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Thursday, 29 January, 2026
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अजित पवार के बाद एनसीपी के भविष्य को लेकर बड़ा सवाल

अजित पवार के बिना एनसीपी को अपने अस्तित्व की रणनीति बनानी होगी. क्या पार्टी शरद पवार गुट में विलय करेगी? विश्लेषकों का कहना है कि प्रफुल्ल पटेल और तटकरे जैसे दूसरे स्तर के नेताओं में पार्टी का नेतृत्व करने की काबिलियत नहीं है.

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मुंबई: अजित पवार की अचानक हुई मृत्यु से महाराष्ट्र की राजनीति में हलचल मच गई है और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) का उनका गुट अब अनिश्चित भविष्य की ओर देख रहा है. अजित पवार की ताकत और पकड़ पर टिकी यह पार्टी अब नेतृत्व के खालीपन से जूझ रही है. ऐसे में इस बात की अटकलें तेज़ हो गई हैं कि क्या यह गुट शरद पवार नीत एनसीपी में विलय करेगा या फिर पार्टी के वरिष्ठ नेता दूसरे दलों की ओर रुख करेंगे.

जुलाई 2023 में जब अजित पवार ने 40 विधायकों और प्रफुल्ल पटेल व सुनील तटकरे जैसे कुछ वरिष्ठ नेताओं के साथ शरद पवार से अलग होकर नई राह पकड़ी थी, तब पार्टी पूरी तरह उनके व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द बनी थी. अब सवाल यह है कि क्या अजित पवार गुट उनके बिना टिक पाएगा या फिर शरद पवार गुट में विलय करेगा.

अगर पार्टी अलग रहकर आगे बढ़ने का फैसला करती है, तो अगला बड़ा सवाल नेतृत्व का होगा. दूसरे स्तर के नेता — सुनील तटकरे, प्रफुल्ल पटेल और छगन भुजबल सभी बड़े नेता हैं, लेकिन विश्लेषकों को आपसी खींचतान की आशंका है.

विधानसभा चुनाव और नगर परिषद चुनावों के बाद अजित पवार गुट मजबूत होकर उभरा था, जबकि शरद पवार की एनसीपी काफी कमज़ोर हो गई थी. इसी वजह से यह चर्चा भी चली थी कि कहीं शरद पवार गुट ही अजित पवार गुट में विलय न कर ले. नगर निगम चुनावों में भी दोनों गुटों ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था.

दरअसल, जब अजित पवार से दोनों गुटों के फिर से एक होने के बारे में पूछा गया था, तो उन्होंने इस संभावना से इनकार नहीं किया था और कहा था कि इस पर बाद में चर्चा होगी.

आगामी जिला परिषद और पंचायत समिति चुनावों में, जिनके लिए अजित पवार बुधवार को बारामती में रैलियों के लिए जा रहे थे, एनसीपी के दोनों गुटों ने घड़ी के चुनाव चिह्न पर साथ चुनाव लड़ने का फैसला किया था. यह चुनाव चिह्न अब अजित पवार गुट के पास है.

राजनीतिक विश्लेषक हेमंत देसाई ने दिप्रिंट से कहा, “ऐसा लग रहा था कि दोनों गुटों को साथ लाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे थे, क्योंकि वे जिला परिषद चुनाव एक ही चुनाव चिह्न पर लड़ने वाले थे. अब सवाल यह है कि पार्टी की जिम्मेदारी कौन संभालेगा. दोनों गुटों को विलय करना होगा और परिवार से ही किसी को रोहित पवार या किसी और को नेतृत्व करना होगा, क्योंकि सुप्रिया सुले ने साफ कर दिया है कि उनकी ज्यादा रुचि राष्ट्रीय राजनीति में है.”

लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे जैसे वरिष्ठ नेता वहां जाएंगे, जहां उन्हें सबसे ज्यादा राजनीतिक फायदा दिखेगा, जरूरी नहीं कि वे शरद पवार गुट में ही जाएं.

हेमंत देसाई ने आगे कहा, “जहां तक सुनील तटकरे, धनंजय मुंडे या प्रफुल्ल पटेल जैसे नेताओं का सवाल है, मुझे लगता है कि वे बीजेपी के साथ जाना ज्यादा पसंद करेंगे.”

अगर अजित पवार गुट अलग रहकर चलता है, तो विश्लेषक अभय देशपांडे ने कहा, “पार्टी का नेतृत्व करने के लिए रोहित पवार से लेकर सुप्रिया सुले तक कई नाम सामने आ सकते हैं. अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन कुछ लोग कांग्रेस या बीजेपी में जा सकते हैं. सभी को हालात के हिसाब से खुद को ढालना होगा.”

तुरंत असर

अजित पवार के निधन से बारामती में उपचुनाव कराना ज़रूरी हो जाएगा और यही पहली बड़ी खाली जगह है जिसे भरना होगा. 2024 में अजित पवार ने एनसीपी (एसपी) के उम्मीदवार और अपने भतीजे युगेंद्र पवार को हराया था.

देसाई ने कहा, “अब सवाल यह है कि बारामती और पुणे, पिंपरी-चिंचवड का नेतृत्व कौन करेगा, क्योंकि ये उनका मजबूत इलाका था. चूंकि पार्टी मुख्य रूप से पश्चिमी महाराष्ट्र में केंद्रित रही है, इसलिए नया नेता भी पश्चिमी महाराष्ट्र से ही होना चाहिए.”

अगर दोनों गुटों का विलय नहीं होता है, तो परिवार के भीतर से अगला नेता पत्नी सुनेत्रा पवार या बेटे जय या पार्थ हो सकते हैं, लेकिन जय और पार्थ पवार राजनीति और प्रशासन में अभी अपेक्षाकृत अनुभवहीन हैं, इसलिए विश्लेषकों को नहीं लगता कि उन्हें जिम्मेदारी दी जाएगी.

सुनेत्रा पवार ने राजनीति में तब कदम रखा था, जब अजित पवार ने बारामती लोकसभा सीट पर अपनी चचेरी बहन सुप्रिया सुले के खिलाफ उनका नाम उम्मीदवार के तौर पर घोषित किया था. हालांकि, वे चुनाव हार गईं, लेकिन बाद में वह बीजेपी के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन की ओर से निर्विरोध राज्यसभा सदस्य बनीं.

कई वर्षों तक पर्दे के पीछे रहते हुए सुनेत्रा बारामती में महिला समूहों और कल्याणकारी कार्यक्रमों के जरिए सामाजिक और संगठनात्मक कामों में सक्रिय रही हैं.

इसके अलावा, अगर अजित पवार गुट को अपने दम पर टिके रहना है, तो उसे सोलापुर, पुणे और पश्चिमी महाराष्ट्र के अन्य इलाकों में अपना असर बढ़ाना होगा.

अजित पवार की एनसीपी को यह भी तय करना होगा कि वह महायुति में बनी रहे या विपक्ष में जाए, जहां जगह लगातार सिमट रही है. अगर पार्टी महायुति छोड़ती है (खासकर अगर 2029 में बीजेपी अकेले चुनाव लड़ती है), तो देसाई का मानना है कि अजित पवार की एनसीपी के कांग्रेस में जाने की संभावना कम है.

एक अन्य राजनीतिक विश्लेषक प्रकाश बाल इससे सहमत नहीं हैं.

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि अंत में एनसीपी को कांग्रेस में विलय करना ही पड़ेगा. फिलहाल महाराष्ट्र में विपक्ष की जगह लगातार घट रही है और कांग्रेस भी कमज़ोर हो रही है. इससे कांग्रेस को खुद को फिर से मजबूत करने का मौका मिल सकता है. बेशक इसके लिए राहुल गांधी और शरद पवार को बड़ा दिल दिखाना होगा.”

प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे जैसे नेताओं को भी अब कठिन फैसले लेने होंगे. पटेल कभी महाराष्ट्र में जनाधार वाले नेता नहीं रहे हैं और न ही तटकरे, भले ही वे अजित पवार की पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हैं. तटकरे और उनका परिवार रायगढ़ जिले तक सीमित हैं, जहां उन्हें शिवसेना (शिंदे) से कड़ी चुनौती मिल रही है.

अजित पवार के एक और करीबी सहयोगी धनंजय मुंडे की बीड जिले में क्षेत्रीय पकड़ रही है, लेकिन बीड के सरपंच संतोष देशमुख की हत्या में उनके सहयोगी का नाम आने के आरोपों के बाद वहां उनका प्रभाव कमजोर पड़ा है.

इसलिए प्रफुल्ल पटेल, सुनील तटकरे और धनंजय मुंडे के लिए बीजेपी जैसी बड़ी पार्टी में जाना एक व्यवहारिक विकल्प माना जा रहा है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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