नई दिल्ली: आधे दशक की तेज़ी के बाद, बिहार की 3,000 करोड़ रुपये की मखाना इंडस्ट्री अपनी खेती का क्षेत्रफल बढ़ाने के लिए संघर्ष कर रही है. यह एक ऐसा ठहराव है जिससे फसल की ग्रोथ को खतरा है.
2022 और 2025 के बीच, बिहार में पानी में उगने वाली इस फसल का खेती का क्षेत्रफल लगभग 35,000 हेक्टेयर रहा.
बिहार दुनिया का 85 प्रतिशत से ज़्यादा मखाना का उत्पादन करता है, और इस फसल ने दुनिया भर में खाने-पीने की चीज़ों में धूम मचा दी है. यह एक सुपरफ़ूड बन गया है, जिसकी पॉपुलैरिटी आसमान छू रही है.
राज्य के हॉर्टिकल्चर डिपार्टमेंट के डेटा के मुताबिक, 2012-13 और 2021-22 के बीच, मखाना की खेती का दायरा 171 प्रतिशत बढ़ा और इसी दौरान कुल फसल प्रोडक्शन में 152 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. रकबे में न हो रही बढ़ोतरी, अनियमित बारिश, मेहनत वाली खेती और धीमा मशीनीकरण, खेती के विस्तार को रोक रहे हैं, जबकि मांग बढ़ रही है और सरकार खेती के रकबे और नौकरियों को दोगुना करने के बड़े लक्ष्य तय कर रही है. पॉलिसी विज़न और ज़मीनी हकीकत के बीच का अंतर अब बिहार में मखाना की रफ़्तार को धीमा करने का खतरा पैदा कर रहा है. राज्य में 50 हज़ार से ज़्यादा घर सीधे तौर पर इससे जुड़े हैं.
मखाना एक्सपर्ट्स ने मखाना की खेती के रकबे में ठहराव के पीछे कई वजहें बताईं.
दरभंगा के मखाना रिसर्च सेंटर (MRC) के हेड और प्रिंसिपल साइंटिस्ट इंदु शेखर सिंह ने कहा, “क्लाइमेट चेंज, लिमिटेड टेक्नोलॉजी और प्रोसेसिंग में लगने वाली मेहनत जैसी चुनौतियों और इसकी खेती सिर्फ मल्लाह समुदाय तक सीमित होने के कारण, इंडस्ट्री की ग्रोथ में रुकावटें आ रही हैं.”
सिंह के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में, ज़मीन पर मखाना का विस्तार एक चुनौती बन गया है. उन्होंने कहा, “जब तक मल्लाह समुदाय के अलावा दूसरे लोग इस पेशे से नहीं जुड़ते, तब तक यह नहीं बढ़ेगा. साथ ही, ज़्यादातर काम अभी भी हाथ से किया जाता है, इसलिए मखाना निकालने की मशीनें ज़रूरी हैं.” उन्होंने आगे कहा कि मशीनों पर काम चल रहा है और अगले साल वे बाज़ार में आ जाएंगी.
हाल ही में विधानसभा में पेश बिहार की इकोनॉमिक सर्वे रिपोर्ट भी इस ठहराव की पुष्टि करती है.रिपोर्ट बताती है कि 2022-25 के बीच, खेती का रकबा सालाना 27-28 हज़ार हेक्टेयर के बीच ऊपर-नीचे होता रहा, जिससे लगभग 58.8 मीट्रिक टन उत्पादन हुआ.
हालांकि, एक्सपर्ट्स ने कहा कि सरकारी डेटा सही नहीं है.सिंह ने कहा, “पिछले कुछ सालों से यह लगभग 35k हेक्टेयर है.यह सच है कि यह बड़े पैमाने पर नहीं बढ़ रहा है.
इकोनॉमिक सर्वे में, सरकार का लक्ष्य खेती के रकबे को दोगुना करके 70 हजार हेक्टेयर करना और पांच लाख नौकरियां पैदा करना है.
रिपोर्ट में कहा गया है, “साल 2026-30 के दौरान, मखाना रोडमैप में खेती का एरिया दोगुना करके 70,000 हेक्टेयर से ज़्यादा करने, 2024 के बेसलाइन के मुकाबले एक्सपोर्ट को पांच गुना करने, प्रोसेसिंग और स्टोरेज कैपेसिटी को चार गुना करने और पांच लाख फुल-टाइम नौकरियां पैदा करने का प्लान है.
अनियमित बारिश भी एक चुनौती
मखाना इंडस्ट्री हेल्दी स्नैक्स और पारंपरिक खाने की बढ़ती मांग से आगे बढ़ रही है.लेकिन इस ज़्यादा पानी वाली फसल के लिए अनियमित बारिश सबसे बड़ी चुनौती है.
मखाना के जाने-माने रिसर्चर और 2003 में आई किताब मखाना के लेखक प्रोफेसर विद्यानाथ झा बताते हैं कि बिहार में सालाना बारिश की मात्रा कम हो गई है.उन्होंने कहा, “इससे कुदरती पानी का जमाव कम हुआ है, जो मखाना की खेती के लिए ज़रूरी है.
पहले बिहार में औसतन सालाना बारिश लगभग 1200 एमएम होती थी, लेकिन पिछले एक दशक में इसमें 25 प्रतिशत तक की कमी आई है.
दरभंगा के रहने वाले झा ने कहा कि 2018 से, दरभंगा और मधुबनी के इलाके, जो कभी मखाना के बड़े प्रोड्यूसर थे, पानी की कमी का सामना कर रहे हैं. न्होंने कहा, “यह कुछ ऐसा है जो मैंने पिछले छह दशकों में नहीं देखा. छोटी नदियां और नाले सूथ रहे हैं और कम बारिश की वजह से ग्राउंडवाटर टेबल भी रिचार्ज नहीं हो रहा है.
हालांकि, क्षेत्रफस बढ़ाने के लिए सरकार का फोकस अब वेटलैंड्स पर है.मखाना डेवलपमेंट स्कीम के प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर अनिल कुमार, जिन्हें भारत का मखाना मैन भी कहा जाता है, ने कहा, “बिहार में 9.12 लाख हेक्टेयर पानी वाली ज़मीन है जिसमें मखाना प्रोडक्शन की संभावना है.
लेकिन सिंह के मुताबिक, वेटलैंड्स का इस्तेमाल करना आसान नहीं है.उन्होंने कहा, “ज़्यादातर वेटलैंड्स सरकारी कंट्रोल में हैं और कुछ एरिया प्राइवेट हैं.इसके लिए सरकारी मदद की ज़रूरत है,उसके बिना यह प्लान सफल नहीं होगा.
पिछले पांच सालों में, मखाना को जियोग्राफिकल इंडेक्स (GI) टैग मिला, बिहार सरकार ने मखाना महोत्सव ऑर्गेनाइज किया, और मोदी सरकार ने मखाना बोर्ड बनाने की घोषणा की.
सिंह ने कहा, “अगर बिहार का मखाना मैजिक रुकावटों को पार कर जाता है, तो यह आगे भी बढ़ता रहेगा”.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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