मैनपुरी, उत्तर प्रदेश: ‘आज़ाद’ नाम होने के बावजूद मैनपुरी के आज़ाद खान ने अपनी ज़िंदगी के 25 अहम साल जेल में बिताए. उन्हें साल 2000 में हुई एक डकैती के मामले में पुख्ता सबूत न होने के बावजूद एक विशेष अदालत ने उम्रकैद की सज़ा सुना दी थी.
पिछले साल दिसंबर में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उन्हें आखिरकार बरी कर दिया. लेकिन ज़मानत बॉन्ड के लिए 7,000 रुपये न होने की वजह से उन्हें एक और दर्दनाक महीना जेल में बिताना पड़ा.
आज़ाद पिछले हफ्ते 23 जनवरी की रात को जेल से बाहर आए. बरेली की एक एनजीओ ‘छोटी सी आशा’ ने उनकी ज़मानत की राशि जमा कराई.
51 वर्षीय आज़ाद ने दिप्रिंट से कहा, “मैं बेगुनाह था, लेकिन इसे साबित करने में पूरी ज़िंदगी लग गई. अब मैं सरकार से मुआवज़ा और नौकरी चाहता हूं.”
इन सालों में उन्होंने अपना परिवार खो दिया. उनके माता-पिता की मौत हो गई और भाई-बहन अपनी-अपनी राह चले गए. परिवार के सदस्यों ने दिप्रिंट को बताया कि आज़ाद को इस मामले में झूठा फंसाया गया था.
उनके भाई मस्तान के मुताबिक, आज़ाद गांव की रंजिश का शिकार हुए और 29 अक्टूबर 2000 की रात मैनपुरी के ब्यौंती कटरा गांव में ओम प्रकाश के घर हुई डकैती में शामिल नहीं थे.
मस्तान ने कहा, “मेरा भाई 25 साल बाद घर लौट रहा है. हमारा दर्द अब भी जारी है. वह अब 50 साल से ज़्यादा उम्र का है, लेकिन कुपोषण की हालत की वजह से शारीरिक काम नहीं कर सकता. उसका न कोई जीवनसाथी है, न रहने का ठिकाना और न ही खेती के लिए कोई ज़मीन है.”
उन्होंने कहा, “सरकार को बेहद गरीब लोगों की मदद के लिए चल रही योजनाओं के तहत उसे घर और संपत्ति उपलब्ध करानी चाहिए.”
आज़ाद के भतीजे सोहेल खान ने भी दावा किया कि आज़ाद को डकैती के मामले में झूठा फंसाया गया था. उन्होंने बताया कि आज़ाद पांच भाइयों में सबसे छोटा था और 2000 में गिरफ्तारी के समय दिल्ली में दर्ज़ी का काम करता था. उस पर डकैती का आरोप लगाया गया था.
उन्होंने कहा कि परिवार ने उसे रिहा कराने के लिए कानूनी खर्च पर काफी पैसा लगाया, लेकिन हर बार केस हारते रहे. आखिरकार उन्होंने कोशिश करना बंद कर दिया.

25 साल की पीड़ा
आज़ाद के खिलाफ मुकदमे की शुरुआत मई 2001 में एक विशेष अदालत में हुई. अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि आज़ाद ने डकैती में हिस्सा लिया था, लेकिन सबूत सिर्फ आरोपी के एक कथित “कबूलनामे” तक सीमित थे. न तो कोई गवाह था, न उंगलियों के निशान मिले और न ही कोई हथियार बरामद हुआ.
फरवरी 2002 में विशेष न्यायाधीश ने आज़ाद को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 395 (डकैती) और 397 (डकैती के दौरान घातक हथियार का इस्तेमाल) के तहत उम्रकैद की सज़ा सुनाई. पहले उन्हें फतेहगढ़ जेल में रखा गया और बाद में बरेली सेंट्रल जेल भेज दिया गया.
आज़ाद ने इस फैसले के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपील की. मामला दो दशकों से भी ज़्यादा समय तक चलता रहा.
आखिरकार 19 दिसंबर 2025 को जस्टिस जे जे मुनीर और संजीव कुमार की बेंच ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने दोषसिद्धि और उम्रकैद की सज़ा सुनाने से पहले सबूतों का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया था.
हाई कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष, आज़ाद के कथित कबूलनामे और एक पुलिस कांस्टेबल की गवाही के अलावा, ऐसा कोई सबूत पेश नहीं कर सका जिससे संदेह से परे उसकी दोषसिद्धि साबित हो सके. अदालत ने यह भी कहा कि ये गवाहियां दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 313 के कानूनी मानकों पर खरी नहीं उतरतीं. इसके बाद अदालत ने आज़ाद को बरी करते हुए उसकी रिहाई का आदेश दिया.
हालांकि इसके बावजूद वह पिछले हफ्ते तक जेल में बंद रहा. इसकी वजह यह थी कि CrPC की धारा 473A के तहत बरी किए गए व्यक्ति को रिहाई से पहले ज़मानत बॉन्ड और ज़मानती प्रस्तुत करने होते हैं.
आज़ाद के वकील मुकुल कुमार के अनुसार, जेल अधीक्षक ने कहा कि रिहाई के लिए ज़मानत बॉन्ड ज़रूरी है, लेकिन आज़ाद के पास इसके लिए पैसे नहीं थे.
जब सारी उम्मीदें खत्म होती दिखीं, तब एक एनजीओ ने हस्तक्षेप किया. संस्था की पारुल मलिक और रूपाली गुप्ता ने ज़मानत बॉन्ड के लिए 7,000 रुपये जमा किए और ज़रूरी कागज़ी कार्रवाई पूरी की. इसके बाद आधी रात को आज़ाद खान को उनके भाई मस्तान की सुपुर्दगी में दिया गया.
मुकुल कुमार ने कहा कि कई कैदी अपर्याप्त सबूत, सही कानूनी मदद न मिल पाने और मामलों की समय पर सुनवाई न होने के कारण लंबे समय तक जेल में रहते हैं. कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि गलत तरीके से दोषी ठहराए गए लोगों के लिए मुआवज़े की नीति होनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट पहले भी ऐसे मामलों में मुआवज़ा देने का आदेश दे चुका है.
रिहाई के बाद आज़ाद लोगों की नज़र से दूर रह रहे हैं. उनके रिश्तेदारों ने बताया कि वह अपने गांव में खाली पड़ी ज़मीन पर घर बनाने के लिए सरकार से मदद की उम्मीद कर रहे हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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