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Monday, 9 February, 2026
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हिमाचल पर बढ़ता कर्ज़, भविष्य में सब्सिडी-पेंशन के लिए फंड की कमी की चिंता

16वें वित्त आयोग की सिफारिश के तहत राज्यों को केंद्र से मिलने वाली राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) बंद करने का फैसला हिमाचल प्रदेश के लिए बड़ा झटका होगा.

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शिमला: हिमाचल प्रदेश बढ़ते कर्ज़ के जाल में फंसता जा रहा है. स्थिति यह है कि राज्य को पुराने कर्ज़ की जो रकम चुकानी है, वह अगले साल लिए जाने वाले कर्ज़ से भी ज्यादा है. इसी बीच दशकों से मिल रही केंद्र की मदद भी खत्म होने की आशंका है.

राज्य के वित्त विभाग के आंकड़ों के अनुसार, हिमाचल को साल 2026-27 में 13,000 करोड़ रुपये का कर्ज़ चुकाना है, जबकि वह सिर्फ 10,000 करोड़ रुपये का नया कर्ज़ लेने की योजना बना रहा है. इससे 3,000 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी होगी. इस असंतुलन ने विकास कार्यों, सामाजिक सुरक्षा पेंशन, वेतन और पेंशन के बकाया भुगतान और यहां तक कि बुनियादी सब्सिडी पर भी संकट खड़ा कर दिया है.

यह आर्थिक दबाव ऐसे समय आया है, जब राज्य 16वें वित्त आयोग की उस सिफारिश से जूझ रहा है, जिसमें 2026-31 की अवधि के लिए सभी राज्यों को मिलने वाला राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) पूरी तरह बंद करने की बात कही गई है.

आरडीजी वह राशि है, जो संविधान के अनुच्छेद 275(1) के तहत केंद्र सरकार राज्यों को उनकी आय और खर्च के बीच की कमी को पूरा करने के लिए देती है.

राज्य अधिकारियों और स्वतंत्र आर्थिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि आरडीजी बंद होने से अगले पांच साल में हिमाचल प्रदेश को 35,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का कुल राजस्व नुकसान हो सकता है.

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने आरडीजी को बहाल करने या फिर ‘ग्रीन बोनस’ नाम से एक अलग व्यवस्था बनाने की मांग की है. इसमें हिमालयी राज्यों के लिए हर साल 50,000 करोड़ रुपये का प्रस्तावित फंड शामिल है.

उन्होंने चेतावनी दी कि 2025-26 “पिछले कई दशकों में हमारे राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण साल होगा.”

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के जयराम ठाकुर ने आरडीजी बंद करने को गंभीर बताया, लेकिन साथ ही पहले मिले फंड के बेहतर इस्तेमाल पर जोर दिया.

उन्होंने कहा, “केंद्र ने सालों से हिमाचल को पर्याप्त फंड दिया है. समस्या कुप्रबंधन और राजस्व बढ़ाने के लिए ठोस प्रयासों की कमी की है.”

पहले जो केंद्रीय सहायता व्यवस्थाएं राज्यों की आय की कमी को पूरा करने में मदद करती थीं, उनके खत्म होने से पहाड़ी राज्य की वित्तीय मुश्किलें और बढ़ गई हैं. राज्य पहले से ही ज्यादा तय खर्चों, कम राजस्व वृद्धि और बार-बार आने वाली प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहा है.

15वें वित्त आयोग की अवधि (2021-26) के दौरान राज्य को कुल करीब 37,199 करोड़ रुपये का आरडीजी मिला. हर साल यह राशि लगातार घटती गई— 2021-22 में 10,949 करोड़ रुपये, 2022-23 में 9,377 करोड़ रुपये, 2023-24 में 8,058 करोड़ रुपये, 2024-25 में 6,258 करोड़ रुपये और 2025-26 में 3,257 करोड़ रुपये.

चार साल में इसमें करीब 70 प्रतिशत की गिरावट आई.

इससे पहले 14वें वित्त आयोग (2015-20) के तहत हिमाचल प्रदेश को 40,624 करोड़ रुपये मिले थे, यानी औसतन हर साल करीब 8,000 करोड़ रुपये. 15वें वित्त आयोग में कटौती के बाद, महंगाई को जोड़कर देखें तो इसकी वास्तविक कीमत करीब 30,000 करोड़ रुपये रह गई.

उत्तर भारत में कांग्रेस द्वारा शासित इकलौते राज्य हिमाचल प्रदेश को अगले चक्र में भी 30,000 से 35,000 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद थी, लेकिन आरडीजी को पूरी तरह खत्म करने की सिफारिश राज्य के लिए बड़ा आर्थिक झटका है.

हालांकि, 16वें वित्त आयोग ने केंद्रीय करों के बंटवारे में हिमाचल प्रदेश की हिस्सेदारी 0.83 प्रतिशत से बढ़ाकर 0.914 प्रतिशत कर दी है, जिससे हर साल 1,000 से 2,000 करोड़ रुपये अतिरिक्त मिल सकते हैं. इसके अलावा, स्थानीय निकायों और आपदा प्रबंधन के लिए करीब 4,200 करोड़ रुपये के बंधे हुए अनुदान भी दिए गए हैं.

लेकिन ये रकम खास योजनाओं से जुड़ी हैं और इनमें वह खुली छूट नहीं है, जो आरडीजी के तहत मिलती थी.

अनुदानों पर निर्भरता

2025-26 के वित्त विभाग के आंकड़ों के अनुसार, राज्य को 7,440 करोड़ रुपये का राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) मिला, जो 58,514 करोड़ रुपये के कुल बजट का 12.71 प्रतिशत है. इससे साफ होता है कि राज्य इन अनुदानों पर कितना निर्भर है. मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा कि संविधान के तहत यह राज्यों का अधिकार है.

रविवार को राज्य के वित्त विभाग ने कैबिनेट और विधायकों के सामने एक विस्तृत प्रस्तुति दी. इसमें बताया गया कि हिमाचल प्रदेश के पास विकास कार्यों, सब्सिडी देने, वेतन और पेंशन भुगतान या महंगाई भत्ता (डीए) के बकाया चुकाने के लिए अपने स्तर पर कोई पैसा नहीं है.

वित्त विभाग ने सभी सब्सिडी बंद करने का सुझाव दिया. बताया गया कि सरकार बिजली सब्सिडी के रूप में 1,200 करोड़ रुपये और सामाजिक सुरक्षा पेंशन के रूप में 1,661 करोड़ रुपये देती है.

भविष्य की भर्तियों के लिए यूनिफाइड पेंशन स्कीम अपनाने या फिर न्यू पेंशन स्कीम में लौटने का भी सुझाव दिया गया है, ताकि 1,800 करोड़ रुपये का अतिरिक्त कर्ज़ लिया जा सके.

वित्त विभाग के प्रमुख सचिव देवेश कुमार ने सरकार और विधायकों को बताया कि राज्य के पास केंद्रीय योजनाओं के लिए मैचिंग ग्रांट देने, नई भर्तियां करने या भविष्य में डीए और पेंशन के बकाया चुकाने के लिए भी धन नहीं है.

उन्होंने कहा कि राज्य 500 करोड़ रुपये के डीए बकाया के साथ-साथ 8,500 करोड़ रुपये के वेतन और पेंशन बकाया चुकाने में भी संघर्ष कर रहा है.

ग्राफिक: सोनाली डब/दिप्रिंट
ग्राफिक: सोनाली डब/दिप्रिंट
ग्राफिक: सोनाली डब/दिप्रिंट
ग्राफिक: सोनाली डब/दिप्रिंट

कुमार ने कहा कि हिमाचल प्रदेश लंबे समय से राजस्व घाटे वाला राज्य है. उन्होंने कहा, “अपने टैक्स से विकास और पूंजीगत खर्च होना बहुत मुश्किल है.”

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अगले वित्त वर्ष में राज्य की अपनी आय 18,000 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है. वहीं, 13,500 करोड़ रुपये केंद्रीय करों में हिस्सेदारी से और 10,000 करोड़ रुपये कर्ज़ से आएंगे.

वेतन, पेंशन, ब्याज, कर्ज चुकौती, सब्सिडी और सामाजिक सुरक्षा पेंशन जैसे तय खर्च 48,000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुके हैं. इसके बावजूद करीब 6,000 करोड़ रुपये की कमी रह जाती है, जिसे आरडीजी से पूरा किया जाना था.

ऑडिटरों ने बार-बार चेतावनी दी

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने हिमाचल प्रदेश को बार-बार कर्ज़ के जाल में फंसने की चेतावनी दी है.

2016-17 की रिपोर्ट में ही सीएजी ने कहा था कि बढ़ते खर्च और भारी कर्ज चुकौती के दबाव के कारण राज्य 2018-19 तक कर्ज़ के जाल में फंस जाएगा.

सीएजी ने 2023-24 की अपनी हालिया रिपोर्ट (जो 2025 में पेश की गई) में फिर चेतावनी दी. इसमें बताया गया कि कर्ज़ चुकाने में इस्तेमाल होने वाले सार्वजनिक ऋण का अनुपात 2019 में 52.99 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 74.11 प्रतिशत हो गया है. बढ़ते खर्च और वित्तीय दबाव के बीच नया कर्ज पुराने कर्ज चुकाने में ही लग रहा है.

बजट में मामूली बढ़ोतरी

2025-26 के लिए राज्य का बजट 58,514 करोड़ रुपये रखा गया, जो पिछले साल के 58,444 करोड़ रुपये से सिर्फ 70 करोड़ रुपये ज्यादा है.

कुल आय 56,945.34 करोड़ रुपये रही, जबकि खर्च 58,514.31 करोड़ रुपये था. राजस्व खाते में 42,343 करोड़ रुपये की आय और 48,733 करोड़ रुपये का खर्च रहा, जिससे 6,390 करोड़ रुपये का राजस्व घाटा हुआ. यह जीएसडीपी का करीब 2.5 प्रतिशत है.

खर्च में सबसे बड़ा हिस्सा वेतन और पेंशन का है. वेतन और पेंशन मिलाकर 26,293 करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं, जिसमें 14,716 करोड़ रुपये वेतन और 11,577 करोड़ रुपये पेंशन के हैं. यह राजस्व आय का करीब 62 प्रतिशत और राजस्व खर्च का 54 प्रतिशत है.

ब्याज भुगतान पर करीब 6,738 करोड़ रुपये खर्च होते हैं, जबकि कर्ज़ चुकौती 5,840 करोड़ रुपये है (जिसमें 5,805.74 करोड़ रुपये सार्वजनिक कर्ज की अदायगी है).

हर 100 रुपये खर्च में से 25 रुपये वेतन, 20 रुपये पेंशन, 12 रुपये ब्याज और 10 रुपये कर्ज़ चुकाने में चले जाते हैं. बाकी सिर्फ 24 रुपये ही विकास, बुनियादी ढांचे और अन्य कामों के लिए बचते हैं.

पूंजीगत खर्च सीमित रहा. 2025-26 में यह 3,941.13 करोड़ रुपये रहा, जो राजस्व खर्च की तुलना में काफी कम है और विकास से जुड़े निवेश को सीमित करता है.

कुल मिलाकर, बजट का करीब 67 प्रतिशत हिस्सा वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान और कर्ज चुकौती पर ही खर्च हो रहा है.

कर्ज़ तेज़ी से बढ़ा

बजट दस्तावेज़ और सीएजी रिपोर्ट के अनुसार, राज्य का कुल कर्ज 2022-23 के 86,589 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,04,729 करोड़ रुपये हो गया है.

इसमें से 29,046 करोड़ रुपये सुक्खू सरकार के सत्ता में आने के बाद पिछले तीन साल में लिए गए हैं. हालांकि, मुख्यमंत्री का कहना है कि इसमें से 70 प्रतिशत पैसा पिछली बीजेपी सरकार के समय के कर्ज़ और ब्याज चुकाने में चला गया.

राज्य की अपनी टैक्स आय में सालाना बढ़ोतरी सिर्फ 6-8 प्रतिशत रही है. इसका कारण कमजोर औद्योगिक आधार और 67 प्रतिशत क्षेत्र में वन क्षेत्र होना है.

जून 2022 में जीएसटी मुआवजा व्यवस्था खत्म होने से हर साल करीब 3,000-3,500 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. वहीं, 2023 में पुरानी पेंशन योजना बहाल होने के बाद कर्ज़ लेने की सीमा भी घट गई, जिससे हर साल 4,000 से 5,000 करोड़ रुपये की कर्ज़ क्षमता कम हो गई.

2023 और 2024 में प्राकृतिक आपदाओं से 15,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ. पुनर्वास पर होने वाला खर्च अलग से दबाव डाल रहा है.

दिसंबर 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस सरकार के कई वादे अभी अधूरे हैं या उन्हें धन की कमी का सामना करना पड़ रहा है.

महिला सम्मान निधि योजना के तहत 18 से 60 साल की महिलाओं को 1,500 रुपये महीना देने की योजना चरणों में लागू की गई है. पूरी तरह लागू करने पर हर साल 2,200 से 2,800 करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं.

पांच लाख नौकरियों के वादे के तहत तीन साल में सिर्फ 20,000 से 25,000 पद ही भरे या अधिसूचित हुए हैं. 680 करोड़ रुपये के स्टार्टअप फंड में भी प्रशासनिक और बजटीय दिक्कतों के कारण पैसा धीरे-धीरे दिया जा रहा है.

सुक्खू ने बार-बार राज्य की आर्थिक मुश्किलों को उसके पर्यावरणीय योगदान से जोड़ा है.

उन्होंने कहा, “हिमाचल पूरे क्षेत्र के लिए जंगलों और नदियों को बचा रहा है. हम उत्तर भारत का वाटर टावर हैं, लेकिन बदले में हमें निजी जलविद्युत परियोजनाओं से सिर्फ 12 प्रतिशत रॉयल्टी मिलती है.”

उन्होंने कहा, “अगर हम भी दूसरे राज्यों की तरह जंगलों का दोहन करते, तो दो साल में 1 लाख करोड़ रुपये कमा सकते थे, लेकिन हम देश को हर साल 1.65 से 1.90 लाख करोड़ रुपये की पर्यावरणीय सेवाएं दे रहे हैं—स्वच्छ हवा, जल सुरक्षा और जलवायु संतुलन के रूप में. आरडीजी को पूरी तरह खत्म करना इस योगदान को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करता है.”

स्वतंत्र वित्तीय शोधकर्ता निखिल मेहता ने कहा कि आरडीजी खत्म होना सुधारों की ज़रूरत दिखाता है.

उन्होंने कहा, “पिछले दस साल में हिमाचल को करीब 70,000 करोड़ रुपये का आरडीजी मिला. राज्य और केंद्र—दोनों को यह बताना चाहिए कि इस दौरान टैक्स दायरा बढ़ाने और तय खर्च को काबू में करने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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