मोदी सरकार ने 2026-27 का जो केंद्रीय बजट पेश किया है उसमें सेनाओं के आधुनिकीकरण के मसले को आगे बढ़ाने की गंभीर कोशिश की गई है. इस बार रक्षा बजट के लिए पूंजीगत मद में 2.19 लाख करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है, यह 2025-26 में किए गए 1.80 लाख करोड़ रु. से 21.84 प्रतिशत ज्यादा है. बीते वर्षों में रक्षा बजट में हर साल औसतन 5 फीसदी की वृद्धि का जो नियम जैसा बन गया था उससे तो कहीं ऊंची छलांग है. वह 5 फीसदी की वृद्धि न तो महंगाई की भरपाई कर पाती थी, और न रुपये की कीमत में गिरावट की.
पिछले साल रक्षा बजट के लिए कुल 6.81 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, जिसमें इस साल 15.19 फीसदी की वृद्धि करके कुल 7.85 लाख करोड़ का आवंटन किया गया है. यह केंद्र सरकार के कुल खर्च का 14.67 प्रतिशत, और अनुमानित जीडीपी के 2 प्रतिशत के बराबर है. कुल आवंटन का 27.95 प्रतिशत भाग पूंजीगत खर्च के मद में जाएगा, 20.17 फीसदी भाग ऑपरेशनों और तैयारियों पर खर्च होगा, और 26.40 प्रतिशत हिस्सा वेतन-भत्तों पर, 21.84 प्रतिशत रक्षाकर्मियों की पेंशन पर, और 3.64 प्रतिशत सिविल संगठनों पर खर्च होगा.
आधुनिकीकरण: रणनीतिक अनिवार्यता
रक्षा मंत्रालय का कहना है कि मौजूदा भू-राजनीतिक परिदृश्य में, सेनाओं के आधुनिकीकरण के बजट में बड़ी वृद्धि रणनीतिक अनिवार्यता बन गई है. पूंजीगत खर्च में से 1.84 लाक करोड़ पूंजीगत अधिग्रहण के लिए रखा गया है, यह वित्त वर्ष 2025-26 में रखे गए इसके हिस्से से करीब 24 फीसदी ज्यादा है. ‘आत्मनिर्भरता’ की नीति के अनुरूप किए गए इस आवंटन के 75 प्रतिशत हिस्से यानी 1.39 लाख करोड़ वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान घरेलू उद्योगों से खरीद के वास्ते रखे गए हैं.
रक्षा मंत्रालय ने दिसंबर 2025 तक 2.10 लाख करोड़ रुपये मूल्य के करारों पर दस्तखत कर दिए थे और अब तक 3.50 लाख करोड़ से ज्यादा मूल्य की ‘आवश्यकता की स्वीकृति’ दे दी है. पूंजीगत अधिग्रहण के तहत आने वाली परियोजनाएं सेनाओं को अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान, स्मार्ट तथा मारक वेपन्स, युद्धपोत/ पनडुब्बी, मानव रहित एरियल सिस्टम्स और आधुनिक वाहन आदि से लैस करेंगी.
आवंटन में वृद्धि ऑपरेशन सिंदूर के बाद हथियारों और गोला-बारूद की आपात खरीद के कारण पूंजीगत तथा राजस्व मदों में पैदा हुई अतिरिक्त वित्तीय जरूरतों को पूरा करने मददगार होगी.
इतिहास में शायद पहली बार ऐसा होगा कि पूंजीगत बजट में 20 फीसदी की वृद्धि की जो मांग रक्षा मंत्रालय ने की थी पूरी तरह मान लिया गया है, बल्कि अतिरिक्त 1.84 प्रतिशत तो बोनस के रूप में भी दिया गया है. अब यह मंत्रालय और सेनाओं के ऊपर है कि वे इसका पूरा उपयोग करें क्योंकि ‘नॉन-लैप्सेबल डिफेंस मॉडर्नाइजेशन फंड’ अधर में लटका हुआ है.
वास्तविकता क्या है
‘विकसित भारत 2047’ का लक्ष्य भारत को विश्व में तीसरे ध्रुव के रूप में स्थापित करेगा. इसके लिए ऐसी अत्याधुनिक विकसित सेना की जरूरत होगी, जो जरूरत पड़ी तो राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए संपूर्ण रणनीतिक स्वायत्तता को लागू करेगी. रक्षा मंत्रालय को इस जरूरत का इल्म है और उसने पिछले साल के रक्षा बजट के साथ इसकी घोषणा कर दी थी.
विकसित सेना के गठन के लिए 2047 के वास्ते राष्ट्रीय सुरक्षा का एक ‘विजन’ चाहिए, एक राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति, जिसकी हर पांच साल पर समीक्षा हो, और सेना को बदलने के लिए एक नेशनल डिफेंस पॉलिसी चाहिए, जिसके तहत सेना को दो दशकों के अंदर बदल देने का वादा शामिल हो. ये राष्ट्रीय सुरक्षा के मूल आधार हैं, जिन्हें पूरा करने की ज़िम्मेदारी सेना की सलाह सुनने वाली राजनीतिक सत्ता की होती है. लेकिन इनके अस्तित्व के कोई संकेत सार्वजनिक दायरे में नहीं हैं.
बहरहाल, किसी औपचारिक रणनीति और नीति के अभाव में भी चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने जनवरी 2025 में कहा था कि सेनाओं के लिए ‘विजन 2047’ को 2025 के मध्य तक आकार दे दिया जाएगा और उसे अधिकृत रूप से जारी कर दिया जाएगा. उन्होंने यह भी कहा था कि इसके अंतर्गत ‘इंटीग्रेटेड कैपेबिलिटी डेवलपमेंट प्लान’ (आईसीडीपी) भी तैयार किया जाएगा. अभी तक यह सार्वजनिक नहीं किया गया है कि ‘विजन 2047’ और आईसीडीपी तैयार हुए हैं या नहीं और सरकार ने उन्हें मंजूरी दी है या नहीं.
इन सबके मद्देनजर, और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति जो मौजूदा रवैया है उसे देखते हुए रक्षा बजट केवल सेना के बमुश्किल क्रमिक आधुनिकीकरण और मौजूदा स्तर को बनाए रखने के काम ही आ सकता है. अपर्याप्त बजट के कारण क्रमिक आधुनिकीकरण भी वर्षों पीछे पिछड़ गया है. 114 राफेल फाइटर विमान एक दशक पहले ही वायुसेना के बेड़े में शामिल हो जाने चाहिए थे, लेकिन अब उनकी लागत 3.25 लाख करोड़ रुपये (40 अरब डॉलर) हो जाएगी, और उम्मीद है कि इन 18 विमानों की पहली खेप 2030 से आने लगेगी, बशर्ते सौदा 2027 के शुरू तक तय हो गया तो. जर्मनी के साथ 8-10 अरब डॉलर का पनडुब्बी सौदा अभी तय होना बाकी है; और 3.5 अरब डॉलर के 31 प्रिडेटर ड्रोनों के सौदे का भुगतान किया जाना है. ‘एड्वान्स्ड मीडियम कंबैट एयरक्राफ्ट’ (एएमसीए) और दो और विमानवाही पोतों के विकास के लिए फंड देना बाकी है. सेना का ड्रोनीकरण होना है और ऑटोनोमस सिस्टम्स का विकास शुरू किया जाना है.
मेकेनाइज्ड टैंकों और थलसेना के युद्धक वाहनों की जगह 57,000 करोड़ रु. मूल्य के ‘फ्यूचर रेडी कंबैट वेहिकल’ और 50,000 करोड़ रु. मूल्य के ‘फ्यूचर इन्फैन्ट्री कंबैट वेहिकल’ शामिल किया जाना है. योजना यह भी है कि 5 अरब डॉलर मूल्य के पांच अतिरिक्त एस-400 रेजीमेंट तैयार किए जाएं. निकट भविष्य में जो हाइटेक युद्ध होंगे उनके लिए हजारों करोड़ मूलये के ‘प्रिसीजन गाइडेड म्यूनीशन’ तैयार करने होंगे. उदाहरण के लिए, हरेक ब्रह्मोस मिसाइल की कीमत 25-34 करोड़ रु. है, आकाश मिसाइलों की एक यूनिट ढाई करोड़ रु. में आती है. हरेक एस-400 मिसाइल की कीमत उसके प्रकार और उसकी रेंज के अनुसार 3 लाख से लेकर 20 लाख डॉलर तक है.
अंतरराष्ट्रीय दिग्गजों अमेरिका, चीन, और रूस के रक्षा बजट क्रमशः 839 अरब डॉलर, 313 अरब डॉलर (अधिकतर जानकारों के मुताबिक वास्तविक खर्च 30-50 फीसदी ज्यादा), और 166 अरब डॉलर है.
चीन जी-2 में शामिल
यहां तक कि राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने भी माना है कि चीन अमेरिका के साथ ‘जी-2’ में शामिल हो गया है. करीब 19.4 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी के साथ चीन की आर्थिक ताकत तो जबरदस्त हो ही चुकी है, उसकी सैन्य शक्ति अमेरिका को चुनौती एनए के काबिल हो गई है और इसने उसे ‘ग्रुप-2’ में शामिल करा दिया है.
‘विकसित भारत 2047’ जैसे लक्ष्य की तरह चीन का सपना भी ‘शक्तिशाली और समृद्ध’ राष्ट्र बनने का है, जो ‘2049 तक महाशक्ति का दर्जा’ हासिल कर ले. भारत की तरह चीन को भी एहसास हो गया है कि एक महाशक्ति के नाते उसे अपनी ‘पीपुल्स लिबरेशन आर्मी’ का कायापलट करने की जरूरत है. इसी ने उसके राष्ट्रीय सुरक्षा ‘विजन’, रणनीति, और नीति को परिभाषित किया, और उसने 2016 तक ‘पीएलए’ का कायापलट करने के लिए व्यापक सैन्य सुधार शुरू कर दिए थे.
तीन दशकों में, 2020, 2027, 2035 और 2049 के लिए लक्ष्य साफ तौर पर निर्धारित किए गए. इनके बारे में विस्तार से जानने के लिए मेरे पिछले लेख को देखें. अमेरिका को चुनौती देने के काबिल बनने के लिए निर्धारित पहले दो लक्ष्य हासिल कर लिये गए हैं. तीसरा लक्ष्य 2035 के लिए तय किया गया है जिसके तहत अमेरिका की बराबरी में आने का है और उसके बाद 2049 तक मजबूती देने का काम जारी रहेगा.
चीन का रक्षा बजट 2015 में 196.54 अरब डॉलर का था, जो 2025 में बढ़कर 313 अरब डॉलर का हो गया. इस बीच इसकी जीडीपी 11.06 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 19.4 ट्रिलियन डॉलर के बराबर हो गई. चीन का घोषित रक्षा बजट उसकी जीडीपी के 2 फीसदी के बराबर था. लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का आकलन है कि वह वास्तव में इस रक्षा बजट से 30-50 फीसदी तक ज्यादा खर्च कर रहा है.
आगे का रास्ता
अगर भारत 2047 में महाशक्तियों की बराबरी में आना चाहता है तो उसे राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति अपने नजरिए में मूलभूत बदलाव लाना होगा. राष्ट्रीय सुरक्षा, ‘विजन’ रणनीति, और प्रतिरक्षा नीति को स्पष्ट समय सीमा के अनुरूप निर्धारित करना होगा. 2030 तक, भारत को पाकिस्तान से बड़ी बढ़त ले लेनी होगी, 2035 तक उसे चीन को चुनौती देने की स्थिति में आना होगा और 2047 तक उसकी बराबरी में आने की कोशिश करनी होगी. यह सब हासिल करने के लिए रक्षा बजट में भारी उछाल देने की जरूरत है. हमारा वर्तमान बजट 86 अरब डॉलर का है, जितना चीन का 2010-11 में था. यानी हम बजट आवंटन में उससे 16 वर्ष पीछे हैं और अपने यहां बदलाव शुरू करने में उससे एक दशक पीछे हैं.
भारत के रक्षा बजट को तुरंत एक दशक के लिए बढ़ाकर उसकी जीडीपी के 4 फीसदी के बराबर कर देना चाहिए और इसके बाद उसके 3 फीसदी से ऊपर रखना चाहिए. भारतीय अर्थव्यवस्था अगर निरंतर 7 फीसदी की दर से वृद्धि करेगी तो उसका आकार 10 साल में दोगुना बड़ा होकर 2035 में 8 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को छू लेगा. 2047 तक यह 19 ट्रिलियन डॉलर के बराबर हो जाएगा. अगर वृद्धि दर 8 फीसदी रही तो यह 2035 तक 9.5 ट्रिलियन डॉलर के बराबर और 2047 तक 23 ट्रिलियन डॉलर के बराबर हो जाएगी. रक्षा बजट को मौजूदा वृद्धि दर के साथ जीडीपी के 4 प्रतिशत के बराबर लाया गया तो 2035 में हमारा रक्षा बजट 320-380 ट्रिलियन डॉलर के बराबर हो जाएगा और यह 2026 में चीन के घोषित रक्षा बजट के बराबर हो सकता है.
हमारे रक्षा बजट को अगर जीडीपी के 4 प्रतिशत के बराबर लाया गया तो वह 170 अरब डॉलर के बराबर का हो जाएगा, और रूस के मौजूदा बजट से बड़ा हो जाएगा. अगर समग्र सैन्य सुधारों को लागू किया गया तो 2035 तक भारत सैन्य मामले में उस स्थिति में पहुंच जाएगा जिस स्थिति में चीन आज अमेरिका के मुक़ाबले है— चुनौती दे रही एक ऐसी ताकत जिसे बराबरी की ताकत माना जाना चाहिए.
सार यह कि, 7.85 लाख करोड़ रु. के साथ 2.19 लाख करोड़ रु. के पूंजीगत व्यय वाला बढ़ा हुआ रक्षा बजट अच्छा तो है मगर इतना अच्छा नहीं कि भारतीय सेना 2047 की ‘विकसित सेना’ बन सके.
लेफ्टिनेंट जनरल एच एस पनाग PVSM, AVSM (रिटायर्ड) ने भारतीय सेना में 40 साल तक सेवा की. वह नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड के GOC इन C थे. रिटायरमेंट के बाद, वह आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के सदस्य थे. विचार निजी हैं.
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