर से अधिवक्ता एम एस खान पेश हुए।
राज्य सरकार ने पिछले साल 29 अक्टूबर को उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले को चुनौती दी है।
उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के उस आदेश को खारिज कर दिया था, जिसमें इस मामले में चार लोगों को मृत्युदंड और एक अन्य को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।
उच्च न्यायालय ने मोहम्मद शरीफ, सबाउद्दीन, इमरान शहजाद, मोहम्मद फारूक और जंग बहादुर खान को हत्या एवं अन्य गंभीर आरोपों से यह कहकर बरी कर दिया था कि अभियोजन पक्ष ‘‘आरोपियों के खिलाफ मुख्य अपराध के मामले को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा’’।
हालांकि, इसने जंग बहादुर खान समेत पांचों को शस्त्र अधिनियम की धारा 25 (1-ए) के तहत दोषी पाया और उन्हें 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। जंग बहादुर खान को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।
उच्च न्यायालय ने कहा था, ‘‘मामले का निस्तारण करने से पहले, हम निश्चित रूप से यह उल्लेख करना चाहेंगे कि यदि जांच और अभियोजन अधिक प्रशिक्षित पुलिस द्वारा किया गया होता तो इस मामले का परिणाम अलग होता।’’
अदालत ने कहा था कि जांच की खामियों के कारण अंततः आरोपियों को बरी कर दिया गया।
उच्च न्यायालय ने कहा था, ‘‘मोहम्मद शरीफ; सबाउद्दीन; इमरान शहजाद और मोहम्मद फारूक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 और सहपठित धारा 149 के तहत मृत्युदंड की सजा सुनाई गई थी और प्रत्येक दोषी पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया था। इन सभी को उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों से बरी कर दिया गया है।’’
अदालत ने कहा, ‘‘जंग बहादुर खान को आईपीसी की धारा 302 और सहपठित धारा 149 तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी और 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया था, उसे भी बरी कर दिया गया है।’’
उच्च न्यायालय ने पांचों दोषियों पर शस्त्र अधिनियम के तहत किए गए अपराध के लिए एक-एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया था।
अभियुक्तों ने रामपुर के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा एक नवंबर, 2019 और दो नवंबर, 2019 को पारित फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील दायर की थी।
भाषा सुरभि सुरेश
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