कांचीपुरम: कांचीपुरम के SEZ में रात के साढ़े बारह बज रहे हैं. फैक्ट्री का फर्श लगभग खाली नजर आता है, लेकिन वहां UV लाइटें जल रही हैं. सन्नाटा है, जिसे कभी-कभी एक हल्की, सुर में बजती बीप तोड़ती है, बिल्कुल ICU में दिल की धड़कन मापने वाली मशीन जैसी, और हवा को चीरती एक रोबोटिक बांह की सरसराहट सुनाई देती है. यह फैक्ट्री की एक नई तरह की आवाज़ है. यहां कोई इंसान नहीं है.
भारत की इकलौती डार्क फैक्ट्री में आपका स्वागत है.
यहीं देश के औद्योगिक भविष्य का गर्भगृह है, जहां बिना किसी इंसानी निगरानी के रोबोट सेमीकंडक्टर चिप्स जोड़ रहे हैं. जिसे क्लीनरूम कहा जाता है, वहां टाइटेनियम के हाथों की एक खामोश लय है, जो बड़ी बारीकी से तय की गई चाल में नाचते हैं. बैकग्राउंड में गणेश वंदना की लगातार गूंजती रिकॉर्डिंग चल रही है.
सेमीकंडक्टर निर्माण इकाई पॉलीमैटेक, जिसे 2018 में कांचीपुरम के ओरगडम में लगाया गया था, अगली औद्योगिक क्रांति के मुहाने पर खड़ी है. यह हाइपर-ऑटोमेशन का एक ‘उलटा’ मॉडल है, जहां गिने-चुने लोग और मशीनों की एक फौज मिलकर कम लागत में, तेज़ी से और बिना गुणवत्ता से समझौता किए सामान तैयार करती है.

पॉलीमैटेक के निदेशक विशाल नंदम कहते हैं, “मैं चाहता हूं कि इंजीनियर शॉप फ्लोर के बाहर बैठें. मैं नहीं चाहता कि वे काम करें. काम सिर्फ मशीनों को करना है.” यहां रोबोट 24×7 काम करते हैं और साल में सिर्फ एक बार 30 मिनट का ब्रेक लेते हैं. इसके मुकाबले इंजीनियरों की कोई तय शिफ्ट नहीं है और उनका काम का समय भी कम है.
अच्छी तरह प्रशिक्षित एक बटालियन की तरह, यहां रोबोट सेमीकंडक्टर चिप्स और प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCB) जोड़ते हैं, जो मोबाइल फोन, लैपटॉप और टीवी बैकलाइट में रोशनी भरते हैं. आखिरी नैनोमीटर तक की सटीकता यहां समझौते लायक नहीं है. रोबोटों के अपने कॉल साइन हैं, जो हर मशीन के किनारे लगी स्टैक लाइट्स से दिखते हैं. लाल मतलब गड़बड़, पीला मतलब तैयार, और हरा मतलब सब ठीक.
चीन जैसी नौकरी पैदा करने वाली मैन्युफैक्चरिंग बूम से चूक जाने के बाद, भारत रोबोट आधारित और लगभग बिना इंसान वाली मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रियाओं में भी धीमा रहा है. कांचीपुरम जैसी सुविधाएं यहां बहुत कम हैं. इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रोबोटिक्स के आंकड़ों के मुताबिक, सालाना इंस्टॉलेशन में भारत छठे नंबर पर है, लेकिन यहां प्रति 10,000 कर्मचारियों पर सिर्फ 9 मैन्युफैक्चरिंग रोबोट हैं. एशिया का औसत 204 है और वैश्विक औसत 177. सबसे ऊपर हैं दक्षिण कोरिया (1,102), सिंगापुर (770), चीन (470), जर्मनी (429) और जापान (419).
लेकिन डार्क फैक्ट्रियों की दौड़ अभी बस शुरू ही हुई है.
यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ के सेंटर फॉर डेवलपमेंट में विज़िटिंग प्रोफेसर संतोष मेहरोत्रा कहते हैं, “दुनिया भर में रोबोटाइजेशन और ऑटोमेशन दो सेक्टरों तक ही सीमित रहे हैं. एक ऑटोमोबाइल और दूसरा चिप मैन्युफैक्चरिंग. इसके आगे यह कहीं ज्यादा नहीं गया है.”
वह कहते हैं, “हम अगले चरण में मैन्युफैक्चरिंग की बस पकड़ सकते हैं.”
रोबोट ‘सहकर्मियों’ के साथ काम
कांचीपुरम की इस डार्क फैक्ट्री में, सुबह होते ही क्लीनरूम के कॉरिडोर इंसानों द्वारा UV लाइट के नीचे सैनिटाइज किए जा रहे होते हैं. वहीं बाहर फैक्ट्री के हिस्से में इंजीनियर मेंटेनेंस, स्टॉक और ऑर्डर से जुड़े निर्देश नोट करते दिखते हैं.
25 साल के इंजीनियर दिनेश एस कहते हैं, “रोबोट्स के साथ काम करने का यह मेरा पहला अनुभव है. इसे देखना बहुत अलग और खास लगता है.” वह MD के कांच की दीवार वाले ऑफिस के पास एक बड़े कॉन्फ्रेंस रूम जैसी मेज पर बैठे हैं. तंजावुर के CCMR पॉलिटेक्निक कॉलेज से मैकेनिकल इंजीनियरिंग करने वाले दिनेश 2022 से पॉलीमैटेक में हैं.

इस यूनिट में इंजीनियर उन कमरों में बैठते हैं, जो रोबोटों के काम करने वाली जगह से कुछ दूरी पर हैं. वे पूरा दिन काम नहीं करते. उन्हें सुबह 8 बजे फैक्ट्री की सायरन पर हाज़िरी नहीं लगानी होती. वे दिन में कुछ घंटों के लिए आते हैं, किसी गड़बड़ी पर नजर रखते हैं और ज्यादातर समय रोबोटों को अकेला छोड़ देते हैं.
आंध्र प्रदेश के GMR इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से पढ़े एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर कहते हैं, “रोबोट हमारे साथ भावनाएं साझा नहीं कर सकते, इसलिए मैं उन्हें सहकर्मी नहीं मान सकता.” पॉलीमैटेक की टी-शर्ट पहने वह इस ख्याल पर थोड़ा झिझकते भी हैं.
दिनेश और मणि उन गिने-चुने लोगों में हैं, जिन्हें हर 18 घंटे में एक बार कच्चे माल की मैगजीन भरने के लिए क्लीनरूम के अंदर जाना पड़ता है. इसके लिए वे PPE किट पहनते हैं और धूल या कीटाणुओं को अंदर जाने से रोकने के लिए एयर शॉवर से गुजरते हैं.
दोनों युवा इंजीनियरों के लिए यह कॉलेज के बाद पहली नौकरी थी. यह उनकी बैचमेट्स की नौकरियों से बिल्कुल अलग थी, जैसे शीट मेटल प्रक्रिया देखने वाला साइट इंजीनियर या किसी बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी में क्वालिटी इंजीनियर.


दिनेश कहते हैं, “हर नौकरी का अपना तरीका होता है. मैं तुलना नहीं करता. मेरा काम रचनात्मक है और मुझे इसे करना अच्छा लगता है.” वह बताते हैं कि रोबोटों को हर समय ध्यान नहीं चाहिए, इसलिए उन्हें पॉलीमैटेक की R&D लैब में काफी समय मिल जाता है. हाल ही में R&D टीम ने एक वेन-फाइंडर बनाया है, जो नसों को पहचानकर उन्हें त्वचा पर प्रोजेक्ट कर सकता है. रिसर्च के लिए ज्यादा समय मिलने के साथ-साथ वर्क-लाइफ बैलेंस भी आसानी से बन जाता है.
इस फैक्ट्री में करीब हर 100 कर्मचारियों पर 25 रोबोट हैं. यहां ऐसे इंजीनियर हैं जो मैन्युफैक्चरिंग की निगरानी करते हैं और R&D में लगे हैं. इसके अलावा अकाउंट मैनेजर, सेल्स और मार्केटिंग स्टाफ भी हैं. सुरक्षा, हाउसकीपिंग और प्रशासन के लिए कुछ सहायक कर्मचारी भी मौजूद हैं.
विशाल नंदम मजाक में कहते हैं, “यहां सबको विटामिन डी की कमी है. आखिर यह एक डार्क फैक्ट्री जो है.”

पहले कदम रखने वाले
कांचीपुरम के ओरगडम में हाइपर-ऑटोमेशन से यह सामना करीब एक दशक पहले शुरू हुआ था. पॉलीमैटेक की 1,50,000 वर्ग फुट की फैक्ट्री से ज्यादा दूर नहीं, 2015 में रॉयल एनफील्ड के प्लांट में पेंट लाइन पर रोबोट लगा दिए गए थे. यह एक “कम रोशनी वाला” सेटअप था, जहां डार्क फैक्ट्री मॉडल सिर्फ शॉप फ्लोर के कुछ हिस्सों तक सीमित था.
यह उस दुनिया में एक छोटा सा पहला कदम था, जिसकी शुरुआत जापान की रोबोटिक्स कंपनी FANUC ने की थी. FANUC ने 2001 में माउंट फूजी के पास दुनिया की पहली डार्क फैक्ट्री बनाई थी. अपने पुराने संस्करणों के उलट, जो गलती से चेसिस की जगह खुद को पेंट कर लेते थे, ये रोबोट बेहद सख्त दक्षता की मिसाल थे. एक तरह से ये ‘खुद को बढ़ाने’ जैसे थे, क्योंकि ये हफ्तों तक बिना किसी इंसानी निगरानी के और भी रोबोट बना सकते थे.
क्योंकि ऑटोमोबाइल असेंबली लाइन में सटीकता, दोहराव और बड़े पैमाने की जरूरत होती है, इसलिए यह सेक्टर डार्क फैक्ट्री को अपनाने वालों में सबसे आगे रहा. 2024 में भारत में लगाए गए 9,123 औद्योगिक रोबोटों में से लगभग आधे सिर्फ इसी सेक्टर में लगे.

अब दूसरे सेक्टर भी पकड़ बना रहे हैं. उदाहरण के तौर पर, 66,000 करोड़ रुपये के समूह भारत फोर्ज ने जनवरी 2026 में जर्मनी की कंपनी Agile Robots SE के साथ साझेदारी की. इसका मकसद “अत्याधुनिक विज़न और AI आधारित रोबोटिक समाधान विकसित और लागू करना है, ताकि पूरी तरह स्वायत्त (‘डार्क’) फैक्ट्री बनाई जा सके.”
इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रोबोटिक्स के पास मौजूद आंकड़े इस रफ्तार को दिखाते हैं.
फेडरेशन के प्रेस अधिकारी कार्स्टन हीर ने कहा, “भारत 2024 में 9,100 से ज्यादा यूनिट इंस्टॉल करने के रिकॉर्ड के साथ आगे बढ़ता रहा है, जो साल-दर-साल 7 प्रतिशत की बढ़त है.” उन्होंने बताया कि ऑपरेशनल स्टॉक के मामले में भारत इस समय 10वें नंबर पर है, स्पेन से आगे और मेक्सिको के बाद. 2019 से 2024 के बीच, भारत में हर साल लगाए जाने वाले औद्योगिक रोबोटों की संख्या 112 प्रतिशत बढ़ी है.
पॉलीमैटेक जैसी कंपनियां डार्क फैक्ट्री मॉडल पर बड़ा दांव लगा रही हैं. छत्तीसगढ़ में इसकी एक नई सुविधा आने वाली है. MD ईश्वर राव नंदम ने बताया कि सिंगापुर में एक ‘जीरो मैनपावर’ फैक्ट्री भी बनाई जा रही है. उनके पीछे एक बड़ी तस्वीर लगी है, जिसमें वह SEMICON इंडिया 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी कंपनी का विज़न समझाते दिख रहे हैं.
गैरेज में डार्क फैक्ट्री
पॉलीमैटेक की कांचीपुरम फैक्ट्री से करीब 500 किलोमीटर दूर, तमिलनाडु के दूसरी तरफ, 20-22 साल के इंजीनियरों का एक समूह भारत में डार्क फैक्ट्री क्रांति के बीज बोने में जुटा है, एक-एक रोबोट बनाकर.
ये लोग डार्क फैक्ट्री के प्रचारक हैं और कोयंबटूर में इनके पास एक प्रोटोटाइप है. सीईओ धनुष भक्त का सपना है कि मेटल फैब्रिकेशन का ऐसा बाजार बने, जहां निर्माता मशीनें न खरीदें और न ही अपनी यूनिट लगाएं, बल्कि उनकी कंपनी xLogic Labs द्वारा चलाई जा रही डार्क फैक्ट्रियों को सीधे ऑर्डर दें.
पिछले साल अगस्त की एक रात, धनुष और उनकी टीम अपनी पहली रोबोट बना रही थी. रात करीब 3 बजे शटर पर दस्तक हुई. पुलिस आई थी.
धनुष याद करते हैं, “वे अंदर आए और पूछा, ‘आप लोग क्या कर रहे हैं.’ उसके बाद उन्हें हमारे काम में दिलचस्पी हो गई. वे बस दो मिनट देखने आए और फिर चले गए.”

असल चुनौती है बड़े स्तर पर काम करना. तमिलनाडु सरकार के पास कई योजनाएं हैं और वह ऑटोमेशन को लेकर सक्रिय भी है, लेकिन स्टार्टअप्स के मामले में चीजें आगे बढ़ने में वक्त लगता है.
धनुष कहते हैं, “सरकारी प्रोत्साहन मिलने में बहुत समय लग जाता है, इसलिए हमें विस्तार के लिए अमेरिका से मिलने वाले ग्रांट और फंडिंग पर निर्भर रहना पड़ा. अमेरिका के एक निवेशक ने मेरा आइडिया सुनते ही दो मिनट में करीब 1 करोड़ रुपये दे दिए.”
सिलिकॉन वैली की परंपरा को निभाते हुए, xLogic Labs फिलहाल कोयंबटूर के एक गैरेज से काम कर रही है. रिहायशी इलाके के बीच छिपी हुई यह जगह उनकी ‘प्रोटोटाइप फैक्ट्री’ है. हर कोने से एक रोबोटिक बांह बाहर निकली हुई है. बिजली के तार बिखरे पड़े हैं और मशीनों ने लगभग हर इंच जगह घेर रखी है. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से भरी रैक कमरे की दीवारों का भी काम कर रही हैं. बीच में एक बड़ा तिरंगा खड़ा है, जिसके पास एक अस्थायी क्रेन भी है.
पिछले पांच महीनों में, पांच लोगों की इस टीम ने तीन रोबोट बनाए हैं. इनमें से एक को वे ‘द मैजिशियन’ कहते हैं. यह ऐसे काम कर सकता है, जिनके लिए आमतौर पर 10 अलग-अलग मशीनों की जरूरत पड़ती है.
धनुष कहते हैं, “हम चाहें तो चीनी या जर्मन मशीनें खरीद सकते हैं, सेवाएं देना शुरू कर सकते हैं और पैसा कमा सकते हैं. लेकिन हम ऐसा नहीं चाहते. हम पहले दिन से अपनी खुद की मशीनें इस्तेमाल करना चाहते हैं, क्योंकि इससे हमें नए प्रयोग करने पड़ते हैं, और जल्दी करने पड़ते हैं.”
उनका सपना ऐसे रोबोट बनाना है, जो कई काम बदल-बदल कर कर सकें, जो आमतौर पर मशीन ऑपरेटर या असेंबलर जैसे सेमी-स्किल्ड कामगार करते हैं.

xLogic Labs की टीम छोटी है, लेकिन काफी मजबूत है. एक सदस्य उस टीम का हिस्सा था जिसने WorldSkills 2024 में भारत का प्रतिनिधित्व किया था, जिसे ‘स्किल्स ओलंपिक्स’ भी कहा जाता है. एक अन्य सदस्य ने जर्मनी में रॉकेट बनाने वाली कंपनी के साथ काम किया है. पांच में से दो तमिलनाडु से हैं, और एक-एक कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और पंजाब से.
गैरेज में बनी यह बिखरी-बिखरी सी ‘प्रोटोटाइप फैक्ट्री’ देखने में भले अव्यवस्थित लगे, लेकिन इसके पीछे एक उन्नत तरीका है, जिसने उन्हें पहले ही कुछ ग्राहक दिला दिए हैं. फिलहाल उनका ध्यान लंबित ऑर्डर पूरे करने पर है.
धनुष कहते हैं, “जो भी डार्क फैक्ट्री लगाना चाहेगा, उसे हमसे कम से कम 4-5 गुना ज्यादा खर्च करना पड़ेगा, क्योंकि उसे मशीनें आयात करनी होंगी, जबकि हम खुद बना रहे हैं.” वह आगे कहते हैं, “खुद मशीनें बनाने का मतलब है कि हमारे पास ऐसे मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस तक पहुंच है, जो कोई और नहीं दे सकता, और हमारे पास एक खास तकनीकी संसाधन है. यही हमारी असली ताकत है.”
वह यह भी जोड़ते हैं कि कोयंबटूर एक औद्योगिक केंद्र होने के बावजूद, मेटल फैब्रिकेशन इंडस्ट्री में मजदूरों की कमी है. श्रम और पूंजी के बीच संतुलन बदल रहा है, और बाजार इसका असर महसूस कर रहा है.

“यह कारोबार अब आखिरी दौर में है”
कोयंबटूर की एक मेटल फैब्रिकेशन कंपनी के मालिक ने बताया कि मजदूरों की कमी की वजह से उन्होंने कुछ साल पहले कटिंग और बेंडिंग के लिए रोबोट का इस्तेमाल शुरू कर दिया था. लेकिन पूरी तरह ऑटोमेशन अभी उनकी पहुंच से बाहर है.
वह कहते हैं, “ऐसी डार्क फैक्ट्री लगाना, जहां सारा काम रोबोट करें, बहुत ज्यादा पैसे मांगता है. हर कोई यह नहीं कर सकता.”
उनकी शॉप फ्लोर की दीवारें कालिख से भरी हैं और वेल्डिंग की चिंगारियां बेतरतीब ढंग से उड़ती दिखती हैं. मजदूरों के हाथ सालों तक धातु पीटने से सख्त हो चुके हैं. यह एक ऐसी दुनिया है, जहां मशीनें धीरे-धीरे पास आ रही हैं, लेकिन उत्पादन अब भी पसीने और ताकत पर टिका है.
चेन्नई के अंबत्तूर औद्योगिक इलाके में एक और मेटल फैब्रिकेशन यूनिट लगभग कोयंबटूर वाली फैक्ट्री जैसी ही दिखती है. जर्जर इमारत, ऊंची छतें, बाहर की दीवारों पर काले दाग और कुछ थके हुए मजदूर. वहां भी एक सुपरवाइजर ने ऐसे उद्योग की तस्वीर खींची, जो जबरन बदलाव के दौर से गुजर रहा है.

वह कहते हैं, “कुशल मजदूरों की कमी है. ऊपर से, अब सारे प्रोसेस—मेटल शियरिंग, फोल्डिंग और कटिंग—लेजर पर शिफ्ट हो गए हैं.”
इस यूनिट में ऐसी मशीनें हैं, जिनके बिना ऑटोमेशन से दूर रहने वाली फैब्रिकेशन कंपनियां भी नहीं चल सकतीं. वेल्डिंग मशीन, कटिंग और शियरिंग मशीनें, प्लेट रोलिंग मशीन और प्रेस ब्रेक. फिर भी यह ऑटोमेशन की रफ्तार के सामने काफी नहीं है.
सुपरवाइजर कहते हैं, “हमारे मालिक नया कारोबार शुरू करना चाहते हैं. यह वाला अब आखिरी दौर में है.”
हाइपर-ऑटोमेशन के सिक्के के दो पहलू
भारत में डार्क फैक्ट्रियां जितनी रोमांचक हैं, उतनी ही डरावनी भी हैं. यह उस दौर में आ रही हैं, जब देश लंबे समय से बेरोजगारी और अर्ध-बेरोजगारी से जूझ रहा है. 1990 के दशक से मैन्युफैक्चरिंग भारत के GDP का सिर्फ 16 से 17 प्रतिशत ही बनी हुई है. मेक इन इंडिया पहल भी इसे आगे नहीं बढ़ा पाई. खेती GDP में करीब 18 प्रतिशत योगदान देती है, लेकिन इसमें लगभग आधी आबादी काम करती है.
दूसरी बड़ी समस्या है कुशल और प्रमाणित कामगारों की कमी.
पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (2023-24) के आंकड़े इस खाई की गंभीर तस्वीर दिखाते हैं. 22.15 प्रतिशत भारतीय कामगार कम-कुशल (लेवल 1 से नीचे) थे और 66.89 प्रतिशत सेमी-स्किल्ड (लेवल 2 के तहत). सिर्फ 2.37 प्रतिशत लेवल 3 और 8.59 प्रतिशत लेवल 4 में आते हैं.
जेएनयू के सेंटर फॉर लेबर के पूर्व अध्यक्ष मेहरोत्रा कहते हैं, “इसमें कोई शक नहीं कि स्किल्स का गंभीर संकट है.” वह आगे कहते हैं, “इस समस्या का समाधान हो सकता है, लेकिन जिस तरह से अभी इससे निपटा जा रहा है, उस तरह से नहीं. अफसरशाही इसे हल नहीं कर सकती, उन्हें इसकी समझ ही नहीं है.”

मेहरोत्रा का तर्क है कि स्किलिंग की प्रक्रिया में नियोक्ताओं को शामिल करना जरूरी है, जो अब तक नहीं हुआ है.
वह कहते हैं, “भारत में हमने व्यावसायिक कौशल को लेकर गंभीरता से सोचना 2010 में शुरू किया. यह करीब 60 साल देर से हुआ.”
हालांकि उन्हें नहीं लगता कि भारत में डार्क फैक्ट्रियों की ओर बदलाव अभी तेज़ी से होगा, लेकिन इसके संकेत जरूर हैं कि मशीनें धीरे-धीरे स्किल की कमी को भर रही हैं.
रॉकवेल ऑटोमेशन की स्टेट ऑफ स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग रिपोर्ट 2025 के मुताबिक, भारत से शामिल 78 में से 90 प्रतिशत से ज्यादा लोगों ने कहा कि जिन बाधाओं का वे सामना कर रहे हैं—चाहे संगठन के भीतर हों या बाहर—वे डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन को तेज़ कर रही हैं. 17 देशों के 1,560 उत्तरदाताओं में से 41 प्रतिशत ने कहा कि वे स्किल गैप और मजदूरों की कमी को पूरा करने के लिए AI और मशीन लर्निंग ला रहे हैं और ऑटोमेशन बढ़ा रहे हैं.
भारत के लिए इसका मतलब यह है कि मौजूदा श्रम शक्ति की रीढ़ माने जाने वाले कम-कुशल और सेमी-स्किल्ड कामगार सबसे ज्यादा जोखिम में हैं, क्योंकि AI और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) से चलने वाली डार्क फैक्ट्रियां और रोबोट उनकी जगह ले सकते हैं.
यही हाइपर-ऑटोमेशन के सिक्के के दो पहलू हैं. एक तरफ वैश्विक प्रतिस्पर्धा की उम्मीद, और दूसरी तरफ बड़े पैमाने पर नौकरियां जाने का डर.
भारत के सेवा क्षेत्र पर 2025 की रिपोर्ट में नीति आयोग ने खासतौर पर उन मिड-कैरियर प्रोफेशनल्स के लिए तेज़ी से री-स्किलिंग और अप-स्किलिंग की जरूरत बताई है, जिन पर ऑटोमेशन का खतरा है.
रिपोर्ट में कहा गया, “ऑटोमेशन का असर कामगारों पर जटिल और अनिश्चित है, और तकनीकी बदलाव की दिशा राजनीतिक अर्थव्यवस्था की ताकतों से प्रभावित होती रहती है.”
‘अटल’ भविष्य की तैयारी
तकनीकी ट्रेड्स में स्किल-आधारित ट्रेनिंग देने वाले संस्थान भविष्य के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं. चेन्नई के अंबत्तूर में स्थित सरकारी इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (ITI) में रणनीति व्यावहारिक तैयारी की है.
इसके निदेशक प्रभाकरन बीई कहते हैं, “यह ऑटोमेशन अटल है.” वह बताते हैं कि कैसे रोबोटिक्स और AI क्वालिटी जांच से लेकर मेडिकल डायग्नोस्टिक्स तक सब कुछ बदल रहे हैं.
अंबत्तूर का यह ITI एक समय में करीब एक हजार छात्रों को 28 तकनीकी ट्रेड्स में कौशल आधारित प्रशिक्षण देता है. इनमें इंडस्ट्रियल रोबोटिक्स और डिजिटल मैन्युफैक्चरिंग, मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस कंट्रोल और ऑटोमेशन, और बेसिक डिजाइनर व वर्चुअल वेरिफायर (मैकेनिकल) शामिल हैं.
ऑटोमेशन के साथ कदम मिलाने के लिए ITI में PLC (प्रोग्रामेबल लॉजिक कंट्रोलर), HMI (ह्यूमन-मशीन इंटरफेस) और SCADA (सुपरवाइजरी कंट्रोल एंड डेटा एक्विजिशन) की ट्रेनिंग भी दी जाती है.
ये टेक-फ्रेंडली फैक्ट्री फ्लोर की ‘पवित्र त्रिमूर्ति’ हैं. PLC फैक्ट्री मशीनों और प्रक्रियाओं को ऑटोमेट करने के लिए होता है. HMI वह इंटरफेस है, जिससे ऑपरेटर ऑटोमेशन सिस्टम से बातचीत करते हैं. SCADA में सॉफ्टवेयर को इस तरह सेट किया जाता है कि सेंसर से मिलने वाले रियल-टाइम डेटा के जरिए औद्योगिक प्रक्रियाओं की निगरानी और नियंत्रण किया जा सके.
एक क्लासरूम के अंदर, 16 साल के छात्र भी कंप्यूटर स्क्रीन के सामने चार-चार की कतार में बैठे हैं. शिक्षक उन्हें कोड की पंक्तियां लिखना, सीक्वेंस बनाना और यह तय करना सिखा रहे हैं कि कौन सा प्रोग्राम कब शुरू होगा, रुकेगा या बंद होगा.
छात्र ध्यान से निर्देशों का पालन करते हुए रोबोटिक आर्म और ATM मशीनों को प्रोग्राम करना सीख रहे हैं. इंटरनेट युग में पैदा हुई इस पीढ़ी के लिए ऑटोमेशन कोई डरावना साया नहीं है, बल्कि एक ऐसी हकीकत है, जिसका वे हिस्सा बन सकते हैं. और फैक्ट्री फ्लोर पर पूरी तरह रोबोट के कब्जे में जाने में अभी थोड़ा वक्त है.
फिलहाल इस बदलाव को धीमा करने वाले दो कारण हैं, जिन्हें धनुष “रोबोट डिप्लॉयमेंट गैप” और “डेटा स्केलिंग प्रॉब्लम” कहते हैं.
एक उतार-चढ़ाव = 10 लाख डॉलर का नुकसान
FANUC, ABB और KUKA जैसी बड़ी रोबोट बनाने वाली कंपनियों के होते हुए भी, फैक्ट्रियों में रोबोट्स का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल अभी तक नहीं दिखता.
“अगर आप दुनिया भर में भी रोबोट अपनाने को देखें, तो यह बहुत कम है,” धनुष ने कहा.
एक देश जिसने इस चुनौती को सीधे तौर पर लिया, वह था चीन. जब उसने 2015 में अपना औद्योगिक बदलाव का रोडमैप शुरू किया, तब वहां रोबोट घनत्व हर 10,000 मजदूरों पर सिर्फ 49 था. एक दशक से भी कम समय में यह बढ़कर 470 हो गया.
‘डेटा-स्केलिंग’ में मुर्गी-अंडा जैसी समस्या है. धनुष ने कहा कि ट्रेनिंग डेटा बनाने के लिए “सैकड़ों रोबोट” लगाने पड़ते हैं. लेकिन रोबोट को भरोसेमंद तरीके से चलाने के लिए पहले से ही बहुत बड़े पैमाने पर ट्रेनिंग डेटा चाहिए.
“इसका मतलब है कि आपको सिर्फ डेटा इकट्ठा करने के लिए बहुत सारा पूंजीगत खर्च करना पड़ेगा, और अगले दो साल तक कोई कमाई नहीं होगी. तभी आप दस लाख घंटे का ट्रेनिंग डेटा बना सकते हैं, उन मॉडलों पर रोबोट्स को ट्रेन कर सकते हैं और उन्हें फैक्ट्रियों में तैनात कर सकते हैं,” उन्होंने कहा.
इसके अलावा, रोबोट बनाने के लिए जरूरी सबसे बुनियादी पुर्जे भी भारत में नहीं बनते.
“हमें सबसे पहले रोबोट में लगने वाले हर एक पुर्जे को देश में ही बनाना शुरू करना होगा, और हम यही करने की कोशिश कर रहे हैं,” धनुष ने कहा.
बिजली आपूर्ति में रुकावट भी डार्क फैक्ट्रियों के लिए बेहद महंगी साबित हो सकती है.
“अगर बिजली चली जाए या उसमें थोड़ा सा भी उतार-चढ़ाव आए, तो जो सारी मशीनें चल रही होती हैं, उसमें—मुझे लगता है—एक ही फ्लक्चुएशन में करीब 10 लाख डॉलर का नुकसान हो जाएगा,” पॉलीमैटेक के विशाल नंदम ने कहा.
नीति आयोग के रोडमैप में इस समस्या का जिक्र किया गया है. इसमें देश भर में 20 “प्लग एंड प्ले फ्रंटियर टेक्नोलॉजी-सक्षम इंडस्ट्रियल पार्क” बनाने का सुझाव दिया गया है. इसमें एयरोस्पेस और डिफेंस, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और फार्मास्यूटिकल्स को पांच सबसे असरदार सेक्टर बताया गया है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर भारत इन सेक्टरों में अत्याधुनिक तकनीक नहीं अपनाता, तो देश “सिर्फ एक ऐतिहासिक अवसर ही नहीं गंवाएगा… बल्कि 2035 तक करीब 270 अरब अमेरिकी डॉलर और 2047 तक 1 ट्रिलियन डॉलर तक के अतिरिक्त मैन्युफैक्चरिंग जीडीपी के संभावित नुकसान का सामना भी करेगा.”
इन तमाम बाधाओं के बावजूद, इसमें कोई शक नहीं कि हाइपर-ऑटोमेशन भारत के दरवाजे पर दस्तक दे चुकी है. कांचीपुरम की उस डार्क फैक्ट्री में वापस चलें, तो दिन की शिफ्ट जा चुकी है, लेकिन रोबोट खामोशी से काम करते रहते हैं. एक मॉनिटर पर प्रक्रिया का बड़ा किया हुआ दृश्य दिखता है, जहां सुई जैसी एक भुजा सेमीकंडक्टर चिप को जोड़ती है और फिर अगली पर बढ़ जाती है.
अगले स्ट्रेच ब्रेक तक अभी पूरे आठ लंबे महीने बाकी हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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