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Thursday, 5 February, 2026
होममत-विमतबजट 47% बढ़ाने से सहकारी संस्थाओं की हालत नहीं सुधरेगी, इसके लिए भीतर से बदलाव करना होगा

बजट 47% बढ़ाने से सहकारी संस्थाओं की हालत नहीं सुधरेगी, इसके लिए भीतर से बदलाव करना होगा

बढ़ा हुआ बजट मदद करता है, लेकिन टैगलाइन 'सहकार से समृद्धि' को हकीकत बनाने से पहले अंदरूनी जायजा लेना और शुरुआती कदम उठाना ज़रूरी है.

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जबकि ताकतवर गृह मंत्री अमित शाह सहकारिता मंत्री भी हैं, तब इस सेक्टर के लिए बजटीय आवंटन में 47 फीसदी की वृद्धि कोई अचरज की बात नहीं है. पिछले वित्त वर्ष के बजट में सहकारिता सेक्टर को 1,187 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, जिसे अब वित्त वर्ष 2026-27 के लिए बढ़ाकर 1.745 करोड़ रु. कर दिया गया है. लेकिन क्या यह भारत के सहकारिता मॉडल को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त है?

केंद्रीय बजट 2026-27 में, गुजरात के आणंद में त्रिभुवन सहकारिता विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए 300 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. इसके अलावा, चीनी मिलों समेत सहकारिता सेक्टर को मजबूती देने के लिए राष्ट्रीय सहकारिता विकास निगम (एनसीडीसी) को 500 करोड़ रुपये, इस सेक्टर से निर्यातों को बढ़ावा देने के लिए 450 करोड़ रुपये का भी प्रावधान किया गया है. इससे ‘नाफेड’ जैसे सहकारी संगठनों को लाभ होगा, जो मिलेट से बनने वाले नये ‘रेडी टु ईट’ खाद्य पदार्थों के बूते विश्व बाजार में अपनी छाप बनाना चाहते हैं.

364 करोड़ रुपये का एक और महत्वपूर्ण आवंटन किया गया है देश भर में कार्यरत 67,930 प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पीएसीएस) के कंप्यूटराइजेशन के लिए. वैसे, पंजीकृत पीएसीएस की संख्या 1.01 लाख है. इसका मतलब यह हुआ कि बाकी 28,000 समितियां निष्क्रिय हैं या काम के लायक नहीं हैं.

लेकिन यहां एक बड़ा सवाल उभरता है. पीएसीएस की स्थापना कम महंगे ऋण उपलब्ध कराने के मकसद से की गई होगी लेकिन यह बीते युग की बात थी जब अनुसूचित व्यावसायिक बैंकों (एससीबी) का नेटवर्क शहरों में ही सीमित था, और प्राथमिकता के आधार पर सेक्टर को ऋण देने का विचार उस समय नहीं उभरा था. अब जबकि हर राज्य, जिला, और ब्लॉक में ग्रामीण ऋण के आगमन की निगरानी की व्यवस्था मौजूद है, खासकर कृषि के मामले में, तब कृषि ऋण न तो सहकारिता सेक्टर का एकमात्र अधिकार रह गया और न एकमात्र आकर्षण.

यह हमें और ज्यादा प्रमुख सवाल के सामने ला खड़ा करता है, कि क्या पीएसीएस एससीबी का मुक़ाबला कर सकती हैं, जो किसान क्रेडिट कार्ड के जरिए न केवल फसल पर कर्ज देते हैं बल्कि किसानों को ट्रैक्टर से लेकर गृह और शिक्षा तक के लिए ऋण दे रहे हैं?

कृषि ऋण पर पुनर्विचार

कृषि ऋण देने के मामले में सहकारिता सेक्टर की भागीदारी में जो गिरावट आई है वह काफी उल्लेखनीय है.

रिसर्चर अशोक गुलाटी और ऋतिका जुनेजा ने 2019 के अपने रिसर्च पेपर ‘एग्रीकल्चरल क्रेडिट सिस्टम इन इंडिया: इवोल्यूशन, इफेक्टिवनेस ऐंड इनोवेशन्स’ में बताया है कि वित्त वर्ष 2016-17 में व्यावसायिक बैंक ही किसानों के लिए औपचारिक वित्त के स्रोत रहे. 2017 में, किसानों के कर्ज में इन बैंकों की 75 फीसदी भागीदारी थी. इनके बाद 13 फीसदी की भागीदारी के साथ सहकारिता सेक्टर का और 12 फीसदी की भागीदारी के साथ क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबी) का नंबर था.

जो प्रवृत्ति उभर रही है वह सहकारिता सेक्टर के लिए ज्यादा परेशानी का सबब है. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की ‘रिपोर्ट ऑन ट्रेंड ऑन ट्रेंड ऐंड प्रोग्रेस ऑफ बैंकिंग इन इंडिया 2024-25’ में ‘नाबार्ड’ के आंकड़ों के हवाले से कहा गया है कि आरआरबी की भागीदारी तो 12 से घटकर 11 फीसदी हुई लेकिन सहकारिता सेक्टर की भागीदारी 13 फीसदी से घटकर इकाई अंक 9 पर पहुंच गई. आरबीआई की रिपोर्ट कहती है: ‘टेक्नोलॉजी, शाखाओं के विस्तार, और बिजनेस कॉरेस्पोंडेंट्स की वजह से व्यावसायिक बैंकों की पहुंच बढ़ी है, इस कारण बीते वर्षों में कुल कृषि ऋण में ग्रामीण ऋण सहकारिता (आरसीसी) की भागीदारी घटी है’.

बैंक कृषि के लिए ऋण उपलब्ध कराने का काम बेहतर ढंग से कर सकते हैं, यह कहने के बाद सहकारिता समितियों को क्या करना चाहिए? कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जिनके मामले में बैंक वैसी बढ़त नहीं रखते. ये क्षेत्र भी खेती, बागवानी, और दूध की उत्पादकता बढ़ाने के लिए उतने ही अहम हैं: कृषि उपकरण केंद्र (कस्टम हाइरिंग सेंटर), मिट्टी एवं बीज परीक्षण लैब्स, खाद की दुकान, एकत्रीकरण और जांच के प्राथमिक केंद्र, वजन करने और चारा और मवेशी के खाद्य की व्यवस्था के लिए.

इसलिए मुद्दा यह है कि अगर पीएसीएस को प्रतियोगिता में टिके रहना है तो एकमात्र उपाय यह है कि वे ऋण और सेवाएं उपलब्ध कराएं.

आंकड़ों में पैठिए, एक ही सूत्र सबके लिए कारगर नहीं

मंत्रालय को सहकारिता समितियों के राज्यवार आंकड़े पर ध्यान देना चाहिए. अमित शाह ने सदन में कहा कि राष्ट्रीय सहकारिता डाटाबेस (एनसीडी) पोर्टल के अनुसार 15 नवंबर 2025 को सक्रिय सहकारी समितियों की संख्या 6.56 लाख और निष्क्रिय समितियों की संख्या 1.39 लाख थी, जबकि 48,537 समितियों के विघटन की प्रक्रिया चल रही थी.

सक्रिय सहकारी समितियों के मामले में महाराष्ट्र और गुजरात सबसे आगे थे जिनमें इनकी संख्या क्रमशः 2.17 लाख और 78,215 थी. इनके अलावा प्रमुख राज्य थे तेलंगाना (48,186 समितियां) और कर्नाटक (40,231 समितियां).

दूसरे शब्दों में, इन चार राज्यों में ही 60 फीसदी सक्रिय और काम के लायक समितियां थीं. इस मामले में भारत के सबसे बड़ी आबादी वाले उत्तर प्रदेश की हालत खतरनाक थी. इसकी कृषि जीडीपी करीब 27 फीसदी (कृषि में राष्ट्रीय योगदान के हिस्से से 10 प्रतिशत-अंक से ज्यादा) थी लेकिन वहां 40,665 पंजीकृत समितियों में केवल 22,731 ही सक्रिय थीं.

जमीन से जुड़े सीमांत किसान और सहकारिता

‘फोरम ऑफ एंटरप्राइजेज़ फॉर इक्वीटेबल डेवलपमेंट’ (एफईईडी) ने सीमांत किसानों की स्थिति पर किसान दिवस (23 दिसंबर) को अपनी वार्षिक रिपोर्ट जारी की. इसमें भूगोल, फसलों, सहकारिता की परंपरा आदि के मामलों में एक-दूसरे से अलग छह राजों—आंध्र प्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, त्रिपुरा, और उत्तराखंड—में पीएसीएस और उनकी सेवाओं के बारे में सीमांत किसानों के अनुभवों पर नजर डाली गई है.

हर एक राज्य ने सकारात्मक और उतने-सकारात्मक-नहीं प्रतिमान पेश किए लेकिन दो निष्कर्ष ऐसे मिले जो बिलकुल अलग थे. पहला यह कि तालमेल में बड़ी खाई है. सहकारिता का जल तो सर्वव्यापी है लेकिन फील्ड सर्वे से जाहिर हुआ कि सर्वे में शामिल एक चौथाई से कम सीमांत किसान ही कृषि सहकारी समितियों में सक्रिय हैं.

लेकिन रिपोर्ट में इस सकारात्मक पहलू का भी जिक्र है कि सहकारिता समितियों से जुड़ने वाले 45 फीसदी सीमांत किसानों ने बताया कि उनकी घरेलू आय में वृद्धि हुई, 42 फीसदी ने बताया कि फसलों की पैदावार में वृद्धि हुई.

‘सहकार से समृद्धि’ के पांच कदम

कुछ नए रूप वाले सहकारिता मंत्रालय के लिए पांच और सुझाव:

पहला यह कि सहकारिता समितियों को शुरू में अपने नियंत्रण में रखना, नीतिगत और वित्तीय सहयोग देना तो ठीक है लेकिन मैं इस बात ज़ोर दूंगा: उन पर निगरानी रखने की नहीं, उनका निर्देशन करने की जरूरत है.

सदस्यता का मामला हो या नेतृत्व का, मनमाना लक्ष्य तय करने से ‘सहकारिता की भावना’ खत्म होगी और सहकारी समिति सरकार की एक एजेंसी बन जाएगी. वैसे तो इस रूप में भी वह उपयोगी, और कभीकभार महत्वपूर्ण सेवा भी उपलब्ध कराएगी, खासकर अगर वह सेवा दूसरे माध्यम से उपलब्ध न हो. लेकिन इससे स्वयंसेवा और साझी सहायता का मकसद पूरा नहीं होगा, जो कि सहकारिता का मूल सिद्धांत है. यह सिद्धांत ‘इंटरनेशनल को-ऑपरेटिव अलायंस’ (आईसीए) ने तय किया है, जिसका सदस्य भारत में सहकारिता की शीर्ष संस्था ‘नेशनल को-ऑपरेटिव यूनियन ऑफ इंडिया’ (एनसीयूआई) भी है.

दूसरा सुझाव सहकारिता समितियों की चुनाव प्रक्रिया से संबंधित है. मतदान का अधिकार उन्हें ही दिया जाए जो लेन-देन की शर्त को पूरा करते हैं. दूसरे शब्दों में, किसी दुग्ध उत्पादन सहकारिता समिति में मतदान का अधिकार केवल उसे हो नियमित रूप से दूध का न्यूनतम हिस्सा देते हों, न कि उनको जिनका उसमें शेयर तो है लेकिन वे समिति में सक्रिय नहीं हैं. इसका मकसद सहकारिता को ‘यूजर’ आधारित बनाना है. आदर्श स्थिति तो यह होगी कि लेन-देन के प्रतिशत के आधार पर मतदान का अधिकार तय हो, हालांकि फिलहाल यह सुझाव कुछ ज्यादा ही क्रांतिकारी लग सकता है.

तीसरे सुझाव का संबंध इस स्पष्ट सोच से है कि सहकारिता समिति कोई पंचायत नहीं है, और इसमें केवल उन्हें ही शामिल होने को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए जो संबंधित जींस या सेवा में भागीदारी करते हों.

चौथा सुझाव यह है कि सहकारिता की सफलता मापने का पैमाना यह न हो कि कितनी समितियां पंजीकृत हुईं या उनमें कितने ज्यादा सदस्य बने, बल्कि पैमाना यह हो कि कितना व्यवसाय किया गया और इसमें शरीक भागीदारों की ज़िंदगी, आजीविका और आमदनी में कितनी बेहतरी हुई.

अंतिम मगर महत्वपूर्ण सुझाव यह है कि समिति के विघटन की प्रक्रिया सरल और सुगम बनाई जाए. वास्तव में हम मानित (डीम्ड) विघटन के विचार को अपना सकते हैं. अगर लगातार दो साल तक चुनाव नहीं करवाया गया है, ऑडिट रिपोर्ट नहीं दर्ज की गई है तब ऐसी समिति का पंजीकरण रद्द माना जा सकता है.

अगर हम चाहते हैं कि सहकारिता समितियां सहकारिता मंत्रालय के लक्ष्यों को पूरा करे, तो आंतरिक लेखा-जोखा वक्त की मांग है. इसके बजट में वृद्धि से मदद मिलेगी, लेकिन ‘सहकारिता से समृद्धि’ के नारे को साकार करना है तो ऊपर बताए गए शुरुआती उपायों पर अमल करना जरूरी होगा.

संजीव चोपड़ा एक पूर्व आईएएस अधिकारी हैं और वैली ऑफ वर्ड्स साहित्य महोत्सव के निदेशक हैं. हाल तक वे LBSNAA के निदेशक रहे हैं और लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल (LBS म्यूज़ियम) के ट्रस्टी भी हैं. वे सेंटर फॉर कंटेम्पररी स्टडीज़, PMML के सीनियर फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @ChopraSanjeev है. यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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