नई दिल्ली: चार साल की लगातार तैयारी, दो बार असफल होने और एक इंटरव्यू के बाद, आखिरकार ‘एस’ भारत की सबसे अहम क्लास के दरवाजे तक पहुंचीं. मसूरी की पहाड़ियों में स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, यानी LBSNAA, जहां से हर सफल यूपीएससी उम्मीदवार अपनी ट्रेनिंग शुरू करता है. जो लोग सालों तक तैयारी करते हैं, उनके लिए LBSNAA में पहुंचना एक सपना होता है. एस के लिए यह सपना 2023 में पूरा हुआ.
उन्होंने बताया कि ट्रेनिंग का पहला चरण बहुत अच्छा और उत्साह से भरा था. गलियारों में बातें होती रहती थीं, हॉस्टल के कमरों में हंसी सुनाई देती थी और बहसें देर रात तक चलती थीं. दिन भर लेक्चर, फील्ड विजिट और ऐसी गतिविधियां होती थीं, जो नए अधिकारियों को जिलों में काम करने के लिए तैयार करने के लिए बनाई गई थीं. लेकिन जब ट्रेनी जिला प्रशिक्षण से लौटे, तो माहौल बदल गया था.
‘एस’ ने दिप्रिंट से कहा, “‘नो-डिवाइस’ जोन बना दिए गए थे. फोटो लेने से मना किया जाने लगा था. मेमो, चेतावनियां और सजा, रोज की बात हो गई थी. नोटिसों की संख्या देखकर ही समझ आ जाता था कि कुछ बदल गया है.” उन्होंने कहा, “यह अधिकारियों की ट्रेनिंग अकादमी से ज्यादा एक बोर्डिंग स्कूल जैसा लगने लगा था.”
वह अब उप-विभागीय मजिस्ट्रेट के पद पर तैनात हैं.
पूर्व ट्रेनी अधिकारियों का कहना है कि एलबीएसएनएए में अनुशासन और नियम हमेशा से रहे हैं. लेकिन उनका कहना है कि हाल के सालों में परिसर का माहौल बदल गया है. उनके मुताबिक, सामान्य नियम अब ज्यादा सख्त नियंत्रण में बदल गए हैं. जैसे सजा के तौर पर अंक काटना, हॉस्टल कमरों की बार-बार जांच, और ट्रेनीज़, शिक्षकों और स्टाफ के बीच बढ़ती दूरी.
नाम न छापने की शर्त पर एक पूर्व एलबीएसएनएए निदेशक ने कहा, “अगर ट्रेनिंग मुख्य रूप से सजा के डर से कराई जाती है, तो इससे ऐसे अधिकारी बनने का खतरा होता है जो सिर्फ आदेश मानने में अच्छे हों, लेकिन मुश्किल और असली हालात में जिम्मेदारी लेने से हिचकें.”
LBSNAA ट्रेनिंग में निदेशक की भूमिका
अकादमी में निदेशक और कोर्स कोऑर्डिनेटर जीवन के लगभग हर पहलू को तय करते हैं. पाठ्यक्रम से लेकर अतिथि वक्ताओं, फील्ड विजिट और संस्थान की संस्कृति तक, सब कुछ उनके नेतृत्व पर निर्भर करता है. कई पूर्व अधिकारी कहते हैं कि नेतृत्व ही तय करता है कि ट्रेनीज़ के साथ कैसा व्यवहार होगा और वे कैसे प्रतिक्रिया देंगे. वहीं हाल के बैचों के सदस्य बताते हैं कि LBSNAA में उनका अनुभव वरिष्ठों के बताए गए “सुनहरे दौर” से बिल्कुल अलग रहा.
कई लोग ट्रेनिंग को अपनाने के बजाय बस इसके खत्म होने का इंतजार करते रहे.
ऊपर जिक्र किए गए पूर्व निदेशक ने कहा, “यह सब निदेशक पर निर्भर करता है. हमें याद रखना चाहिए कि हम अधिकारियों को ट्रेनिंग दे रहे हैं. हमें उन्हें डर के जरिए नहीं सिखाना चाहिए. अधिकारियों को नियम इसलिए मानने चाहिए क्योंकि वे सही हैं, न कि इसलिए कि उन्हें सजा मिलेगी. पूरा मकसद उन्हें अच्छे अधिकारी बनाना है. ज्यादा सख्ती से आपको सिर्फ विरोध करने वाले लोग ही मिलेंगे.”
2024 में, LBSNAA ने अधिकारी ट्रेनीज़ के लिए सोशल मीडिया को लेकर विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए. इसमें एक्स, यूट्यूब, स्नैपचैट, लिंक्डइन और मेटा जैसे प्लेटफॉर्म पर गतिविधियों को सीमित किया गया. नोटिस जारी किए गए और निर्देश परिसर के नोटिस बोर्ड पर लगाए गए. यह कदम अकादमी के अंदर से बनाए जा रहे ऑनलाइन कंटेंट को लेकर बढ़ती चिंताओं के बाद उठाया गया.
हाल के वर्षों में अकादमी में नेतृत्व में भी बार-बार बदलाव हुए हैं. श्रीनिवास आर. काटिकिथाला सितंबर 2021 से सितंबर 2023 तक निदेशक रहे, इसके बाद आईएएस अधिकारी श्रीराम तरणिकांति ने पद संभाला. मौजूदा कार्यकाल में पास आउट हुए ट्रेनी अपने समय को “बेहद खराब” बताते हैं, जहां नियम ज्यादा सख्त थे और नियंत्रण भी ज्यादा था.
एक अन्य पूर्व निदेशक ने कहा, “यह सब निदेशक पर निर्भर करता है. अतिथि व्याख्यान उनके संपर्कों से आते हैं. अधिकारियों के साथ अधिकारियों जैसा ही व्यवहार होना चाहिए, तभी वे भी अधिकारियों की तरह प्रतिक्रिया देंगे. अगर आप उन्हें छात्रों की तरह रखेंगे, तो वे भी छात्रों की तरह ही व्यवहार करेंगे.”
1992 बैच के त्रिपुरा कैडर के आईएएस अधिकारी तरणिकांति ने अपने करियर का बड़ा हिस्सा जिला प्रशासन और नियामक संस्थानों में बिताया है. उनके पहले के पद ज्यादातर सेवारत अधिकारियों को ट्रेनिंग देने और अलग-अलग क्षेत्रों की व्यवस्थाओं की निगरानी से जुड़े रहे. लेकिन LBSNAA एक अलग तरह की जिम्मेदारी है. यह एक आवासीय, बुनियादी प्रशिक्षण का माहौल है, जहां अधिकारियों को उनके करियर की शुरुआत में ही आकार दिया जाता है. वह जुलाई 2026 में सेवानिवृत्त होने वाले हैं.
त्रिपुरा कैडर में उनके साथ काम कर चुके कुछ अधिकारी उन्हें साथ काम करने में मुश्किल और ज्यादा मिलनसार न होने वाला बताते हैं.
नाम न छापने की शर्त पर त्रिपुरा के एक आईएएस अधिकारी ने कहा, “वह एक अच्छे अधिकारी थे, लेकिन यहां कैडर में कई लोगों के साथ उनका तालमेल नहीं बन पाया.”
त्रिपुरा के पत्रकार और वरिष्ठ संपादक उन्हें सक्षम लेकिन ज्यादातर पहुंच से बाहर रहने वाला व्यक्ति बताते हैं, जो कम ही सामने आते थे. उन्होंने यह भी कहा कि उनका व्यवहार थोड़ा दूरी बनाए रखने वाला था.
मेमो और गलतियां
LBSNAA में समय पर पहुंचने, ड्रेस कोड और मोबाइल फोन के इस्तेमाल से जुड़े नियम दशकों से मौजूद हैं. पहले, ट्रेनीज़ का कहना है, गलतियों पर आमतौर पर मौखिक चेतावनी दी जाती थी. आज, उनका कहना है, गलती की बहुत कम गुंजाइश बची है.
उत्तर प्रदेश कैडर के 2024 बैच के एक आईएएस ट्रेनी ने कहा, “एक क्लास में किसी ने जम्हाई ली और शिक्षक ने उसे जाकर तैरने के लिए कह दिया. यह एक सामान्य गलती थी. हमारा शेड्यूल बहुत कड़ा होता है और हमें जम्हाई लेने की इजाजत होनी चाहिए. इससे बेहतर तो जेल है.”
पूर्व ट्रेनी का कहना है कि कुछ दिनों में 40 से ज्यादा मेमो जारी किए गए. “उल्लंघन” में एक मिनट देर से पहुंचना, गलियारों में बात करना, टाई सही तरीके से न पहनना, क्लास में सो जाना या बीच में बोल देना जैसी बातें शामिल थीं. कुछ मामलों में, उनका कहना है, ट्रेनी को यह भी नहीं पता चलता था कि उन्होंने गलती क्या की है.
लेकिन एक पूर्व ट्रेनी का कहना है कि LBSNAA में ट्रेनिंग की शुरुआत से ही मेमो दिए जाते रहे हैं. समस्या यह है कि पहले इसका मकसद “सिखाना था, परेशान करना नहीं.”
एक पूर्व ट्रेनी ने कहा, “मेमो हमेशा से ट्रेनिंग का हिस्सा रहे हैं, लेकिन पहले वे सिखाने के लिए होते थे, न कि परेशान करने के लिए. अब यह मजाक बन गया है. मेमो ऐसे बांटे जाते हैं जैसे टॉफी. हर छोटी बात पर मेमो मिलता है. उसके बाद आपको अनुशासन समिति का सामना करना पड़ता है, फिर अंक काटे जाते हैं, फिर रोजाना का आकलन और परीक्षा होती है.”
सजा के तौर पर उन्हें नियमित सुबह 6:45 बजे की फिजिकल ट्रेनिंग से 45 मिनट पहले रिपोर्ट करने को कहा जाता है.
लगभग एक दशक पहले ट्रेनिंग लेने वाले अधिकारियों का कहना है कि अब जिस सख्ती से मेमो दिए जाते हैं, वह पहले नहीं थी.
ओडिशा में तैनात 2016 बैच के एक आईएएस अधिकारी ने कहा, “मुझे भी मेमो और सजा मिली थी, लेकिन वह उतनी कठोर नहीं थी, जितनी मौजूदा बैच देख रहे हैं. हमारे समय में सजा का मतलब लाइब्रेरी भेजा जाना होता था. अब अंक काटे जा रहे हैं. यह बहुत ज्यादा है.”
क्लासरूम के कंटेंट को लेकर भी चिंताएं हैं. पेशेवर आचरण पर एक लेक्चर के दौरान, एक फैकल्टी सदस्य ने कथित तौर पर महिलाओं अधिकारियों की तस्वीरें दिखाकर बताया कि फील्ड में कैसे कपड़े नहीं पहनने चाहिए.
2023 बैच के एक अधिकारी ने कहा, “उन्होंने जिम जाते समय टाइट कपड़े पहने महिलाओं की तस्वीरें दिखाईं और कहा, ‘देखिए, कांस्टेबल उन्हें कैसे देख रहा है, इसलिए हमें कपड़ों को लेकर सावधान रहना चाहिए.’ मैंने आपत्ति जताई, लेकिन कुछ नहीं बदला. अगर अकादमी में महिलाओं के बारे में ऐसा सोचा जाता है, तो हमसे आप किस तरह का बदलाव लाने की उम्मीद कर रहे हैं.”
हालांकि, सभी लोग सख्त अनुशासन के खिलाफ नहीं हैं.
पूर्व आईएएस अधिकारी शैलजा चंद्रा ने कहा, “जिसे ‘सख्ती’ कहा जा रहा है, वह कई मायनों में पुराने नियमों की वापसी है, जो कुछ समय के लिए ढीले पड़ गए थे. ट्रेनिंग न तो ज्यादा ढील पर बन सकती है और न ही बहुत ज्यादा नियंत्रण पर. इसके लिए संतुलित आजादी, करीब से मार्गदर्शन, और ऐसी अकादमी चाहिए जो हर ट्रेनी को इतना अच्छे से जाने कि जरूरत पड़ने पर उसे दिशा दे सके, चेतावनी दे सके और सुधार कर सके.”
ट्रेनिंग की नई दिशा
कई अधिकारी LBSNAA में हालिया बदलाव की वजह पूजा खेड़कर मामले को मानते हैं, जिसने पूरे UPSC सिस्टम को हिला दिया. किसी ने नहीं सोचा था कि कोई सेवा में आकर सभी को धोखा दे सकता है. इसका एक असर अकादमी के भीतर सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर सख्ती के रूप में दिखा.
2024 बैच के एक आईएएस अधिकारी ने कहा, “यह सही कदम था. कुछ ट्रेनी हद पार कर रहे थे. उन्होंने व्लॉग तक बनाना शुरू कर दिया था. नोटिस बांटे गए, दिशानिर्देश बनाए गए और अब लोग कैंपस से तस्वीरें नहीं खींचते और न ही सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं.”
पाबंदियां सिर्फ ट्रेनीज़ तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उनके परिवारों पर भी लागू कर दी गईं. पहले परिवार के आने पर नियम थोड़े ढीले थे, लेकिन अब इसके लिए कई स्तर की अनुमति लेनी पड़ती है और सख्त नो-फोटोग्राफी नियम लागू है.
पिछले साल LBSNAA में ट्रेनिंग लेने वाले एक अधिकारी ने कहा, “जब अनुशासन तर्क से अलग हो जाता है, तो यह निजी फैसले पर आधारित हो जाता है, जिसे बाकी लोगों से बिना सवाल किए मानने की उम्मीद की जाती है. जब संस्थान मनमाने नियम लागू करते हैं, तो अनुशासन एक सिद्धांत नहीं रह जाता, बल्कि नियंत्रण का साधन बन जाता है. नियम तोड़ने पर सजा तय प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए, न कि गुस्से, आवेग या अहंकार के आधार पर.”
फोन के इस्तेमाल पर भी रोक बढ़ा दी गई है. गलियारों, मेस और कैंपस के बड़े हिस्से में मोबाइल पर पाबंदी है. एक ट्रेनी अधिकारी ने कहा कि फोन सिर्फ हॉस्टल के कमरे में ही इस्तेमाल करने की अनुमति है, जहां कभी भी जांच हो सकती है.
पश्चिम बंगाल कैडर के 2016 बैच के एक अधिकारी ने कहा, “पहले ऐसी छापेमारी कभी नहीं होती थी. हमारे समय में भी सख्ती थी, लेकिन यह एक अलग ही स्तर है.”
पूर्व निदेशकों का कहना है कि ऐसी पाबंदियों के चलते अकादमी अपने ही ट्रेनीज़ से दूरी बना सकती है.
एक अन्य पूर्व निदेशक ने कहा, “कोई भी ट्रेनी खराब नहीं होता, खराब ट्रेनर होते हैं. अनुशासन सिखाने का एक और तरीका भी होता है. मैं लोगों के साथ चाय पर बैठकर बात करता था, नई पीढ़ी को समझता था और उसी हिसाब से कोर्स बनाता था.”
सालों तक, डायरेक्टर का पद अक्सर ऐसे अधिकारियों के पास होता था जिन्हें ट्रेनिंग संस्थानों या डिपार्टमेंट ऑफ़ पर्सनल एंड ट्रेनिंग (DoPT) में अनुभव होता था. उपमा चौधरी (IAS, हिमाचल प्रदेश कैडर) और संजीव चोपड़ा (IAS, पश्चिम बंगाल कैडर) सहित कई पूर्व डायरेक्टर LBSNAA में बड़ा प्रशासनिक और ट्रेनिंग का अनुभव लेकर आए थे. हालांकि, आलोचकों का कहना है कि तरणिकांति के तहत, अकादमी को कोई ऐसा व्यक्ति चला रहा है जो पहली बार किसी ट्रेनिंग संस्थान में आया है.
एक पूर्व निदेशक ने कहा, “आपने ऐसे व्यक्ति को जिम्मेदारी दे दी है, जिसे ट्रेनिंग संस्थान का अनुभव नहीं है, और यही मुश्किल पैदा करता है. एक ट्रेनिंग अकादमी को चलाने के लिए अलग तरह की क्षमता चाहिए. अनुभव मायने रखता है.”
कुछ अधिकारी अकादमी में बढ़ते एलीटिज्म की ओर भी इशारा करते हैं.
एक अधिकारी ने कहा, “फैकल्टी सदस्य अक्सर ट्रेनीज़ से कहते हैं कि वे समाज की ‘क्रीम’ हैं. सरकार का एक मुख्य उद्देश्य नौकरशाही और समाज से औपनिवेशिक एलीटिज्म को खत्म करना है. अब यह सोचने का समय है कि इन फाउंडेशन कोर्सों में इस एलीटिज्म को कम किया जा रहा है या बढ़ावा दिया जा रहा है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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