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Thursday, 29 January, 2026
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मणिपुर में राष्ट्रपति शासन खत्म होने से पहले नई हिंसा, बीजेपी की वापसी पर छाया संकट

मणिपुर विधानसभा, जहां बीजेपी बहुमत में है, को 13 फरवरी 2025 को राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद निलंबित स्थिति (सस्पेंडेड एनिमेशन) में रखा गया था.

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नई दिल्ली: सोमवार को हुई घटना के बाद मणिपुर में फिर से तनाव बढ़ गया है. कांगपोकपी जिले के एक गांव में कुछ कुकी-जो समुदाय के घरों में आग लगा दी गई. यह घटना ऐसे समय हुई है जब राष्ट्रपति शासन खत्म होने में सिर्फ 15 दिन बाकी हैं. इस नए तनाव से केंद्र सरकार की मणिपुर में जनप्रिय (लोकप्रिय) सरकार बनाने की योजना पर खतरा पैदा हो सकता है.

पिछले चार महीनों में केंद्र के वरिष्ठ बीजेपी नेताओं और पार्टी के विधायकों के बीच कई बैठकें हुई हैं. इनमें कुकी-जो समुदाय से आने वाले बीजेपी विधायक भी शामिल थे. इन बैठकों का मकसद राज्य में जनप्रिय सरकार बनाने की संभावना तलाशना था. मणिपुर विधानसभा, जहां बीजेपी बहुमत में है, को 13 फरवरी 2025 को राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद निलंबित स्थिति में रखा गया था.

13 फरवरी को राष्ट्रपति शासन के एक साल पूरे होने के साथ ही बीजेपी विधायकों, खासकर मैतेई समुदाय के विधायकों, की ओर से राज्य में जनप्रिय सरकार बनाने की कोशिशें तेज हो गई हैं.

अगर राष्ट्रपति शासन की अवधि बढ़ाई जाती है, तो मणिपुर विधानसभा को भंग किया जा सकता है और नए चुनाव कराए जा सकते हैं.

बीजेपी के एक मैतेई विधायक ने, नाम न छापने की शर्त पर दिप्रिंट से कहा, “विधानसभा को भंग करने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि हमारे (बीजेपी) पास बहुमत है और अगले विधानसभा चुनाव होने में अभी एक साल बाकी है. कहीं-कहीं हिंसा की घटनाएं हो रही हैं, लेकिन कुल मिलाकर हालात नियंत्रण में हैं.”

60-सदस्यीय मणिपुर विधानसभा में बीजेपी बहुमत में है. जनवरी 2025 में नेशनल पीपल्स पार्टी (एनपीपी) के विधायक एन. कयिसी की मौत के बाद फिलहाल विधानसभा में 59 विधायक हैं. बीजेपी के पास, जिनमें कुकी-जो समुदाय के सात विधायक भी शामिल हैं, कुल 32 सीटें हैं. 2022 के मणिपुर विधानसभा चुनाव के बाद जनता दल (यूनाइटेड) के पांच विधायक बीजेपी में शामिल हो गए थे, जिससे पार्टी की प्रभावी संख्या 37 हो गई.

ऐसे हालात में, ताजा तनाव केंद्र सरकार की सरकार बनाने की योजना को पीछे धकेल सकता है.

सुरक्षा तंत्र से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने दिप्रिंट से कहा, “वैसे भी राज्य की सुरक्षा एजेंसियों — जिनमें सेना, सीआरपीएफ, असम राइफल्स, इंटेलिजेंस ब्यूरो आदि शामिल हैं — ने अपनी रिपोर्ट में केंद्र को राष्ट्रपति शासन जारी रखने की सलाह दी है. उनके मुताबिक, राज्य में हालात अभी सरकार बनाने के लिए अनुकूल नहीं हैं.”

सरकार को समर्थन देने पर कुकी-जो विधायकों की कड़ी सौदेबाज़ी

केंद्र सरकार के सामने मणिपुर में जनप्रिय (लोकप्रिय) सरकार बहाल करने की सोच में एक और चुनौती जुड़ गई है. यह चुनौती बीजेपी के कुकी-जो विधायकों के कड़े रुख की वजह से सामने आई है.

मणिपुर में कुकी-जो समुदाय के कुल 10 विधायक हैं, जिनमें से सात बीजेपी से हैं. दो विधायक पहले बीजेपी के सहयोगी थे, लेकिन मई 2023 में जातीय हिंसा के बाद उन्होंने समर्थन वापस ले लिया था. एक विधायक निर्दलीय है.

बीजेपी के सात कुकी-जो विधायकों ने केंद्रीय नेतृत्व को साफ तौर पर बता दिया है कि वे तभी सरकार बनाने की प्रक्रिया में हिस्सा लेंगे, जब उन्हें लिखित भरोसा दिया जाएगा कि उनकी विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेश (यूटी) की मांग को मौजूदा विधानसभा के कार्यकाल खत्म होने से पहले पूरा किया जाएगा.

चूराचांदपुर जिले के सैकोट से कुकी विधायक पाओलियनलाल हाओकिप ने दिप्रिंट से कहा, “हम तभी सरकार बनाने में हिस्सा लेने का फैसला करेंगे जब केंद्र हमें हमारी मांगों पर बातचीत के जरिए राजनीतिक समाधान का लिखित आश्वासन देगा. इसके बिना हम हिस्सा नहीं लेंगे और इसके नतीजे भुगतने के लिए तैयार हैं.”

एक दूसरे कुकी-जो विधायक, जिन्होंने नाम न छापने की शर्त रखी, ने कहा, “केंद्रीय नेतृत्व इसे अनुशासनहीनता मान सकता है और हमें पार्टी से निकाल भी सकता है.”

‘शांति को नुकसान पहुंचाने की कोशिश’

सुरक्षा एजेंसियों और राज्य के राजनीतिक नेताओं ने कहा कि सोमवार को हुई घटना, जिसमें नागा उग्रवादी संगठन जेलियांगरोंग यूनाइटेड फ्रंट (कामसन) के एक छोटे गुट के हथियारबंद लोगों ने कांगपोकपी जिले के के. सोंगलुंग गांव में कुकी-जो समुदाय के कुछ घरों में आग लगा दी, कुकी-जो समुदाय और नागाओं के बीच तनाव बढ़ाने की जानबूझकर की गई कोशिश हो सकती है. कांगपोकपी एक कुकी-जो बहुल जिला है.

मई 2023 से, जब मणिपुर में गैर-जनजातीय मैतेई और जनजातीय कुकी-जो समुदायों के बीच जातीय हिंसा शुरू हुई थी, तब से नागा समुदाय ने किसी का पक्ष नहीं लिया है.

जेलियांगरोंग नागा, मणिपुर में रहने वाली आदिवासी जनजातियों का एक समूह है. जेलियांगरोंग तीन जनजातियों — ज़ेमे, लियांगमै और रोंगमै का संयुक्त नाम है.

यह इस महीने की दूसरी घटना थी, जब नागा उग्रवादी संगठन के इस छोटे गुट ने कुकी-जो बहुल इलाकों पर हमला किया. सुरक्षा तंत्र से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि 8 जनवरी को ZUF-कामसन गुट के हथियारबंद लोगों ने कांगपोकपी जिले के एक और कुकी-जो गांव खाराम वैफेई में ऑटोमैटिक हथियारों से करीब तीन दर्जन गोलियां चलाई थीं.

ZUF-कामसन, मुख्य ZUF का एक छोटा गुट है, जो गृह मंत्रालय के साथ बातचीत कर रहा है.

एक दूसरे मैतेई बीजेपी विधायक ने कहा, “ZUF-कामसन ऐसे घटनाओं के जरिए नागा उप-राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है. इन घटनाओं के जरिए वे खुद को नागा अधिकारों का रक्षक दिखाना चाहते हैं और नागाओं को इस संघर्ष में खींचना चाहते हैं. इसके पीछे कुछ स्वार्थी हित हो सकते हैं. 13 फरवरी से पहले ऐसी घटनाएं यह संदेश देती हैं कि हालात सरकार बनाने के लिए अनुकूल नहीं हैं.”

सोमवार की घटना की निंदा नागा उग्रवादी संगठनों में सबसे बड़े संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (NSCN-IM) और यूनाइटेड नागा काउंसिल ने की है. NSCN (IM) पिछले दो दशकों से भारत सरकार के साथ शांति वार्ता में शामिल है, जबकि यूनाइटेड नागा काउंसिल नागाओं की शीर्ष नागरिक संस्था है.

26 जनवरी को जारी एक बयान में NSCN (IM) ने कहा, “इस घटना में NSCN का नाम घसीटा जाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. किसी भी तरह से हम ZUF (कामसन) से जुड़े नहीं हैं और न ही खसखस की खेती के खिलाफ इस तरह की किसी कार्रवाई से हमारा कोई लेना-देना है.”

यह घटना उस मामले के कुछ ही दिनों बाद हुई है, जिसमें पिछले हफ्ते चुराचांदपुर में एक मैतेई व्यक्ति की संदिग्ध कुकी उग्रवादियों द्वारा हत्या कर दी गई थी. वह व्यक्ति अपनी कुकी साथी से मिलने गया था.

हालांकि, मणिपुर के रहने वाले सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल कोंसम हिमालय सिंह ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि कुछ कुकी समूहों और ZUF (कामसन) के बीच झड़पें मणिपुर में जनप्रिय सरकार बनाने की योजना को बिगाड़ने के लिए जानबूझकर की गई हैं. उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “कुछ कुकी समूहों और जेलियांगरोंग जनजातियों के बीच जमीन के अधिकारों को लेकर काफी समय से तनाव बना हुआ है. इस घटना को उसी नजरिए से देखा जाना चाहिए.”

उन्होंने यह भी कहा कि 1992 से 1995 के बीच मणिपुर में नागा-कुकी संघर्ष में 1,200 से ज्यादा लोगों की जान गई थी और 200 से अधिक गांव तबाह हो गए थे. उन्होंने कहा, “उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से ही मणिपुर के पहाड़ी इलाकों में दोनों के बीच जमीन और क्षेत्र को लेकर गंभीर विवाद रहे हैं और नागा जनजाति पर जमीन हड़पने के आरोप लगते रहे हैं. यह कोई नई बात नहीं है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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