चंडीगढ़: पंजाब सरकार द्वारा जनविरोध के बाद विवादित लैंड-पूलिंग योजना वापस लेने के कुछ ही महीनों के भीतर, सरकार को दो और बड़े नीतिगत झटके लगे हैं. इस बार ये झटके अदालतों के जरिए आए हैं.
ये दो योजनाएं — लो-इम्पैक्ट ग्रीन हैबिटैट्स (LIGH), 2025 की मंजूरी/नियमितीकरण नीति और नई पंजाब यूनिफाइड बिल्डिंग रूल्स — भगवंत मान के नेतृत्व वाली सरकार के आवास एवं शहरी विकास विभाग ने हाल ही में लागू की थीं. इनका मकसद अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए कम से कम 5,000 करोड़ रुपये की परमिशन फीस जुटाना था.
18 दिसंबर को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने LIGH नीति पर 4 फरवरी तक रोक लगा दी. इस नीति के तहत शिवालिक पहाड़ियों जैसे पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील इलाकों में फार्महाउस निर्माण की अनुमति दी गई थी.
इसके छह दिन बाद पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने पंजाब यूनिफाइड बिल्डिंग रूल्स के कुछ प्रावधानों पर रोक लगा दी. इन नियमों में शहरी प्लॉट्स पर स्टिल्ट के साथ चार मंजिला निर्माण की अनुमति दी गई थी, जिसे शहरी सुधार के रूप में पेश किया गया था.
नियमों को अदालत में चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि इससे बेतरतीब घनीकरण होगा और यह फायर सेफ्टी व राष्ट्रीय भवन मानकों का उल्लंघन करेगा. याचिकाकर्ताओं का यह भी कहना था कि ये नियम बिल्डरों के पक्ष में झुके हुए हैं.
आवास विभाग के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि यह नीति वरिष्ठ आप नेता और दिल्ली के पूर्व मंत्री सत्येंद्र जैन के मार्गदर्शन में तैयार की गई थी, लेकिन इसे लागू करते समय बारीकियों, खासकर पर्यावरण से जुड़े पहलुओं को नजरअंदाज किया गया.
बार-बार संपर्क की कोशिशों के बावजूद सत्येंद्र जैन से बात नहीं हो सकी. वहीं, आवास विभाग के प्रधान सचिव विकास गर्ग ने ThePrint से कहा कि लंबित मुकदमों पर टिप्पणी करना उनके लिए उचित नहीं होगा.
पिछले साल मई में भगवंत मान के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी सरकार के आवास विभाग ने शहरीकरण के लिए 65,500 एकड़ से अधिक, ज्यादातर कृषि भूमि, के अधिग्रहण हेतु एक लैंड-पूलिंग योजना बनाई थी.
यह योजना बड़े विवाद में बदल गई और किसानों ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए. दबाव में आकर मान सरकार ने अगस्त में बनाई गई इस नीति को वापस ले लिया.
लो-इम्पैक्ट ग्रीन हैबिटैट नीति
20 नवंबर को अधिसूचित फार्महाउस नियमितीकरण नीति का उद्देश्य पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट (PLPA), 1900 के दायरे से बाहर की गई 55,000 हेक्टेयर जमीन पर पहले से बने फार्महाउसों को नियमित करना था. साथ ही नई निर्माण अनुमति की व्यवस्था भी की गई थी. नियमितीकरण के लिए प्रति एकड़ एक आधार शुल्क तय किया गया था.
पर्यावरणविदों और आलोचकों का आरोप है कि यह नीति जंगलों से सटे इलाकों में वीआईपी लोगों के फार्महाउसों को नियमित करने के लिए लाई गई थी, और इसमें पर्यावरणीय प्रभाव की कोई परवाह नहीं की गई.
काउंसिल ऑफ इंजीनियर्स की ओर से कपिल देव, गगनीश खुराना और मोहित जैन ने इस नीति को चुनौती दी. उनका आरोप है कि यह सुप्रीम कोर्ट के उन निर्देशों का उल्लंघन करती है, जिनमें PLPA के दायरे से बाहर की गई जमीन को केवल वास्तविक कृषि उपयोग के लिए सीमित रखने और किसी भी व्यावसायिक गतिविधि पर रोक लगाने की बात कही गई थी.
इसी नीति को लुधियाना स्थित पर्यावरण के लिए काम करने वाले सिविल एक्शन ग्रुप, पब्लिक एक्शन कमेटी ने भी पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में चुनौती दी है.
पब्लिक एक्शन कमेटी के जस्किरत सिंह ने दिप्रिंट से कहा, “पंजाब सरकार की ‘लो इम्पैक्ट ग्रीन हैबिटैट्स (LIGH) नीति, 2025’ की न्यायिक समीक्षा दो अलग-अलग मंचों पर चल रही है, जहां नीति से जुड़े अलग-अलग कानूनी सवालों की जांच हो रही है.”
उन्होंने कहा कि NGT ने पर्यावरणीय अनुपालन और कानूनी सुरक्षा उपायों से जुड़े मुद्दों पर विचार करते हुए 4 फरवरी तक LIGH नीति पर रोक लगा दी है. वहीं, पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में इस नीति की वैधता और कार्यपालिका की अधिकार-सीमा को लेकर अलग से याचिका पर सुनवाई चल रही है.
सिंह ने कहा, “यह नीति सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी द्वारा तय किए गए दिशानिर्देशों के खिलाफ है, जिसने 2010 में बड़े भू-भागों को डीलिस्ट किया था. अदालत ने डीलिस्टिंग की अनुमति केवल वास्तविक कृषि उपयोग और टिकाऊ आजीविका के लिए दी थी, और व्यावसायिक गतिविधियों पर रोक लगाई थी.”
24 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी के अध्यक्ष सिद्धांत दास ने पंजाब के मुख्य सचिव के.ए.पी. सिन्हा को पत्र लिखकर डीलिस्ट किए गए क्षेत्रों और संबंधित अदालती आदेशों की जानकारी मांगी थी.
पंजाब यूनिफाइड बिल्डिंग रूल्स
15 दिसंबर को आवास विभाग ने इन नियमों को अधिसूचित किया. इसका उद्देश्य नगर निगम क्षेत्रों के लिए स्थानीय सरकार विभाग द्वारा बनाए गए अलग-अलग भवन नियंत्रण नियमों और नगर सीमा से बाहर के इलाकों में आवास विभाग द्वारा लागू नियमों को एक साथ समेकित करना था.
इन नियमों के तहत कम ऊंचाई वाली इमारतों, यानी 21 मीटर तक की इमारतों, के लिए सिंगल लाइन डायग्राम प्लान का सेल्फ-सर्टिफिकेशन करने का प्रावधान किया गया. साथ ही, यदि तय समय-सीमा के भीतर सक्षम प्राधिकारी अनुमति या अस्वीकृति की सूचना नहीं देता है, तो उसे स्वीकृत माना जाएगा.
नियामकीय बदलावों के अलावा, इस नीति में 40 फीट चौड़ी सड़कों के किनारे स्थित रिहायशी प्लॉट्स पर स्टिल्ट के साथ चार मंजिला निर्माण की अनुमति दी गई. इसके अलावा, कोर एरिया में स्थित व्यावसायिक इमारतों के लिए ग्राउंड कवरेज को 100 प्रतिशत तक अनुमति दी गई, समेत अन्य बदलाव किए गए.
पंजाब के 93 वर्षीय निवासी हरविंदर सिंह सेखों ने इस अधिसूचना को चुनौती दी. उन्होंने आरोप लगाया कि ये नियम “रियल एस्टेट एडवाइजरी कमेटी के गठन के बाद बनाए गए हैं, जिसमें मुख्य रूप से निजी डेवलपर्स, कॉलोनाइज़र और प्रमोटर्स शामिल हैं, जिनके अपने व्यावसायिक हित जुड़े हुए हैं. इस वजह से जनहित को नजरअंदाज किया गया है.”
जस्टिस गुरविंदर सिंह गिल और जस्टिस परमोद गोयल की खंडपीठ ने नए नियमों के उन प्रावधानों के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी, जो पुराने भवन नियमों के प्रावधानों का उल्लंघन कर रहे थे.
अदालत में कहा गया, “यह प्रस्तुत किया गया है कि इन नियमों को लागू करने से अव्यवस्था पैदा होगी और रिहायशी इलाकों में अनावश्यक घनीकरण होगा. यह भी कहा गया है कि इन नियमों को बनाते समय क्षेत्र के निवासियों को विश्वास में नहीं लिया गया. यह भी कहा गया है कि इस तरह के बड़े बदलाव भविष्य में विकसित होने वाले इलाकों के लिए सोचे जा सकते हैं, न कि उन इलाकों के लिए जहां कुछ लोग पहले से ही मौजूदा नियमों और उपविधियों के अनुसार निर्माण कर चुके हैं.”
अदालत ने 24 दिसंबर को आदेश दिया, “इस बीच, 15.12.2025 की अधिसूचना के उन प्रावधानों के संचालन को, जो पुराने नियमों और विनियमों के साथ असंगत हैं, स्थगित रखा जाए. साथ ही, जो उल्लंघन पहले के नियमों और विनियमों के तहत उल्लंघन माने जाते थे, उन्हें नियमित न किया जाए.”
12 जनवरी को आवास विभाग ने आदेश दिया कि भवन निर्माण की अनुमति देते समय हाई कोर्ट के आदेशों का पालन किया जाए.
पब्लिक एक्शन कमेटी के जस्किरत सिंह ने कहा कि वे इस मामले में भी याचिकाकर्ताओं का समर्थन कर रहे हैं.
जस्किरत सिंह ने कहा, “इन नियमों का पहला मसौदा 2025 के मध्य में लाया गया था, जिसमें शहरी विकास को सरल बनाने का दावा किया गया था. लेकिन मसौदे ने जो वास्तव में किया, वह कहीं ज्यादा गंभीर था. इसने सत्ता का केंद्रीकरण किया, नगर निकायों के नियंत्रण को कमजोर किया, फ्लोर एरिया रेशियो और ऊंचाई मानकों को उदार बनाया, और पूरे राज्य में सेल्फ-सर्टिफिकेशन का विस्तार किया, वह भी फायर सेफ्टी, ड्रेनेज, सीवेज या प्रवर्तन की विफलताओं को पहले ठीक किए बिना.”
उन्होंने कहा कि मसौदा योजना पर कई आपत्तियां दाखिल की गई थीं. नागरिकों और रेजिडेंट समूहों ने बैठकों और व्यक्तिगत सुनवाई की मांग की थी, लेकिन सरकार ने किसी को भी बैठक के लिए नहीं बुलाया.
सिंह ने कहा, “व्यापक आपत्तियों के बावजूद सरकार ने सभी को खारिज कर दिया और दिसंबर 2025 में नियमों को बिना किसी बदलाव के अधिसूचित कर दिया. कोई कारण नहीं बताया गया. किसी भी तरह के कैरिंग कैपेसिटी अध्ययन सार्वजनिक नहीं किए गए. नगर निकायों की चिंताओं को नजरअंदाज कर दिया गया.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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