नयी दिल्ली, पांच फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान बृहस्पतिवार को अदालतों को निर्देश दिया कि वे फौजदारी मामलों में वकील का खर्च वहन नहीं कर पाने वाले आरोपियों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए सुनवाई से पहले कानूनी सहायता की पेशकश करें और उनकी प्रतिक्रिया रिकॉर्ड पर दर्ज करें।
न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने स्वापक औषधि एवं मन:प्रभावी पदार्थ (एनडीपीएस) अधिनियम के तहत दर्ज एक मामले में रेजिनामरी चेल्लामणि की लंबी कैद को ध्यान में रखते हुए निचली अदालतों को अपने आदेश का कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया।
पीठ ने चेल्लामणि को जमानत देते हुए कहा कि उन्होंने प्रारंभिक चरण में गवाहों से जिरह नहीं की थी और यह केवल तभी संभव हुआ जब उन्होंने अपने वकील को नियुक्त किया और गवाहों से दोबारा पूछताछ करने के लिए उनका आवेदन स्वीकार कर लिया गया।
शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि फौजदारी मुकदमे से निपटने वाले निचली अदालतों का यह दायित्व है कि वे ऐसी परिस्थितियों का सामना करते हुए अभियुक्तों को उनके कानूनी प्रतिनिधित्व के अधिकार और वकील का खर्च वहन नहीं कर सकने की स्थिति में विधिक सहायता उपलब्ध कराने के बारे में सूचित करें।
पीठ ने कहा, ‘‘निचली अदालत गवाहों से जिरह शुरू करने से पहले, इस संबंध में आरोपी को दिए गए प्रस्ताव, आरोपी द्वारा उस प्रस्ताव पर दी गई प्रतिक्रिया और उसके बाद की गई कार्रवाई को अपने आदेशों में दर्ज करेंगे। इस प्रक्रिया को पूरी निष्ठा से अपनाया और व्यवहार में लाया जाना आवश्यक है।’’
पीठ ने इसी के साथ कहा, ‘‘अपीलकर्ता द्वारा भुगती जा रही कारावास की अवधि को देखते हुए और चूंकि अपीलकर्ता के साथ उसी उड़ान में यात्रा कर रहे एक समान स्थिति वाले आरोपी को इस अदालत द्वारा जमानत दी जा चुकी है, इसलिए हम इस स्तर पर अपीलकर्ता को भी वही राहत देने के इच्छुक हैं।’
भाषा धीरज सुरेश
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