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Saturday, 31 January, 2026
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कल्याणकारी राज्य देश के लिए सामाजिक और आर्थिक आपदा: जीएन लवांडे

जी.एन. लवांडे ने 1958 में लिखा था कि एक वेलफेयर स्टेट में, कानून के शासन को खराब कर दिया गया है और जनता की राय और संप्रभुता को मंत्रियों के अलोकतांत्रिक आदेशों से बदला जा रहा है.

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कल्याणकारी राज्य की अवधारणा एक छलावा है

समाजवादी यह दावा करते हैं कि केवल “कल्याणकारी” राज्य ही हमें सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा प्रदान कर सकता है. हालांकि ऐसी सुरक्षा हमेशा काम नहीं करती है, और यदि ऐसा संभव हो भी तो दीर्घकालीन नीति के रूप में यह नैतिक और सामाजिक दृष्टि से वांछनीय नहीं होती है. सुरक्षा का राजनीतिक उद्देश्य जनता के मन से बेरोज़गारी के भय को दूर करना है. पूर्ण रोज़गार, जिसे कल्याणकारी राज्य के लक्ष्यों में से एक माना जाता है, अंततः एक धोखा साबित होता है. यह एक दिखावा है, क्योंकि जैसे ही एक क्षेत्र में रोज़गार सृजित होता है, दूसरे क्षेत्र में बेरोज़गारी पैदा हो जाती है.

आज हमें अपने देश में यही देखने को मिल रहा है. और विडंबना यह है कि हमारे मंत्री—जो अतार्किक और गैर-जिम्मेदार बयान देने में निपुण हैं—हमें बताते हैं कि उनका उद्देश्य जनकल्याण में वृद्धि करना, जीवन-स्तर को ऊँचा उठाना और उन्हें पूर्ण स्वतंत्रता देना है. ये सब खोखले नारे हैं, और इससे आम आदमी का पेट नहीं भरता है.

“कल्याण” रोज़गार पर आधारित है और रोज़गार उत्पादन पर. आज हम यह देख रहे हैं कि कराधान के जब्तीपूर्ण ढाँचे के कारण अधिक-से-अधिक लोग रोज़गार से बाहर फेंके जा रहे हैं. जब तक उत्पादन नहीं बढ़ेगा, राष्ट्रीय आय नहीं बढ़ सकती, और जब तक राष्ट्रीय आय नहीं बढ़ेगी, कल्याण भी नहीं बढ़ सकता.

राज्य का कल्याणकारी होना देश की उत्पादकता घटने का मुख्य कारण है. बलपूर्वक पूर्ण रोज़गार तो दिया जा सकता है, लेकिन वह हमें सभ्य जीवन-स्तर और स्वतंत्रता की ताज़ी हवा में उसका आनंद लेने के साधन नहीं दे सकता. वास्तविक समस्या यह नहीं है कि 1961 तक, अर्थात् द्वितीय पंचवर्षीय योजना के अंत तक, 1.1 करोड़ नौकरियां होंगी या नहीं. वास्तविक प्रश्न यह है कि हम कितना उत्पादन करेंगे और उसके परिणामस्वरूप हमारा जीवन-स्तर क्या होगा.

वितरण की समस्या, जिस पर आज बहुत ज़ोर दिया जा रहा है और जिसके लिए अमीर-गरीब सभी पर समान तरीके से जब्तीपूर्ण कर लगाए जा रहे हैं, अंततः उतनी ही आसानी से हल होती है जितना अधिक बांटने के लिए उपलब्ध हो. भारत में यदि हमें जीवित रहना है तो इस सत्य को आत्मसात करना ही होगा. हमारा राष्ट्रीय अस्तित्व रोज़गार-के-लिए-रोज़गार पर नहीं, बल्कि उत्पादन-के-लिए-उत्पादन पर निर्भर करता है. और जब उत्पादन होगा, तो रोज़गार की समस्या का समाधान खुद-ब-खुद हो जाएगा.

आज हम मुद्रास्फीति के कारण बढ़ती कीमतों से पीड़ित हैं और लोग दिन में दो वक्त का भोजन भी नहीं जुटा पा रहे हैं. क्या समाजवादी ढाँचे में इन परिस्थितियों में कल्याण बढ़ाना संभव है? बिल्कुल नहीं. वर्तमान आर्थिक बीमारी का एकमात्र समाधान उत्पादन में वृद्धि है. और यह तभी संभव है जब निजी उद्यम को स्वतंत्र रूप से काम करने दिया जाए.

आर्थिक आत्मनिर्भरता

अमेरिकी अर्थव्यवस्था उत्पादन बढ़ाने में सफल रही है, अर्थात् प्रति मानव-घंटा उत्पादन में वृद्धि. इसका मुख्य कारण आर्थिक स्वतंत्रता और बड़े पैमाने पर मुक्त उद्यमों का होना है. पश्चिम जर्मनी ने भी आर्थिक स्वतंत्रता के कारण “चमत्कार” किया. ईश्वर उनकी सहायता करता है जो स्वयं अपनी सहायता करते हैं. जितनी जल्दी हम कल्याणकारी राज्य वाली व्यवस्था को अलविदा कहेंगे और स्वयं अपने चिकित्सक बनेंगे, उतनी ही जल्दी हम राज्य पर से निर्भरता समाप्त कर पाएंगे.

आर्थिक स्वतंत्रता के बिना कल्याण नहीं बढ़ सकता. राजनीतिक स्वतंत्रता भी आर्थिक स्वतंत्रता के बिना अर्थहीन है. आर्थिक स्वतंत्रता को दो रूपों में समझा जा सकता है—अंतरराष्ट्रीय और घरेलू. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक स्वतंत्रता का मतलब है मुक्त व्यापार और मुद्रा का स्वतंत्र आदान-प्रदान. घरेलू स्तर पर इसका अर्थ है अपना पेशा और काम चुनने की आज़ादी, हर स्तर पर स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा, अमीर बनने या नुकसान उठाने की स्वतंत्रता, जितना चाहें उतना लाभ कमाने की आज़ादी, उससे संपत्ति बनाने की स्वतंत्रता, और उस संपत्ति को विरासत में देने या प्राप्त करने की आज़ादी.

आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ है राज्य के नियंत्रण या समाजवादी व्यवस्था के उलट निजी उद्यम और मुक्त बाज़ार वाली व्यवस्था. सरकार द्वारा लगाए गए नियंत्रण और अंकुश, विशेषकर कराधान के माध्यम से एक वर्ग से दूसरे वर्ग में आय का हस्तांतरण, न केवल अमानवीय है बल्कि निंदनीय भी है. ऐसे में कल्याण बढ़ाने की आशा करना चांद मांगने जैसा है.
निजी उद्यम और मुक्त प्रतिस्पर्धा ही जनकल्याण के लिए कार्य करते हैं. जितनी जल्दी हम यह समझें और कल्याणकारी राज्य को विदा कहें, उतनी ही जल्दी हमारा कल्याण बढ़ेगा. इसलिए वर्तमान संकट का उपचार नियोजन नहीं, बल्कि मुक्त अर्थव्यवस्था है.

वॉन मीसेस, हायेक और शुम्पीटर—शेक्सपीयर के मैकबेथ की तीन चुड़ैलों की तरह—यह भविष्यवाणी कर चुके थे कि मुक्त उद्यम वाली व्यवस्था से दूर होना मुक्त राष्ट्रों को पूंजीवाद से समाजवाद और समाजवाद से किसी न किसी प्रकार के पुलिस राज्य की ओर अनिवार्य रूप से ले जाएगा. दुर्भाग्यवश, हम देख रहे हैं कि यह भविष्यवाणी हमारे अपने देश में सच हो गई है.

हमने अपने नेताओं को देश को स्वर्ग बनाने के लिये दिया और उन्होंने उसे नर्क बना दिया. दूसरों के हाथों में अपना भाग्य सौंपना हमारी “हरक्यूलियन” भूल थी. अब हमें अपने पुरुषार्थ के पतन के परिणाम भुगतने होंगे. हम राजनीति की गणना में शून्य बन गए हैं और अब हमें अपनी इच्छा के विरुद्ध राज्य से प्रेम करना, उसकी आज्ञा मानना और उसका सम्मान करना होगा.

कल्याणकारी राज्य की अवधारणा राजनीतिक और आर्थिक नियोजन पर आधारित होती है. यह इसे भी मान लेता है कि मनुष्य केवल रोटी से जी सकता है—जबकि वह रोटी भी शर्मनाक रूप से घटिया होती है. योजना आयोग यह नहीं समझता कि प्रथम श्रेणी की योजनाएँ, यदि हों भी, तृतीय श्रेणी के परिणाम देती हैं—वह भी प्रथम श्रेणी की कीमत पर. इसलिए कल्याणकारी राज्य सामाजिक और आर्थिक—दोनों दृष्टियों से—एक राष्ट्रीय आपदा है.

सामाजिक रूप से इसलिए कि व्यक्ति को यह विश्वास दिलाया जाता है कि अपने भाग्य की जिम्मेदारी उसकी नहीं है. और आर्थिक रूप से इसलिए क्योंकि यह मुद्रास्फीति और दिवालियापन को जन्म देता है. यह परजीवी और प्रतिगामी है. यह इतने असंतुष्ट, निराश और खिन्न नागरिक पैदा करता है कि व्यवस्था बनाए रखने के लिए निरीक्षकों और अधीक्षकों की आवश्यकता पड़ती है.

कल्याणकारी राज्य में क़ानून का शासन अपवित्र हो जाता है और जनमत तथा जन-सत्ता—जो लोकतंत्र की नींव हैं—मंत्रियों के अलोकतांत्रिक आदेशों से प्रतिस्थापित हो जाती हैं. कल्याणकारी राज्य की पहचान सार्वभौमिक गरीबी है. यह ग़लत लोगों को शक्तिशाली बनाने की कोशिश करता है, जबकि अब्राहम लिंकन के शब्दों में, “आप शक्तिशाली को कमजोर करके कमजोर को मजबूत नहीं कर सकते.”

दुष्चक्र

यह ग़लत धारणा है कि उच्च आय वर्गों पर कर लगाने से उनके उपभोग में कमी आती है और जो क्रय-शक्ति बचती है, उसे निम्न आय वर्गों के सामाजिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. यह याद रखना चाहिए कि प्रो. रोपके के अनुसार उच्च आय वर्ग, समाज के कुछ अनिवार्य कार्यों—जैसे पूंजी निर्माण और निवेश—की नींव प्रदान करते हैं.
यदि प्रगतिशील कराधान के माध्यम से इन वर्गों को समाप्त कर दिया जाए, तो ये कार्य शायद ही संपन्न हो सकें. तब इन्हें राज्य को अपने हाथ में लेना पड़ेगा. इसका अर्थ है कि कल्याणकारी राज्य के लिए आवश्यक क्रय-शक्ति उपलब्ध नहीं रहती और कल्याण की पूरी व्यवस्था ही छोड़नी पड़ती है.

ऊँची आय पर भारी कर लगाने से आम लोगों को लाभ नहीं होता, बल्कि राज्य को अधिक शक्ति और प्रभाव मिल जाता है. इसका परिणाम यह होता है कि आधुनिक निरंकुशता को बढ़ावा मिलता है, जहां सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निर्णय-शक्ति केंद्रित हो जाती है—जैसे पूंजी निर्माण, पूंजी खर्च, शिक्षा, शोध और लाभ. दान, मान-सम्मान के कार्य, उदारता, बातचीत, अवकाश—यानी वे सभी चीज़ें जिन्हें बर्क ने ‘जीवन की नि:शुल्क सुंदरताएं’ कहा था—राज्य की जकड़न में दबकर समाप्त हो जाती हैं.

दासता की ओर मार्ग

इससे निकलने वाला निष्कर्ष सरल है. कल्याणकारी राज्य के पीछे भागना स्वयं को पतित करना है. समाजवाद में सर्वोच्च आर्थिक नियोजन पर राज्य का एकाधिकार निहित है और प्रो. हायेक के शब्दों में यह दासता की ओर ले जाने वाला मार्ग है. इसका एकमात्र उपचार उदारवाद (लिबर्टेरियनिज्म) है.

उदारवाद अधिकतम व्यक्तियों और समूहों के लिए अधिकतम स्वतंत्रता सुनिश्चित करना चाहता है. इसके अनुसार, स्वतंत्रता के बिना वास्तविक सुख संभव नहीं है. उदारवादी मानते हैं कि मनुष्य स्वतंत्रता के साथ जन्म लेता है और दमन की स्थिति में वह सुखी नहीं रह सकता. स्वतंत्रता ही सुख और कल्याण का आधार है.

राज्य कोई कल्याण-उत्पादक मशीन नहीं है. उदारवाद कोई विशिष्ट आर्थिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह मानव स्वभाव की एक गैर-भौतिक अवधारणा में निहित है. यह मार्क्सवादी समाजवाद के विपरीत है. उदारवाद का मूल विचार स्वतंत्रता या आजादी में निहित है. यह स्वतंत्रता चुनने की क्षमता या संभावना से संबंधित है. यह व्यक्तिगत भी है और सामाजिक भी.

आर्थिक व्यवस्था के रूप में उदारवाद विवेक और हित-प्रेरणा का उपयोग करता है. हित-प्रेरणा मूल्य-तंत्र के माध्यम से कार्य करती है. खरीद की स्वतंत्रता आर्थिक उदारवाद की आधारशिला है. इसी स्वतंत्रता के माध्यम से जनता उत्पादन और व्यापार को दिशा देती है.

उदारवाद राज्य को पूंजी और श्रम के संघर्ष में पक्षकार नहीं बनाना चाहता. वह राज्य को एक सर्वोच्च संस्था मानता है, जो आर्थिक संघर्षों से ऊपर रहे. उदारवादी राज्य किसी न किसी रूप में लोकतांत्रिक होता है. बाध्यता-मुक्त प्रतिस्पर्धा एक विरोधाभास है. आर्थिक उदारतावाद मुक्त आर्थिक अनुकूलन की व्यवस्था है.

अंततः लोगों का जीवन-स्तर और कल्याण बढ़ाने वाला मार्ग मुक्त अर्थव्यवस्था है, न कि कल्याणकारी राज्य.

यह लेख सेंटर फ़ॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इस लेख का प्रकाशन मूलरूप से 1 अगस्त 1963 को “द इंडियन लिबर्टेरियन” पत्रिका में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


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