कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग की संशोधित कैडर आवंटन नीति, जो जनवरी 2026 से लागू होगी, कुछ प्रक्रिया में सुधार लाती है. इनमें समय-सीमा, रिक्तियों की पारदर्शिता और दिव्यांगजन के लिए प्रावधान शामिल हैं. लेकिन 2017 की नीति की तरह ही यह भी मूल समस्या को नजरअंदाज करती है. ये सेवाएं संविधान में अखिल भारतीय स्वरूप के लिए बनाई गई थीं, लेकिन व्यवहार में इन्हें राज्य-आधारित कैडर के रूप में संचालित किया जाता है, जहां अधिकारी अपना लगभग पूरा करियर उसी राज्य में स्थायी रूप से बिताते हैं.
यह विरोधाभास सबसे अधिक उन टॉप रैंक हासिल करने वाले सिविल सेवा अभ्यर्थियों के अनुभवों में दिखता है, जिन्हें उनकी असाधारण योग्यता के बावजूद होम कैडर नहीं मिलता. इसका कारण रिक्तियों की श्रेणी से जुड़ा ऐसा असंतुलन होता है, जिस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता. टॉप 50 में रैंक पाने वाला उम्मीदवार, जो पंजाब या हिमाचल प्रदेश जैसे अपने गृह राज्य में सेवा देने को तैयार है, एक बड़ी बाधा से टकराता है. अगर उस साल उसके होम कैडर में अनारक्षित श्रेणी की कोई रिक्ति नहीं है और केवल एससी, एसटी या ओबीसी की सीटें हैं, तो उसे वहां समायोजित नहीं किया जा सकता. ऐसे में वह रोस्टर प्रणाली के तहत बाहरी कैडर में भेज दिया जाता है. यह अलगाव किसी कमी के कारण नहीं, बल्कि प्रशासनिक संयोग के कारण होता है.
यह अन्याय सबसे अधिक टॉप रैंक पाने वालों को प्रभावित करता है. नई नीति का पैरा 3.5 एक अजीब असमानता पैदा करता है. आरक्षित श्रेणी के कम रैंक वाले उम्मीदवार अनारक्षित इनसाइडर रिक्तियों के लिए भी प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं और असफल होने पर अपनी श्रेणी की रिक्तियों का दावा कर सकते हैं. सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों के पास यह विकल्प नहीं होता. इस तरह 150 रैंक वाला एससी, एसटी या ओबीसी उम्मीदवार, उसी रिक्ति असंतुलन की स्थिति में, 20 रैंक वाले सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार से अधिक लचीलापन पा जाता है. यह सिविल सेवा चयन की मेरिट आधारित भावना को उलट देता है.
राजनीतिक प्रतिक्रिया
इस महीने की शुरुआत में हिमाचल प्रदेश में हुआ विवाद दिखाता है कि यह समस्या राजनीतिक तनाव में कैसे बदलती है. राज्य के लोक निर्माण विभाग के मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने उत्तर प्रदेश और बिहार से आए “बाहरी” आईएएस और आईपीएस अधिकारियों पर राज्य हितों की अनदेखी और स्थानीय संस्कृति के प्रति असंवेदनशील होने का आरोप लगाया. यह बयान अनुचित था, लेकिन फिर भी गूंज पैदा कर गया. इसकी वजह यह है कि यह एक वास्तविक संरचनात्मक असंतोष को सामने लाता है. जब अन्य राज्यों के अधिकारी वरिष्ठ पदों पर होते हैं और साथ ही उच्च मेरिट वाले गृह राज्य के उम्मीदवार केवल प्रशासनिक कारणों से अपने ही कैडर में नहीं आ पाते, तो अंदर ही अंदर नाराजगी बढ़ती है. यह विवाद दिखाता है कि इनसाइडर और आउटसाइडर का तनाव केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि अनसुलझे संरचनात्मक विरोधाभासों का नतीजा है.
केंद्रीय प्रतिनियुक्ति का भ्रम
सरकारी सुधारक अक्सर केंद्रीय प्रतिनियुक्ति को अखिल भारतीय स्वरूप को साकार करने का तरीका बताते हैं. इसके तहत अधिकारी दिल्ली में निदेशक, संयुक्त सचिव और सचिव स्तर पर काम करते हैं. सिद्धांत रूप में यह व्यवस्था ठीक लगती है, लेकिन व्यवहार में यह लगातार कमजोर होती जा रही है.
केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है. अब अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों के साथ-साथ केंद्रीय सेवाओं के अधिकारी, शिक्षाविद और निजी क्षेत्र से आए लैटरल एंट्री उम्मीदवार भी वरिष्ठ पदों के लिए मुकाबला कर रहे हैं. इससे भी बड़ी समस्या यह है कि एम्पैनलमेंट की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है. कैडर आवंटन की तरह स्पष्ट नियमों के बजाय यहां धुंधली “सर्च-कम-सेलेक्शन” प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं, जो प्रभावशाली और संपर्क वाले अधिकारियों को फायदा पहुंचाती हैं.
जो अधिकारी दशकों तक अपने गृह राज्य की राजनीति में जुड़े रहते हैं और वहां नेटवर्क समेत प्रभाव बना लेते हैं, वे केंद्रीय प्रतिनियुक्ति को अब व्यवधान के रूप में देखने लगे हैं. उन्हें यह उन जगहों से हटाने जैसा लगता है, जहां वे वास्तविक शक्ति का प्रयोग करते हैं. गठबंधन राजनीति के दौर में जैसे-जैसे केंद्र और राज्यों के संबंध अधिक प्रतिस्पर्धी हो रहे हैं, अधिकारी अपने होम कैडर में ही बने रहना पसंद करते हैं. जो केंद्रीय प्रतिनियुक्ति कभी करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी, वह अब खासकर आरामदेह होम कैडर वाले अधिकारियों के लिए कम आकर्षक होती जा रही है. यह संघीय तनाव प्रतिनियुक्ति पर आधारित समाधानों को अव्यावहारिक बना देता है.
अधूरे प्रयोग
कुछ सुधारक अंतर-राज्य प्रतिनियुक्ति का सुझाव देते हैं. इसके तहत अधिकारियों को तय अवधि के लिए गैर-पड़ोसी राज्यों में सेवा करनी होगी, ताकि स्थानीय जड़ता टूटे और व्यापक दृष्टिकोण विकसित हो. लेकिन इसे कभी व्यवस्थित रूप से लागू नहीं किया गया है और ऐसा करने पर राज्यों का कड़ा विरोध तय है. इससे भी ज्यादा अहम बात यह है कि अगर इसे अतिरिक्त सचिव और सचिव स्तर पर पदोन्नति की शर्त भी बना दिया जाए, तब भी मूल शिकायत का समाधान नहीं होगा. अधिकारी अपना मुख्य करियर फिर भी होम कैडर में ही बिताते रहेंगे. प्रशासनिक ढांचा लगभग जस का तस बना रहेगा.
भाषा और सांस्कृतिक बाधाएं इस समस्या को और गहरा करती हैं. पंजाबी भाषा में दक्ष कोई अधिकारी अगर असम में तैनात होता है, तो उसे स्थानीय राजनीति और प्रशासन को समझने में वास्तविक पेशेवर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. ये केवल दफ्तर की असुविधाएं नहीं हैं, बल्कि प्रभावी शासन में गंभीर बाधाएं हैं.
एक स्थानीय वैकल्पिक व्यवस्था
एक अहम लेकिन अक्सर अनदेखा पहलू राज्य सिविल सेवाओं या पीसीएस का विस्तार है. भारतीय राज्यों में वरिष्ठ प्रशासनिक पदों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा पीसीएस अधिकारियों की पदोन्नति से भरा जाता है. ये अधिकारी पूरी तरह स्थानीय होते हैं, पूरी तरह राज्य की राजनीति में रचे-बसे होते हैं और अखिल भारतीय ढांचे से पूरी तरह स्वतंत्र होते हैं.
जहां 2026 की कैडर नीति 25 राज्य कैडरों के लिए आवंटन तय करती है, वहीं समानांतर राज्य नौकरशाहियां अलग नियमों के तहत काम करती हैं, जिनमें कोई अखिल भारतीय आयाम नहीं होता. किसी टॉप रैंक वाले आईएएस अधिकारी को अगर होम कैडर नहीं मिलता, तो वह देखता है कि उसी राज्य में स्थानीय पीसीएस अधिकारी, जो संभव है कम प्रतिभाशाली हों और निश्चित रूप से कम कठोर चयन प्रक्रिया से आए हों, सत्ता और प्रभाव मजबूत करते जा रहे हैं. ऐसे में आईएएस अधिकारी की असफलता केवल व्यक्तिगत निराशा नहीं रह जाती, बल्कि यह संकेत बन जाती है कि अखिल भारतीय सेवा का सिद्धांत संस्थागत रूप से स्थानीय प्रशासन की तुलना में कम मूल्यवान हो सकता है. यह विडंबना एकीकृत सेवाओं के संवैधानिक उद्देश्य को कमजोर करती है.
इनसाइडर-आउटसाइडर बहस क्यों बनी रहेगी
कोई भी कैडर आवंटन नीति इनसाइडर-आउटसाइडर विवाद को खत्म नहीं कर सकती. 2026 की प्रणाली 2017 की जोनल व्यवस्था की तुलना में थोड़ी अधिक पारदर्शी है. लेकिन दोनों की समस्या एक जैसी है. ये नौकरशाही आवंटन तो तय करती हैं, लेकिन उस राजनीतिक चिंता को नहीं छूतीं, जो नाराजगी को जन्म देती है. जब तक अन्य राज्यों के अधिकारी राज्यों में वरिष्ठ पदों पर बने रहेंगे, और जब तक उच्च मेरिट वाले गृह राज्य के उम्मीदवार प्रशासनिक संयोगों के कारण अपने ही कैडर में जगह पाने में असफल होते रहेंगे, तब तक यह तनाव बना रहेगा.
सिंह का बयान अनुचित था, लेकिन इसलिए गूंजा क्योंकि उसने एक वास्तविक संरचनात्मक हताशा को सामने रखा.
निष्कर्ष: प्रक्रियात्मक सुधार की सीमाएं
2026 की कैडर आवंटन नीति वास्तविक प्रक्रियात्मक सुधार लेकर आती है. लेकिन ये सुधार उस मूल संवैधानिक विसंगति को हल नहीं कर सकते. अखिल भारतीय सेवा व्यवहार में राज्य-आधारित है, जहां मेरिट आधारित चयन ऐसे प्रशासनिक संयोगों से बंधा है, जिन पर उम्मीदवारों का कोई नियंत्रण नहीं होता.
कोई उच्च रैंक वाला सामान्य श्रेणी का उम्मीदवार, जिसे अनारक्षित रिक्ति न होने के कारण होम कैडर नहीं मिलता, उसकी शिकायत जायज है. यह नीति इसका जवाब नहीं देती. पुरानी नीति ने भी नहीं दिया. और कोई भी नीति, जो मौजूदा कैडर संरचना को स्वीकार करती है, यह जवाब नहीं दे पाएगी.
वास्तविक समाधान, जैसे पारदर्शी मेरिट आधारित प्रतिनियुक्ति, अनिवार्य अंतर-राज्य पोस्टिंग और वरिष्ठ पदों के लिए वास्तविक प्रतिस्पर्धा, के लिए ऐसी राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए जो संघवाद को ही चुनौती दे. इसके तहत राज्य की स्वायत्तता को राष्ट्रीय एकीकरण के आदर्शों के अधीन करना होगा. ऐसे दौर में, जब राज्य केंद्र के हस्तक्षेप का विरोध करते हैं, जब गठबंधन राजनीति क्षेत्रीय सरकारों को मजबूत बनाती है, और जब अधिकारी खुद होम स्टेट की स्थिरता पसंद करते हैं, ऐसे समाधान दूर की कौड़ी लगते हैं.
अखिल भारतीय सेवाएं आज भी आकांक्षा और वास्तविकता के बीच फंसी हुई हैं. जब तक इस मूल विरोधाभास को खुलकर स्वीकार नहीं किया जाता, तब तक कोई भी प्रक्रियात्मक बदलाव उन पीड़ित अधिकारियों को वह जवाब नहीं दे पाएगा, जिसकी वे तलाश कर रहे हैं.
के बी एस सिद्धू पंजाब के पूर्व आईएएस अधिकारी हैं और स्पेशल चीफ सेक्रेटरी के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं. उनका एक्स हैंडल @kbssidhu1961 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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