बेतूल (गोवा), 28 जनवरी (भाषा) अपतटीय क्षेत्रों में तेल एवं गैस खोज को गति देने और परिचालन लागत घटाने की दिशा में एक अहम रणनीतिक कदम उठाते हुए सार्वजनिक क्षेत्र की ओएनजीसी और रिलायंस इंडस्ट्रीज ने ड्रिलिंग रिग, आपूर्ति वाहन और अन्य बुनियादी संसाधनों को साझा करने वाला एक समझौता किया है।
ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ओएनजीसी) के निदेशक (उत्पादन) पंकज कुमार ने बताया कि ‘इंडिया एनर्जी वीक’ (आईईडब्ल्यू) के दौरान हुए इस समझौते का उद्देश्य देश के पूर्वी तट पर गहरे समुद्र में होने वाले अन्वेषण और उत्पादन अभियानों के लिए संसाधनों को साझा करना है। इसमें विशेष रूप से कृष्णा-गोदावरी (केजी) बेसिन और अंडमान अपतटीय क्षेत्र शामिल हैं।
कुमार ने कहा कि यह समझौता लागत अनुकूलन, परियोजनाओं के त्वरित क्रियान्वयन, परिसंपत्तियों के बेहतर उपयोग और गहरे समुद्र वाली जटिल परियोजनाओं में परिचालन दक्षता बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
उन्होंने कहा कि ओएनजीसी और रिलायंस इंडस्ट्रीज के बीच यह सहयोग अपतटीय क्षेत्रों में मजबूत तालमेल स्थापित करेगा, जहां दोनों कंपनियों की कई जगहों पर आस-पास ही परिसंपत्तियां और ब्लॉक हैं।
समझौते के तहत दोनों कंपनियां अपतटीय ऊर्जा गतिविधियों में संसाधनों, अवसंरचना और तकनीकी क्षमताओं के संयुक्त उपयोग की संभावनाएं तलाशेंगी।
ओएनजीसी ने कहा, ‘इस समझौते के तहत अपतटीय एवं जमीनी प्रसंस्करण इकाई, ड्रिलिंग रिग, समुद्री वाहन, बिजली, पाइपलाइन, लॉगिंग और वेल सर्विस जैसी सुविधाएं शामिल हो सकती हैं।’
कंपनी ने कहा कि संसाधनों के साझा उपयोग से महंगे रिग, विशेष उप-समुद्री उपकरण और लॉजिस्टिक की लागत घटेगी, दोहराव कम होगा और संसाधनों की निष्क्रिय क्षमता घटेगी। साथ ही गहरे समुद्र वाली सीमित सेवाओं तक बेहतर पहुंच से परियोजनाओं की तैनाती एवं निष्पादन तेज होगा और साझा आपातकालीन प्रतिक्रिया और प्रशिक्षण क्षमताओं से परिचालन सुरक्षा भी मजबूत होगी।
यह हाल के वर्षों में ओएनजीसी और रिलायंस के बीच दूसरी बड़ी साझेदारी है। इससे पहले 2024 में ओएनजीसी, रिलायंस और बीपी ने मिलकर मुक्त क्षेत्र लाइसेंसिंग नीति (ओएएलपी) के तहत सौराष्ट्र बेसिन के एक अपतटीय ब्लॉक के लिए बोली लगाई थी।
कुमार ने कहा कि दोनों कंपनियों के अपतटीय तेल एवं गैस परिचालन एक-दूसरे के पूरक होने से संसाधन साझा करना अधिक व्यावहारिक है।
उन्होंने बताया कि फिलहाल किसी विदेशी ध्वज वाले रिग या जहाज के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में संचालन हेतु रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय और पोत परिवहन महानिदेशक से मंजूरी लेनी पड़ती है, जिसमें करीब 45 दिन लगते हैं। यदि एक कंपनी के बाद दूसरी कंपनी उसी जहाज का इस्तेमाल करना चाहे तो फिर पूरी प्रक्रिया दोहरानी पड़ती है।
कुमार ने कहा, “इसके पीछे सोच यह है कि यदि किसी अपतटीय आपूर्ति जहाज और उसके चालक दल को सभी आवश्यक मंजूरियां मिल चुकी हैं, तो उसे जरूरत के हिसाब से एक ब्लॉक से दूसरे ब्लॉक में जाने की अनुमति होनी चाहिए।”
उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यह सहयोग भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने, निवेश आकर्षित करने और वैश्विक आपूर्ति व्यवधानों के जोखिम को कम करने की दिशा में एक व्यावहारिक और दूरदर्शी पहल है।
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