सोमवार को नरेंद्र मोदी सरकार की घबराहट साफ दिखी, जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह समेत वरिष्ठ बीजेपी मंत्रियों ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा के अंश पढ़ने से रोक दिया. इसके बाद स्पीकर को संसद की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी और बहस नहीं हो सकी.
तो आखिर मोदी सरकार इतनी असहज क्यों हो गई.
सीधे शब्दों में, जनरल नरवणे की आत्मकथा —फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी— यह खुलासा करती है कि साल 2020 में, पूर्वी लद्दाख में पैंगोंग झील के दक्षिण, कैलाश रेंज में जब चीनी टैंक भारतीय ठिकानों की ओर बढ़ रहे थे, तब राजनीतिक नेतृत्व ने उन्हें दो घंटे से ज्यादा समय तक बिना किसी फैसले के छोड़ दिया. इस दौरान नॉर्दर्न आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल वाईके जोशी बार-बार चीनी सेना पर तोपखाने से फायर करने की अनुमति मांग रहे थे.
समस्या यह थी कि नरवणे को आदेश मिला हुआ था कि “जब तक बिल्कुल ऊपर से मंजूरी न आए, तब तक फायर नहीं करना है.” उन्हें न तो कोई रूल्स ऑफ एंगेजमेंट दिए गए थे और न ही यह बताया गया था कि किन हालात में आगे बढ़ते दुश्मन पर गोली चलाई जा सकती है. बस इतना तय था कि “आखिरी विकल्प के तौर पर, अगर हमारी खुद की शारीरिक सुरक्षा खतरे में हो, तो वही दस्ता और सिर्फ वही दस्ता आत्मरक्षा में फायर कर सकता है.”
और आखिरी समय में राजनाथ सिंह ने जनरल नरवणे से क्या कहा. कि प्रधानमंत्री ने कहा है, “जो उचित समझो, वह करो.” यानी चीन के साथ युद्ध होगा या नहीं, यह अहम फैसला सीधे सेना प्रमुख पर छोड़ दिया गया. जैसा कि नरवणे ने लिखा, “मेरे हाथ में एक गरम आलू थमा दिया गया था. इस पूरी छूट के साथ अब सारी जिम्मेदारी पूरी तरह मेरे ऊपर थी.”
यह प्रधानमंत्री की तरफ से जिम्मेदारी से एक अभूतपूर्व पीछे हटना था. चाहे 1971 का बांग्लादेश युद्ध हो या 1999 का कारगिल युद्ध, पहले के प्रधानमंत्री ऐसे फैसलों में पूरी तरह नेतृत्व करते थे, जहां सैकड़ों या हजारों सैनिकों की जान दांव पर होती थी. यहां एक असमंजस में पड़े प्रधानमंत्री ने यह बोझ एक घिरे हुए सेना प्रमुख पर डाल दिया.
किस्मत से, जनरल नरवणे ने फायर करने की अनुमति नहीं दी. इसके बजाय उन्होंने जनरल जोशी को आदेश दिया कि हल्के चीनी टैंकों को पीछे से घेरने के लिए भारी भारतीय टैंकों को रेचिन ला पास पर मजबूत स्थिति में तैनात किया जाए. आखिरकार चीनी सेना पीछे हट गई और उस इलाके से निकल गई.
तो इस देश के लिए इस सेवा के बदले मोदी सरकार ने जनरल नरवणे को क्या इनाम दिया. उनकी किताब को करीब दो साल तक मंजूरी नहीं दी गई. इसी दौरान पत्रकारों द्वारा लिखी गई कई दूसरी किताबों को अलग-अलग सैन्य अभियानों पर मंजूरी मिल गई, जिनमें सिंदूर ऑपरेशन भी शामिल है, और उनमें कई रणनीतिक जानकारियां सामने आ गईं. इतना ही नहीं, रेचिन ला और पास के काला टॉप में हुई कार्रवाइयों का ब्यौरा अगले ही दिन मीडिया में आ गया था. लेकिन जो बातें प्रधानमंत्री की सच्चाई उजागर करती हैं, वही ऑपरेशनल डिटेल्स आज भी वर्जित लगती हैं.
1962 के बाद सबसे बड़ा क्षेत्रीय नुकसान
जाहिर है, मीडिया के कुछ करीबी हिस्से तुरंत प्रधानमंत्री के बचाव में उतर आए. उनका कहना है कि यह कहानी तो दिखाती है कि प्रधानमंत्री ने मौके पर मौजूद अधिकारी को फैसला लेने की आजादी दी. अगर वाकई ऐसा है, तो फिर इस किताब को लगभग दो साल तक छपने से क्यों रोका गया और राहुल गांधी को इसका छोटा सा अंश पढ़ने से क्यों रोका गया.
एक और तर्क दिया जा रहा है कि चीन दशकों से “सलामी स्लाइसिंग” करता रहा है और मोदी सरकार पहली सरकार है जिसने इसका डटकर मुकाबला किया. यह सच्चाई से बहुत दूर है. यह अच्छी तरह जाना जाता है कि चीनी घुसपैठ का जवाब भारत आमतौर पर “क्विड प्रो क्वो” के तौर पर जवाबी घुसपैठ करके देता रहा है, ताकि चीन को पीछे हटने पर मजबूर किया जा सके. 1967 में (नाथू ला और चो ला), 1986-87 में (सुमदोरोंग चू), और 2013 में, भारतीय सरकार ने सेना को या तो जवाबी हमला करने, हालात बिगाड़ने, या 2013 में चुमार में जमीन कब्जाने की अनुमति दी थी, ताकि चीन की डेपसांग घुसपैठ का जवाब दिया जा सके. हर बार हालात पहले जैसे कर दिए गए.
और मोदी का रिकॉर्ड क्या है. 2017 में डोकलाम में उन्होंने सीधे हस्तक्षेप किया और भूटान के ट्राइजंक्शन इलाके में चीनी घुसपैठ रोकी. लेकिन वे बिना ठोस गारंटी के पीछे हट गए और उसके बाद चीन ने डोकलाम पठार पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली — जो उस वक्त मीडिया आपको नहीं बता रहा था.
प्रधानमंत्री मोदी का वह बदनाम बयान कौन भूल सकता है, जब उन्होंने कहा था, “ना कोई हमारी सीमा में घुसा है, ना ही कोई घुसा हुआ है.” यह बयान गलवान में 20 भारतीय सैनिकों की शहादत के सिर्फ चार दिन बाद आया था, जब कई सैनिकों को चीनी हिरासत में पकड़कर पीटा गया और बाद में छोड़ा गया. इसके बाद अगस्त 2020 में भारतीय सेना को आखिरकार क्विड प्रो क्वो कार्रवाई की अनुमति दी गई, जिससे वही टकराव हुआ, जिसका जिक्र जनरल नरवणे ने किया है. लेकिन हैरानी की बात यह है कि वे बढ़त भी सिर्फ छह महीने बाद, फरवरी 2021 में, आंशिक पैंगोंग त्सो डिसएंगेजमेंट के तहत छोड़ दी गई.
अक्टूबर 2024 के समझौते तक डेमचोक और डेपसांग में चीनी सैनिक भारतीय इलाके पर काबिज रहे. और आज भी गलवान, हॉट स्प्रिंग्स और पैंगोंग त्सो में बने “बफर जोन” ज्यादातर भारतीय दावे वाली रेखा के भीतर हैं, जिससे हमारी सेना उन जगहों तक नहीं जा पा रही है, जहां पहले बिना रोकटोक पहुंच थी. यह सशस्त्र बलों द्वारा मांगे गए स्टेटस क्वो के बिल्कुल करीब भी नहीं है. यह 1962 के बाद भारत को हुआ सबसे बड़ा क्षेत्रीय नुकसान है.
आखिरी बात साफ है. जनरल नरवणे की आत्मकथा बताती है कि चीन से मुकाबले के मामले में मोदी ऐसे रहे हैं, जैसे सामने आती गाड़ी की हेडलाइट में फंसा हिरन. ये खुलासे उनकी मजबूत नेता वाली छवि को बेनकाब करते हैं, जो दरअसल एक पैसे देकर बनाई गई पीआर छवि है. देश के अहम मौकों पर उन्होंने हमारी उत्तरी सीमा की सुरक्षा से ज्यादा अपनी चुनावी छवि को प्राथमिकता दी.
और अगर चुनाव जीतने के लिए उस किताब को रोकना पड़े, जो उस व्यक्ति ने लिखी है जिसने रेचिन ला में देश को बचाया, तो वैसा ही सही.
अमिताभ दुबे कांग्रेस के सदस्य हैं. वह @dubeyamitabh पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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