नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को वित्त मंत्रालय को छह महीने का समय दिया है ताकि वह एक जनहित याचिका (PIL) पर कदम उठाए. यह याचिका भारत के चुनावी खुलासे के ढांचे में एक ग्रे एरिया को लेकर है, जो नेताओं की क्रिप्टोकरेंसी होल्डिंग्स से जुड़ा है.
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 और चुनाव संचालन नियम, 1961 के तहत वर्चुअल डिजिटल एसेट्स यानी क्रिप्टोकरेंसी की जानकारी देना फिलहाल स्वैच्छिक है, जरूरी नहीं.
यह याचिका वकीलों सुरूर मंदर और गौरव कुमार के जरिए दायर की गई है. याचिका में कहा गया है कि अब वर्चुअल एसेट्स अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा बनते जा रहे हैं, इसलिए इन्हें रेगुलेट करना जरूरी है.
याचिका में कहा गया है कि 1951 के कानून और चुनाव संचालन नियमों में क्रिप्टोकरेंसी का अनिवार्य खुलासा न होना मतदाताओं के सूचना के मौलिक अधिकार को गंभीर रूप से प्रभावित करता है.
चीफ जस्टिस डी.के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने मंत्रालय को निर्देश दिया कि वह सिफारिशें पेश करे या कोई और फैसला ले और छह महीने के भीतर याचिकाकर्ताओं को इसकी जानकारी दे.
“लेकिन सरकार यह कैसे करेगी, यह अभी भी एक बड़ा सवाल बना हुआ है,” मंदर ने दिप्रिंट से कहा. “कुछ समय पहले मैं जबलपुर के एक युवा वकील से जुड़ी और हमने तय किया कि इस मुद्दे को उठाया जाए. हालांकि ये वर्चुअल डिजिटल एसेट्स बिना किसी शक के आर्थिक साधन माने जाते हैं, हमने चुनाव आयोग को लिखा था. लेकिन उन्होंने फॉर्म 26 में नेताओं की संपत्ति के खुलासे में इन्हें शामिल करने को लेकर हमारी बातों पर कोई जवाब नहीं दिया.”
मंदर ने सुप्रीम कोर्ट के 2002 और 2003 के फैसलों का हवाला दिया, जिनमें यूनियन ऑफ इंडिया बनाम एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और पीयूसीएल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया जैसे मामले शामिल हैं. उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग के पास यह अधिकार है कि वह कानून में खाली जगहों को भर सके ताकि निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित किए जा सकें. “लेकिन यह मुद्दा अब भी एक ग्रे एरिया बना हुआ है.”
मंदर ने कहा कि भले ही फिलहाल नेताओं के लिए ऐसे खुलासे स्वैच्छिक हों, फिर भी इस मुद्दे को रेगुलेट करने के लिए गाइडलाइंस की जरूरत है. उन्होंने यह भी कहा कि इस वक्त केवल कुछ ही लोग, जैसे शशि थरूर और जयंत चौधरी, स्वेच्छा से ऐसी जानकारी दे रहे हैं.
“अगर सांसद या विधायक ऐसे डिजिटल एसेट्स की जानकारी छिपाते हैं या गलत बयान देते हैं, तो इसे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम का उल्लंघन माना जाना चाहिए. अब गेंद वित्त मंत्रालय के पाले में है, जिसे छह महीने में फैसला लेना है.”
आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 2(47A) के तहत क्रिप्टोकरेंसी या वर्चुअल डिजिटल एसेट्स को ऐसी किसी भी जानकारी, कोड, नंबर या टोकन के रूप में परिभाषित किया गया है जो भारतीय या विदेशी मुद्रा नहीं है. इन डिजिटल एसेट्स की अपनी अंतर्निहित वैल्यू होती है, जिन्हें किसी भी वित्तीय लेनदेन या निवेश में इस्तेमाल किया जा सकता है और जिन्हें इलेक्ट्रॉनिक तरीके से ट्रांसफर, स्टोर या ट्रेड किया जा सकता है.
संशोधित आयकर कानून यह भी कहता है कि वर्चुअल डिजिटल एसेट्स पर 30 प्रतिशत टैक्स लगाया जाएगा.
याचिका क्या कहती है
यह मामला वकील दीपांशु साहू द्वारा दायर की गई PIL से जुड़ा है, जिसका मकसद चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता, ईमानदारी और शुचिता को मजबूत करना है.
याचिका में कहा गया है कि अगर 1951 के कानून और चुनाव संचालन नियमों के तहत क्रिप्टोकरेंसी का खुलासा अनिवार्य नहीं किया गया, तो मतदाताओं के सूचना के मौलिक अधिकार और “चुनावों की शुचिता” पर गंभीर असर पड़ेगा.
मौजूदा कानूनी ढांचे के तहत, 1951 के कानून की धारा 75A चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को अपनी चल और अचल संपत्ति और देनदारियों का खुलासा करने को कहती है. लेकिन इसमें क्रिप्टोकरेंसी जैसे डिजिटल एसेट्स के लिए कोई अलग व्यवस्था नहीं है. याचिका में कहा गया है कि 1961 के नियमों में भी ऐसी कोई शर्त शामिल नहीं है.
याचिका के मुताबिक, भारत में क्रिप्टोकरेंसी के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल और कई कानूनों के तहत इसे संपत्ति और पूंजीगत संपत्ति के रूप में मान्यता दिए जाने के चलते यह कमी बेहद गंभीर है.
याचिका में कहा गया है कि क्रिप्टोकरेंसी अब “सट्टा” या गैर-कानूनी साधन नहीं रह गई हैं. इसमें आयकर अधिनियम का हवाला देते हुए कहा गया है कि धारा 2(47A) के तहत इन्हें मान्यता दी गई है. “इनके ट्रांसफर से होने वाली आय पर सीधे 30 प्रतिशत टैक्स लगता है,” याचिका में कहा गया है, और यह भी जोड़ा गया है कि ऐसे साधनों का खुलासा न करने पर दंडात्मक कार्रवाई हो सकती है.
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि इन वर्चुअल डिजिटल एसेट्स को मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम, 2002 के तहत भी लाया गया है, ताकि मनी लॉन्ड्रिंग, गुमनाम लेनदेन और अवैध पैसों के प्रवाह के जोखिमों को स्वीकार किया जा सके.
इसके बावजूद, याचिका के मुताबिक, चुनावी कानूनों में क्रिप्टोकरेंसी को लेकर चौंकाने वाली खामोशी है.
समस्या की असल जड़
याचिका में कहा गया है कि फॉर्म 26 में वर्चुअल डिजिटल एसेट्स के लिए न तो कोई अलग कॉलम है और न ही उनकी कोई साफ परिभाषा दी गई है. इसकी वजह से उम्मीदवार अपनी बड़ी डिजिटल संपत्ति को “कोई अन्य संपत्ति” जैसी अस्पष्ट श्रेणी में छिपा सकते हैं.
याचिका में आगे कहा गया है कि क्रिप्टोकरेंसी का स्वरूप विकेंद्रीकृत और सीमा-पार होता है. ऐसे में यह कमी एक ऐसा ढांचागत छेद बनाती है, जिसका इस्तेमाल बिना खुलासे के राजनीतिक फंडिंग, चुनावी गड़बड़ियों और संपत्ति छिपाने के लिए किया जा सकता है.
क्रिप्टोकरेंसी का खुलासा न किया जाना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मतदाताओं के सूचना के मौलिक अधिकार का भी उल्लंघन है. इस सिद्धांत को सुप्रीम कोर्ट कई फैसलों में सही ठहरा चुका है, जिनमें 2024 का इलेक्टोरल बॉन्ड्स से जुड़ा फैसला भी शामिल है.
याचिका में कहा गया है कि मौजूदा ढांचा “मनमाना” और असंवैधानिक है. यह समानता के अधिकार का भी उल्लंघन करता है, क्योंकि शेयर, बैंक जमा और संपत्ति जैसी पारंपरिक संपत्तियों वाले उम्मीदवारों पर सख्त खुलासा मानक लागू होते हैं, जबकि क्रिप्टोकरेंसी में ज्यादा संपत्ति रखने वाले लोग उसी तरह की जांच से बच जाते हैं.
याचिका में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि क्रिप्टोकरेंसी कानूनी तौर पर संपत्ति के दायरे में आती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने जुलुभाई नानभाई खचर बनाम गुजरात राज्य मामले में यह माना है. याचिका के मुताबिक, जब इन्हें संपत्ति माना जा चुका है, तो इन्हें अनिवार्य चुनावी खुलासे से बाहर रखना कानूनी तौर पर सही नहीं ठहराया जा सकता.
इन्हीं वजहों से याचिका में राहत की मांग की गई है. इसमें यह घोषणा करने की मांग है कि ये वर्चुअल डिजिटल एसेट्स 1951 के कानून की धारा 75A के तहत चल संपत्ति के दायरे में आते हैं. साथ ही फॉर्म 26 में क्रिप्टोकरेंसी होल्डिंग्स के लिए एक अलग और स्पष्ट खुलासा व्यवस्था जोड़ने की मांग भी की गई है.
दूसरा पक्ष
भारत में क्रिप्टोकरेंसी और डिजिटल टोकन रखना और उनका कारोबार करना कानूनी तौर पर अनुमति प्राप्त है, लेकिन ये एक अलग तरह के रेगुलेटरी और टैक्स ढांचे के तहत आते हैं. यह बात यूनोकॉइन के को-फाउंडर और सीईओ सत्विक विश्वनाथ ने दिप्रिंट से कही.
“इन एसेट्स को मुद्रा की तरह नहीं देखा जाता, बल्कि आयकर अधिनियम के तहत इन्हें आधिकारिक रूप से वर्चुअल डिजिटल एसेट्स यानी VDA के रूप में वर्गीकृत किया गया है. यह वर्गीकरण इन्हें टैक्स योग्य संपत्ति की श्रेणी में रखता है.”
VDA के ट्रांसफर से होने वाली आय पर निवेशक की आय श्रेणी चाहे जो भी हो, सीधे 30 प्रतिशत टैक्स लगता है. इसके साथ ही ज्यादातर लेनदेन पर 1 प्रतिशत टीडीएस भी लागू होता है.
विश्वनाथ ने कहा कि ये प्रावधान पारदर्शिता सुनिश्चित करने और डिजिटल एसेट से जुड़ी गतिविधियों को दायरे में लाने के लिए किए गए हैं. उन्होंने यह भी जोड़ा कि VDA लेनदेन में हुए नुकसान को दूसरी आय से समायोजित नहीं किया जा सकता, जिससे ट्रेडर्स और निवेशकों के लिए टैक्स प्लानिंग और भी अहम हो जाती है.
यूनोकॉइन के सीईओ ने दिप्रिंट से कहा कि भले ही भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) क्रिप्टोकरेंसी को कानूनी मुद्रा नहीं मानता, लेकिन भारतीय अदालतों ने यह स्वीकार किया है कि क्रिप्टो एसेट्स को संपत्ति के रूप में देखा जा सकता है.
विश्वनाथ ने यह भी कहा कि क्रिप्टो के इस्तेमाल से जुड़ा कानूनी माहौल टैक्स नीतियों और न्यायिक व्याख्याओं के जरिए लगातार बदल रहा है.
दिल्ली के वकील अर्पित गोयल ने दिप्रिंट से कहा कि क्रिप्टोकरेंसी और अन्य वर्चुअल डिजिटल एसेट्स तेजी से अपराध से कमाई गई रकम को ठिकाने लगाने के “क्लासिक और परिष्कृत साधन” बनते जा रहे हैं.
“इसे पहचानते हुए सरकार ने जनवरी 2025 की अधिसूचना के जरिए वर्चुअल डिजिटल एसेट सर्विस प्रोवाइडर्स को PMLA के रिपोर्टिंग फ्रेमवर्क के तहत ला दिया है,” गोयल ने कहा.
“अगर कानून का मकसद अवैध पैसों के प्रवाह और आतंकी फंडिंग पर लगाम लगाना है, तो राजनीतिक खुलासों में डिजिटल एसेट्स को शामिल करना होगा. साथ ही प्रवर्तन एजेंसियों को क्रिप्टो लेनदेन को ट्रैक करने के लिए अपनी संस्थागत क्षमता बढ़ानी चाहिए, न कि सिर्फ नकद और दूसरी संपत्तियों पर जरूरत से ज्यादा ध्यान देना चाहिए, जिनमें मनी लॉन्ड्रिंग का तत्व ही नहीं होता.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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