मुंबई: मंगलवार शाम महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार मंत्रालय में आराम से बैठे थे. कैबिनेट बैठक और उसके बाद कुछ अन्य बैठकों को निपटाने के बाद वह राज्य सचिवालय की छठी मंज़िल पर मौजूद पत्रकारों से हल्की-फुल्की बातचीत कर रहे थे. वह मुख्यमंत्री के कक्ष में आने-जाने वाले विधायकों से अपने खास अंदाज़ में मिल रहे थे, जिसमें हल्का-फुल्का मज़ाक था, लेकिन उसके पीछे गर्मजोशी छिपी थी.
उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (BJP) की विधायक मंदा म्हात्रे से कहा, “देखो मंदा ताई, पचपुते का छोटा बच्चा तुमसे भी बड़ा कमल लगाए घूम रहा है.” मंदा म्हात्रे पहले अविभाजित राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में कई साल ‘अजित दादा’ के साथ काम कर चुकी हैं, जैसा कि अजित पवार को लोकप्रिय रूप से कहा जाता था.
म्हात्रे ने दिप्रिंट से बात करते हुए बताया कि ‘पचपुते का पोर्गा’ से अजित पवार का मतलब बीजेपी नेता बाबनराव पचपुते के बेटे और श्रीगोंदा से विधायक विक्रम पचपुते से था. शुरुआती मज़ाक के बाद अजित पवार ने पचपुते के कारोबार और फैक्ट्री की प्रगति के बारे में भी पूछा.
मंदा म्हात्रे ने कहा, “मैंने उन्हें 20 जनवरी को मेरे जन्मदिन पर सुबह 7 बजे फोन करने के लिए भी धन्यवाद दिया, जैसा कि वह हर साल करते हैं. मैंने उनसे कहा था कि 20 जनवरी 2027 को भी मैं सुबह 7 बजे फोन के पास इंतज़ार करूंगी.”
दुर्भाग्य से, अब वह फोन कॉल कभी नहीं आएगा.
66 वर्षीय अजित पवार की बुधवार तड़के मौत हो गई, जब उनका निजी विमान उनके परिवार के गढ़ बारामती में क्रैश लैंडिंग के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हो गया. इस हादसे में चालक दल के दो सदस्य और दो अन्य कर्मी, जिनमें एक पर्सनल सिक्योरिटी ऑफिसर और एक अटेंडेंट शामिल थे, की भी मौत हो गई.
अजित पवार महाराष्ट्र के अब तक के सबसे लंबे समय तक उपमुख्यमंत्री रहने वाले नेता के रूप में जाने जाएंगे, हालांकि यह कार्यकाल लगातार नहीं रहा. उन्होंने छह बार यह पद संभाला. राज्य का नेतृत्व करने और मुख्यमंत्री बनने की उनकी इच्छा थी, लेकिन अब यह सपना अधूरा ही रह गया.
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा, “वह एक बेहतरीन वक्ता थे. आज महाराष्ट्र शोक में है. वह मुख्यमंत्री बनना चाहते थे. अगर वह मुख्यमंत्री बनते, तो महाराष्ट्र को एक अच्छा प्रशासक मिलता, लेकिन दुर्भाग्य से वह ऐसा नहीं कर पाए.”
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने अजित पवार को “दमदार” और “दिलदार” बताया, जबकि उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने उन्हें “रोकठोक” वाला नेता कहा, जो साफ-साफ बोलते थे और बात घुमाते नहीं थे.
मंत्रालय के नौकरशाह अजित पवार को सचिवालय में सबसे अच्छी उपस्थिति वाले राजनेता के रूप में याद करते हैं. जब तक वह काम के सिलसिले में बाहर नहीं होते थे, वह हर दिन सुबह 8 बजे अपने दफ्तर में मौजूद रहते थे. वह सुबह 6 बजे से ही लोगों को अपॉइंटमेंट के लिए बुलाने लगते थे और कई बार सुबह 5 या 6 बजे ही मैदानी दौरों का कार्यक्रम तय कर देते थे. उनके साथ काम करने वाले अफसरों को भी बहुत जल्दी दिन शुरू करने की आदत पड़ गई थी.
2024 के विधानसभा चुनाव से पहले दिप्रिंट से बात करते हुए, तब मुख्यमंत्री और अब उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा था, “अजित दादा, देवेंद्रजी और मैं मिलकर सरकार को 24X7 चलाते हैं.”
शिंदे ने कहा था, “अजित दादा सुबह की शिफ्ट संभालते हैं, देवेंद्रजी दिन में रहते हैं और मैं रात की शिफ्ट संभालता हूं,” जो देर रात तक काम करने की उनकी आदत को दर्शाता है.
‘अजित दादा’ नाम का व्यक्तित्व
अजित पवार सार्वजनिक जीवन में अपने चाचा शरद पवार या चचेरी बहन सुप्रिया सुले से बिल्कुल अलग थे.
गंभीर भौंहें, तीखे शब्द और समर्थकों को रूखे अंदाज़ में टाल देना, यह सब ‘अजित दादा’ के व्यक्तित्व का हिस्सा था.
उनका अब तक का सबसे विवादित बयान, “क्या खाली बांध भरने के लिए मैं पेशाब करूं,” अप्रैल 2013 में उस समय आया था, जब परेशान किसान उनसे पानी की भारी कमी की शिकायत कर रहे थे. यह टिप्पणी उनके इसी स्वभाव की वजह से हुई एक बड़ी चूक थी. बाद में उन्होंने “लोगों की भावनाएं आहत करने” के लिए माफी मांगी थी.
उनकी बेबाक और देहाती बोलने की शैली के कारण वह कई बार विवादों में फंसते रहे. पिछले साल उन्होंने अवैध रेत खनन के खिलाफ कार्रवाई कर रही युवा आईपीएस अधिकारी अंजना कृष्णा को फटकार लगाई थी. सोलापुर के एक गांव में अवैध मिट्टी खनन के खिलाफ कार्रवाई के दौरान फोन पर हुई बातचीत का वीडियो वायरल हुआ था.
फोन पर अजित पवार ने कथित तौर पर कहा था, “इतना आपको डेरिंग हुआ क्या. मैं तेरे ऊपर एक्शन लूंगा,” जबकि अंजना कृष्णा यह कहते हुए सुनी गई थीं, “मुझे कैसे पता कि फोन पर सच में उपमुख्यमंत्री ही हैं.”
उस समय पार्टी नेताओं ने अजित पवार का बचाव करते हुए कहा था कि यह सिर्फ “उनका बोलने का अंदाज़” है.
पिछले साल ही मराठवाड़ा में बाढ़ से फसल गंवाने वाले एक किसान पर झुंझलाने को लेकर भी उन्हें आलोचना झेलनी पड़ी थी.
उपमुख्यमंत्री धाराशिव ज़िले के भूम-परंडा तालुका के एक गांव में बाढ़ प्रभावित किसानों से मिल रहे थे. जब एक किसान ने पूछा कि क्या सरकार कर्ज़ माफी की घोषणा करेगी, तो उन्होंने कहा, “क्यों न इन्हें ही मुख्यमंत्री बना दें. क्या आपको लगता है कि हमें समझ नहीं है. क्या हम यहां गोटियां खेलने आए हैं. मैं सुबह 6 बजे से काम कर रहा हूं. आप काम कर रहे लोगों की आवाज़ दबाने की कोशिश कर रहे हैं.”
उनके करीबी NCP नेताओं का कहना है कि उन्होंने कटु शब्दों के पीछे छिपे इंसान को भी देखा है.
एक NCP नेता ने एक बार गुजराती थाली खाते हुए दिप्रिंट से कहा था, “असल में अजित दादा उतने ही मीठे हैं, जितना मेरी प्लेट में रखा आम रस.”
अजित पवार की राजनीतिक यात्रा
अजित पवार ने 1991 में राजनीति में कदम रखा. उसी साल वे पुणे जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष चुने गए.
इसी वर्ष उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर बारामती से लोकसभा चुनाव जीता. बाद में उन्होंने यह सीट अपने चाचा के लिए छोड़ दी और उसी साल बारामती से विधायक का चुनाव लड़ा. तब से अब तक वे इसी विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते आ रहे हैं.
शुरुआती दौर में, जब पवार परिवार से राजनीति में केवल अजित पवार ही थे, तब उन्हें परिवार का उत्तराधिकारी माना जाने लगा था. यह धारणा 2006 में सुप्रिया सुले के राजनीति में आने के बाद कमजोर पड़ी.
अजित पवार धीरे-धीरे पार्टी में ऊपर बढ़ते गए. वे पहले कनिष्ठ मंत्री बने, फिर कैबिनेट मंत्री और फिर उपमुख्यमंत्री बने. उन्होंने कांग्रेस, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना, एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना और अब बीजेपी के साथ सरकारों में यह पद संभाला.
अगर अविभाजित एनसीपी के संस्थापक शरद पवार को प्रधानमंत्री पद का संभावित दावेदार कहा जाता था, तो उनके भतीजे अजित पवार, जिन्होंने खुले तौर पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने की इच्छा जताई थी, मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदार माने जाते थे.
वे इस पद के सबसे करीब शायद 2004 में पहुंचे, जब एनसीपी ने महाराष्ट्र में 71 सीटें जीतीं और कांग्रेस को 69 सीटें मिलीं. इसके बावजूद एनसीपी ने मुख्यमंत्री पद का दावा छोड़ दिया और कुछ अहम मंत्रालयों पर समझौता किया.
अजित पवार ने फरवरी 2024 में मराठी टीवी चैनल आईबीएन लोकमत को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि यह उनकी पार्टी के नेताओं की गलत गणना थी.
अजित पवार के पूरे राजनीतिक जीवन पर सबसे गहरा दाग शायद 70,000 करोड़ रुपये के सिंचाई घोटाले के आरोप थे. आरोप था कि जल संसाधन मंत्री रहते हुए बांध निर्माण के ठेकों की लागत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई गई. इन आरोपों के चलते उन्हें 2012 में महाराष्ट्र मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा. दिसंबर 2019 में महाराष्ट्र भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने उन्हें इस मामले में क्लीन चिट दे दी.
बागी भतीजा
कहा जाता है कि पुणे के शनिवार वाड़ा की दीवारों में आज भी कुछ रातों में ‘काका मला वाचवा’ यानी ‘चाचा, मुझे बचाओ’ की आवाज गूंजती है.
1700 के दशक में महाराष्ट्र ने चाचा-भतीजे के सबसे क्रूर संघर्षों में से एक देखा था. सत्ता के लालच में रघुनाथराव ने अपने भतीजे और नौवें पेशवा नारायणराव की हत्या की साजिश रची थी और मदद की उसकी गुहार अनसुनी कर दी थी.
सत्ता की यह लड़ाई आधुनिक राजनीति में भी दिखी, हालांकि वह इतनी हिंसक नहीं थी. महाराष्ट्र की राजनीति में कई चाचा-भतीजे के टकराव देखे गए हैं. जैसे बाल ठाकरे और राज ठाकरे, गोपीनाथ मुंडे और धनंजय मुंडे, और शरद पवार और अजित पवार.
2006 से ही शरद पवार की राजनीतिक विरासत को लेकर पवार परिवार में मतभेद की चर्चाएं चल रही थीं. उसी साल सुप्रिया सुले ने बारामती लोकसभा सीट के उपचुनाव से राजनीति में औपचारिक एंट्री की थी. बारामती पवार परिवार का गढ़ माना जाता है.
हालांकि उत्तराधिकार को लेकर असहजता 2019 तक खुलकर सामने नहीं आई.
2019 में 22 नवंबर की रात करीब 11 बजे तक अजित पवार, तब की अविभाजित शिवसेना और कांग्रेस के नेताओं के साथ थे. उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में महा विकास आघाड़ी सरकार बनाने की योजना तय हो चुकी थी. लेकिन 23 नवंबर की तड़के, जब अभी अंधेरा था, राजभवन से अजित पवार की तस्वीरें सामने आईं और सब चौंक गए.
अजित पवार ने भाजपा के साथ मिलकर 72 घंटे की सरकार बनाई. इसके बाद, एक-एक करके वे एनसीपी विधायक, जिन्होंने पहले उनका समर्थन किया था, शरद पवार के खेमे में लौट गए. इसके बाद अजित पवार भी एमवीए में वापस आए. तमाम आशंकाओं के बावजूद उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाया गया.
फिर 2023 में अजित पवार ने खुलकर बगावत कर दी. वे शरद पवार के नेतृत्व वाली पार्टी से अलग हो गए और एनसीपी के अधिकांश विधायकों को अपने साथ ले गए. उन्होंने खुद को असली एनसीपी बताया और भाजपा तथा शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ महायुति में शामिल हो गए. उन्होंने इस सरकार में भी उपमुख्यमंत्री पद संभाला. पहले शिंदे के नेतृत्व में और फिर 2024 के विधानसभा चुनाव के बाद देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में.
खुली बगावत के तुरंत बाद अपनी पहली ताकत दिखाते हुए अजित पवार ने शरद पवार के नेतृत्व वाली पार्टी में खुद को लेकर महसूस की गई असुरक्षाओं को साफ तौर पर बयान किया.
महायुति में उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद पार्टी की पहली बैठक में उन्होंने कहा, “हम किसी और के पेट से पैदा हुए, इसमें हमारी क्या गलती है.”
उन्हें यह साबित करना था कि महाराष्ट्र में एनसीपी के कार्यकर्ताओं और मतदाताओं पर उनका नियंत्रण है. साथ ही पवार परिवार के गढ़ बारामती पर भी, जो दोनों एनसीपी के लिए सबसे अहम सीट है. इसके लिए उन्होंने अपनी पत्नी सुनेत्रा पवार को राजनीति में उतारा और 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें अपनी चचेरी बहन सुप्रिया सुले के खिलाफ मैदान में उतारा. सुनेत्रा यह चुनाव हार गईं. बाद में उन्हें राज्यसभा सांसद बनाया गया.
बारामती के लोग बंटे हुए थे, इसलिए उन्होंने यथास्थिति को चुना. उन्होंने सांसद के रूप में सुले को और विधायक के रूप में अजित पवार को चुना. 2024 के अंत में हुए विधानसभा चुनाव में अजित पवार ने अपने भतीजे युगेंद्र पवार को हराया.
उसी चुनाव में अजित पवार ने शरद पवार की एनसीपी पर अपनी पार्टी की बढ़त भी साफ तौर पर साबित की. उनकी एनसीपी ने जिन 54 सीटों पर चुनाव लड़ा, उनमें से 41 सीटें जीतीं. वहीं शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी को सिर्फ 10 सीटें मिलीं.
उस चुनाव में अजित पवार एक बिल्कुल नए अंदाज में नजर आए. वे प्याज के रंग की गुलाबी जैकेट पहनते दिखे, लोगों से हाथ मिलाते दिखे और सोशल मीडिया के लिए रील्स बनाते नजर आए.
दिप्रिंट से बात करते हुए मुंबई के एक राजनीतिक सलाहकार ने कहा, “2014 में, जब मोदी लहर पूरे देश में थी और सोशल मीडिया नया-नया था, अजित दादा ने मुझे एक बार सुबह 6 बजे हमेशा की तरह अपने सरकारी बंगले पर बुलाया और सोशल मीडिया के बारे में पूछा. मैंने उन्हें कुछ सुझाव दिए. इसके बाद एक और बैठक हुई. लेकिन फिर अजित दादा ने कहा कि उन्हें इन सब पर भरोसा नहीं है और उन्हें इसकी जरूरत नहीं है.”
उन्होंने आगे कहा, “दस साल बाद वही अजित दादा मीडिया में प्रचार और ब्रांडिंग के लिए पूरी एजेंसी रखने लगे.”
अजित पवार की राजनीतिक यात्रा
अजित पवार ने 1991 में राजनीति में कदम रखा. उसी साल वे पुणे जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष चुने गए.
इसी वर्ष उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर बारामती से लोकसभा चुनाव जीता. बाद में उन्होंने यह सीट अपने चाचा के लिए छोड़ दी और उसी साल बारामती से विधायक का चुनाव लड़ा. तब से अब तक वे इसी विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते आ रहे हैं.
शुरुआती दौर में, जब पवार परिवार से राजनीति में केवल अजित पवार ही थे, तब उन्हें परिवार का उत्तराधिकारी माना जाने लगा था. यह धारणा 2006 में सुप्रिया सुले के राजनीति में आने के बाद कमजोर पड़ी.
अजित पवार धीरे-धीरे पार्टी में ऊपर बढ़ते गए. वे पहले कनिष्ठ मंत्री बने, फिर कैबिनेट मंत्री और फिर उपमुख्यमंत्री बने. उन्होंने कांग्रेस, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना, एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना और अब भाजपा के साथ सरकारों में यह पद संभाला.
अगर अविभाजित एनसीपी के संस्थापक शरद पवार को प्रधानमंत्री पद का संभावित दावेदार कहा जाता था, तो उनके भतीजे अजित पवार, जिन्होंने खुले तौर पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने की इच्छा जताई थी, मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदार माने जाते थे.
वे इस पद के सबसे करीब शायद 2004 में पहुंचे, जब एनसीपी ने महाराष्ट्र में 71 सीटें जीतीं और कांग्रेस को 69 सीटें मिलीं. इसके बावजूद एनसीपी ने मुख्यमंत्री पद का दावा छोड़ दिया और कुछ अहम मंत्रालयों पर समझौता किया.
अजित पवार ने फरवरी 2024 में मराठी टीवी चैनल आईबीएन लोकमत को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि यह उनकी पार्टी के नेताओं की गलत गणना थी.
अजित पवार के पूरे राजनीतिक जीवन पर सबसे गहरा दाग शायद 70,000 करोड़ रुपये के सिंचाई घोटाले के आरोप थे. आरोप था कि जल संसाधन मंत्री रहते हुए बांध निर्माण के ठेकों की लागत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई गई. इन आरोपों के चलते उन्हें 2012 में महाराष्ट्र मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा. दिसंबर 2019 में महाराष्ट्र भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने उन्हें इस मामले में क्लीन चिट दे दी.
बागी भतीजा
कहा जाता है कि पुणे के शनिवार वाड़ा की दीवारों में आज भी कुछ रातों में ‘काका मला वाचवा’ यानी ‘चाचा, मुझे बचाओ’ की आवाज गूंजती है.
1700 के दशक में महाराष्ट्र ने चाचा-भतीजे के सबसे क्रूर संघर्षों में से एक देखा था. सत्ता के लालच में रघुनाथराव ने अपने भतीजे और नौवें पेशवा नारायणराव की हत्या की साजिश रची थी और मदद की उसकी गुहार अनसुनी कर दी थी.
सत्ता की यह लड़ाई आधुनिक राजनीति में भी दिखी, हालांकि वह इतनी हिंसक नहीं थी. महाराष्ट्र की राजनीति में कई चाचा-भतीजे के टकराव देखे गए हैं. जैसे बाल ठाकरे और राज ठाकरे, गोपीनाथ मुंडे और धनंजय मुंडे, और शरद पवार और अजित पवार.
2006 से ही शरद पवार की राजनीतिक विरासत को लेकर पवार परिवार में मतभेद की चर्चाएं चल रही थीं. उसी साल सुप्रिया सुले ने बारामती लोकसभा सीट के उपचुनाव से राजनीति में औपचारिक एंट्री की थी. बारामती पवार परिवार का गढ़ माना जाता है.
हालांकि उत्तराधिकार को लेकर असहजता 2019 तक खुलकर सामने नहीं आई.
2019 में 22 नवंबर की रात करीब 11 बजे तक अजित पवार, तब की अविभाजित शिवसेना और कांग्रेस के नेताओं के साथ थे. उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में महा विकास आघाड़ी सरकार बनाने की योजना तय हो चुकी थी. लेकिन 23 नवंबर की तड़के, जब अभी अंधेरा था, राजभवन से अजित पवार की तस्वीरें सामने आईं और सब चौंक गए.
अजित पवार ने बीजेपी के साथ मिलकर 72 घंटे की सरकार बनाई. इसके बाद, एक-एक करके वे एनसीपी विधायक, जिन्होंने पहले उनका समर्थन किया था, शरद पवार के खेमे में लौट गए. इसके बाद अजित पवार भी एमवीए में वापस आए. तमाम आशंकाओं के बावजूद उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाया गया.
फिर 2023 में अजित पवार ने खुलकर बगावत कर दी. वे शरद पवार के नेतृत्व वाली पार्टी से अलग हो गए और एनसीपी के अधिकांश विधायकों को अपने साथ ले गए. उन्होंने खुद को असली एनसीपी बताया और भाजपा तथा शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ महायुति में शामिल हो गए. उन्होंने इस सरकार में भी उपमुख्यमंत्री पद संभाला. पहले शिंदे के नेतृत्व में और फिर 2024 के विधानसभा चुनाव के बाद देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में.
खुली बगावत के तुरंत बाद अपनी पहली ताकत दिखाते हुए अजित पवार ने शरद पवार के नेतृत्व वाली पार्टी में खुद को लेकर महसूस की गई असुरक्षाओं को साफ तौर पर बयान किया.
महायुति में उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद पार्टी की पहली बैठक में उन्होंने कहा, “हम किसी और के पेट से पैदा हुए, इसमें हमारी क्या गलती है.”
उन्हें यह साबित करना था कि महाराष्ट्र में एनसीपी के कार्यकर्ताओं और मतदाताओं पर उनका नियंत्रण है. साथ ही पवार परिवार के गढ़ बारामती पर भी, जो दोनों एनसीपी के लिए सबसे अहम सीट है. इसके लिए उन्होंने अपनी पत्नी सुनेत्रा पवार को राजनीति में उतारा और 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें अपनी चचेरी बहन सुप्रिया सुले के खिलाफ मैदान में उतारा. सुनेत्रा यह चुनाव हार गईं. बाद में उन्हें राज्यसभा सांसद बनाया गया.
बारामती के लोग बंटे हुए थे, इसलिए उन्होंने यथास्थिति को चुना. उन्होंने सांसद के रूप में सुले को और विधायक के रूप में अजित पवार को चुना. 2024 के अंत में हुए विधानसभा चुनाव में अजित पवार ने अपने भतीजे युगेंद्र पवार को हराया.
उसी चुनाव में अजित पवार ने शरद पवार की एनसीपी पर अपनी पार्टी की बढ़त भी साफ तौर पर साबित की. उनकी एनसीपी ने जिन 54 सीटों पर चुनाव लड़ा, उनमें से 41 सीटें जीतीं. वहीं शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी को सिर्फ 10 सीटें मिलीं.
उस चुनाव में अजित पवार एक बिल्कुल नए अंदाज में नजर आए. वे प्याज के रंग की गुलाबी जैकेट पहनते दिखे, लोगों से हाथ मिलाते दिखे और सोशल मीडिया के लिए रील्स बनाते नजर आए.
दिप्रिंट से बात करते हुए मुंबई के एक राजनीतिक सलाहकार ने कहा, “2014 में, जब मोदी लहर पूरे देश में थी और सोशल मीडिया नया-नया था, अजित दादा ने मुझे एक बार सुबह 6 बजे हमेशा की तरह अपने सरकारी बंगले पर बुलाया और सोशल मीडिया के बारे में पूछा. मैंने उन्हें कुछ सुझाव दिए. इसके बाद एक और बैठक हुई. लेकिन फिर अजित दादा ने कहा कि उन्हें इन सब पर भरोसा नहीं है और उन्हें इसकी जरूरत नहीं है.”
उन्होंने आगे कहा, “दस साल बाद वही अजित दादा मीडिया में प्रचार और ब्रांडिंग के लिए पूरी एजेंसी रखने लगे.”
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