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Sunday, 25 January, 2026
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मार्क्सवाद सत्ता में आते ही लोकतांत्रिक अधिकारों को खत्म कर देता है: एमए वेंकट राव

लिबर्टेरियन कमेंटेटर एमए वेंकट राव ने 1963 में लिखा था कि क्लास वॉर पर आधारित होने के कारण, मार्क्सवाद पर आधारित कोई भी राज्य खुद को दूसरे सभी देशों के खिलाफ, कड़े और पूरी तरह से विरोध में खड़ा कर लेगा.

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ब्रिटेन जैसे पश्चिमी देशों सहित दुनियाभर के समस्त देशों में तमाम ऐसे भले लोग हैं जो साम्यवाद को एक ऐसे मानवतावादी नैतिक आंदोलन के रूप में देखते हैं जो सामाजिक न्याय की अवधारणाओं का प्रसार करता है और सामाजिक चेतना को जागृत करता है. इसके अलावा, वे इसे ऐसे लोकतांत्रिक दलों के समान मानते हैं जो सुविचारित नीतियों, पुनर्वितरणात्मक न्याय और आर्थिक पुनर्गठन के लिए ईमानदार प्रचार के माध्यम से सत्ता प्राप्त करना चाहते हैं, ताकि समाज के वंचित वर्ग को बेहतर अवसर मिल सके. अधिकांश सहयात्री भोलेभाले होते हैं और साम्यवादी आंदोलन से जुड़ने के दुष्परिणामों से अनजान होते हैं. वे नहीं जानते हैं कि एक सामान्य लोकतांत्रिक पार्टी होने से कहीं अधिक, यह प्राथमिक तौर पर सिर्फ अपने लिए राजनीतिक सत्ता हथियाने और एकदलीय सर्वसत्तावादी तानाशाही स्थापित करने की साजिश है, जो सत्ता मिलते ही लोकतांत्रिक अधिकारों को समाप्त कर देती है.

इसके अलावा, बहुत-से भले लोग यह भी नहीं जानते हैं कि उनके बीच मौजूद कम्युनिस्ट पार्टी की प्राथमिक निष्ठा अपने राष्ट्र और देश के बजाय अंतरराष्ट्रीय साम्यवाद के प्रति होती है. वे भारत में दिल्ली के बजाय मास्को के निर्देशों का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध रहते हैं. कुछ भारतीय कम्युनिस्टों के मन में केवल यही दुविधा रहती है कि मास्को और पीकिंग में से किसका अधिकार उन पर अधिक है.

कम्युनिस्टों का यह दृष्टिकोण स्वयं कार्ल मार्क्स के सिद्धांत और व्यवहार में निहित है.

प्रतीत होता है कि कुछ ऐसे समाजवादी लोग, इस विषय के विद्यार्थियों और मार्क्स, लेनिन, स्टालिन की मूल कृतियों तथा रूसी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में आयोजित विश्व कांग्रेसों के प्रस्तावों से परिचित लोगों को यह अजीब लगेगा, यह मानते हैं कि लेनिन और स्टालिन जैसे रूसी क्रांति के नेताओं और उनके द्वारा स्थापित तथा आगे बढ़ाए गए तंत्र, आज ख्रुश्चेव द्वारा, के कार्यों के लिए कार्ल मार्क्स किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं हैं.

द इंडियन लिबर्टेरियन के 1 जून 1963 के अंक में श्रीमती गुडमैन, सचिव, ओवरसीज़ कॉन्टैक्ट्स, द सोशलिस्ट स्टैंडर्ड, लंदन, के हस्ताक्षर से प्रकाशित एक पत्र में यह दावा किया गया कि ग्रेट ब्रिटेन की सोशलिस्ट पार्टी ने 1917 में रूस में स्थापित व्यवस्था और उसके बाद से उसके संचालन के लिए मार्क्स को सिद्धांत, उपदेश और उदाहरण के आधार पर सभी प्रकार की जिम्मेदारियों से मुक्त माने जाने को स्वीकार कर लिया था.

यह स्वीकार करना होगा कि इंग्लैंड में क्रांतिकारी साम्यवाद की अपेक्षा क्रमिक, विकासवादी, साम्यवाद या समाजवाद का प्रभाव अधिक रहा. ब्रिटिश समाजवादी मुख्यतः फैबियन समाजवादी थे, जो मतपेटी के माध्यम से समाजवाद लागू करने के लिए क्रमिक और शिक्षात्मक तरीकों में विश्वास रखते थे. स्वयं मार्क्स ने एक बार स्वीकार किया था कि संभवतः ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका में, और हॉलैंड में भी, शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक तरीके से परिचर्चा के माध्यम से समाजवाद, अर्थात् पूंजीपति वर्ग के उन्मूलन, को साकार किया जा सकता है.

लेकिन उनका यह भी मत था कि अधिक संभावना इसी बात की है कि पूंजीपति वर्ग अपने विशेषाधिकारों को बचाने के लिए मतपेटी के निर्णय को स्वीकार करने के बजाय हथियार उठा लेगा.

हिंसा के प्रश्न पर मार्क्स सदा अस्पष्ट रहे, पर उन्होंने इसे कभी नकारा नहीं. क्रांति के हित में आवश्यकता पड़ने पर हिंसा के प्रयोग में उन्हें कोई संकोच नहीं था.

डॉ. कार्ल पॉपर ने अपनी महत्वपूर्ण दो-खंडीय कृति “द ओपन सोसाइटी एंड इट्स एनिमीज़” में इन सभी बिंदुओं पर मार्क्स के भाषणों में उतार-चढ़ाव का विस्तार से विश्लेषण किया है, जिससे सहयात्रियों के लिए मार्क्सवादी क्रांतिकारी विचारों के खतरों के प्रति अज्ञान या मासूमियत का कोई बहाना शेष नहीं रहता.

अब, श्री एटली की सरकार, जो समाजवादी स्वरूप की थी, ने भी अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से का राष्ट्रीयकरण किया—जिसे “अर्थव्यवस्था की कमांडिंग हाइट्स” कहा गया—जैसे सड़क परिवहन, रेलवे, वायु संचार, इस्पात, बैंक ऑफ इंग्लैंड और अन्य कई संस्थाएँ. इस नीति ने व्यक्ति की अपनी समझ के अनुसार पूंजी निवेश करने की स्वतंत्रता को सीमित कर दिया.

परिणामस्वरूप भारी मुद्रास्फीति, ऊंची कीमतें, उत्पादन में कमी, पूंजी का विदेश पलायन, पूंजीगत वस्तुओं में अपर्याप्त निवेश आदि देखने को मिले. नतीजा यह है कि आज इंग्लैंड की उत्पादन-दर इटली और जर्मनी से भी कम है.

इसके विपरीत, पश्चिम जर्मनी में डॉ. एरहार्ड द्वारा निर्भीक रूप से अपनाई गई मुक्त प्रतिस्पर्धा की नीति ने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की और उस देश को यूरोप में पुनरुत्थानशील आर्थिक विकास और समृद्धि के मामले में अग्रणी बना दिया.

समाजवादी ब्रिटेन ने काफी हद तक मार्क्सवादी अर्थशास्त्र अपनाया और उससे स्पष्ट रूप से नुकसान उठाया.

समाजवादी रूस ने इसी मार्क्सवादी अर्थव्यवस्था को और अधिक पूर्णता से अपनाया, किंतु वहाँ उत्पादन-दर में जो भी सफलता दिखाई देती है, वह अभूतपूर्व दमन, अनुशासनबद्ध नियंत्रण, बल प्रयोग और भय-प्रदर्शन से दूषित है. अंतर केवल सापेक्ष स्वतंत्रता का है, पर आर्थिक विफलता की जड़ वही नीति है–अर्थव्यवस्था का मार्क्सवादी केंद्रीकरण और उसका राजनीतिक सत्ता से एकीकरण.

क्रांति प्राप्त करने का साधन हो या समाजवाद स्थापित हो जाने के बाद उसे बनाए रखने का विषय, हिंसा को लेकर मार्क्स अनैतिक रूप से तटस्थ थे. इसलिए लेनिन और स्टालिन ने जब दैनिक प्रशासन कार्य में बल प्रयोग—आतंक के शासन—को लागू किया तो वे केवल अपने गुरु के कथनों और उनकी भावना का ही पालन कर रहे थे.

1956 में मास्को में विश्व की कम्युनिस्ट पार्टियों की बीसवीं कांग्रेस में ख्रुश्चेव द्वारा किए गए खुलासे, जिसमें केवल स्टालिन की अपने ही सरकारी और पार्टी अधीनस्थों के प्रति की गई क्रूरताओं तक सीमित थे, ने कम्युनिस्ट गुट को हिला दिया और पूरे विश्व को चौंका दिया. वहां सामान्य रूसी नागरिकों—अज्ञात व्यक्तियों, साधारण कम्युनिस्ट नागरिक—उनकी गरिमा, उनके व्यक्तिगत और संपत्ति के अधिकारों प्रति कोई चिंता नहीं दिखाई गई; जिन्हें मुक्त विश्व मौलिक अधिकार मानता है.

यदि ख्रुश्चेव स्टालिन से कम आतंकवादी प्रतीत होते हैं, तो इसका कारण केवल यह है कि वे वैसा करने का साहस नहीं कर सकते. उनकी सत्ता उतनी सुरक्षित और सुदृढ़ नहीं थी जितनी स्टालिन की थी.

स्टालिन द्वारा लाखों लोगों का सफाया करना, उदाहरणार्थ सहकारी और राज्य कृषि को सुरक्षित करने के लिए लगभग अस्सी लाख किसानों का संहार, केवल मात्रा का अंतर है; यह मार्क्स के सिद्धांतों से परे नहीं जाता.

यदि ब्रिटिश लोकतंत्र मानव व्यक्तित्व की पवित्रता के प्रति अधिक सम्मान दिखाता है, तो इसका कारण ब्रिटेन का वह आठ सौ वर्षें का इतिहास है जिसमें अंग्रेज जनता ने अपने शासक वर्ग से संघर्ष कर अपने एक स्वतंत्र नागरिक अधिकार स्थापित किए. वे अधिकार न तो मार्क्स की देन हैं और न किसी समाजवादी की.

1945–50 के दौरान ब्रिटेन में हुए समाजवादी प्रयोग ने समाजवादियों के बीच भी प्रतिक्रिया और पुनर्विचार को जन्म दिया है. क्रॉसमैन, ब्रिटिश लेबर पार्टी के प्रमुख विचारक सांसद, द्वारा संपादित न्यू फैबियन सोशलिस्ट एसेज़ में “नए निरंकुशवाद” और लेबर शासन के दौरान फली-फूली विशाल नौकरशाही के अतिक्रमणों की चर्चा है. यही वह पतले सिरे वाली कील है जिससे समय के साथ स्वतंत्रता रिस-रिस कर समाप्त हो सकती है. समाजवाद में लोकतंत्र को क्षति पहुँचाने की अंतर्निहित प्रवृत्ति होती है, क्योंकि यह राजनीतिक और आर्थिक, दोनों शक्तियों को सरकार के हाथों में केंद्रित कर देता है, अर्थात् उसी पार्टी और शासक समूह के हाथों में. स्वतंत्र समाज की स्वस्थ विशेषता, आर्थिक, कानूनी, राजनीतिक, धार्मिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक आदि विभिन्न अर्ध-स्वतंत्र या पूर्णतः स्वतंत्र समूहों में शक्ति का वितरण, समाजवादी शासन में लुप्त हो जाती है और समाज शक्ति व निष्ठा के मामले में कठोर रूप से एकरूप, एकात्मक बन जाता है.

मार्क्स द्वारा लोकप्रिय बनाया गया एक अन्य दृष्टिकोण, जो स्वतंत्र निर्णय और चरित्र के लिए खतरनाक है, वह है संस्कृति का आर्थिक निर्धारण या सत्य की वर्ग-आधारित व्युत्पत्ति. इस मत में संस्कृति की अधिरचना आर्थिक आधार द्वारा निर्धारित होती है, जो स्वयं उत्पादन में संपत्ति-स्वामित्व के ढाँचे, उत्पादन संबंधों, से निर्धारित होती है. यहाँ मार्क्स अपनी युक्तिवादी भावना और पद्धति को छोड़कर सत्य, विज्ञान, दर्शन और संस्कृति के प्रति सापेक्षतावादी दृष्टिकोण अपना लेते हैं. तब सत्य वर्ग-दर-वर्ग भिन्न होगा. अर्थात् वस्तुनिष्ठ, सार्वभौमिक और अनिवार्य सत्य जैसी कोई चीज़ नहीं रहेगी.

यदि ऐसा है, तो फासिज्म और साम्यवाद, मार्क्स और हिटलर में कोई अंतर ही नहीं रह जाता है. फिर पूंजीपति वर्ग को दोष क्यों दिया जाए यदि वे कम्युनिस्ट गिरोहों को कुचलने के लिए हथियार उठा लें. जब मार्क्स यह घोषणा करते हैं कि मुख्य बात इतिहास को समझना नहीं, बल्कि उसे बदलना है, तब वे स्वयं वस्तुनिष्ठ सत्य की खोज को त्याग देते हैं.

मार्क्स का एक और सिद्धांत अंतरराष्ट्रीयतावाद था. वे सर्वहारा के अंतरराष्ट्रीयतावाद में विश्वास करते थे और राष्ट्रवाद का खंडन करते थे.

पर अंतरराष्ट्रीयतावाद के भी भिन्न-भिन्न रूप हो सकते हैं. एक रूप ऐसा हो सकता है जो राष्ट्रों को एक सामाजिक इकाई के रूप में मान्यता दे और उन्हें लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई तथा लोकतांत्रिक ढंग से संचालित अपनी सरकार के अंतर्गत अपने सामाजिक मामलों का संचालन करने का अधिकार दे.

ऐसी लोकतांत्रिक राष्ट्रीय सरकारें—छोटी हों या बड़ी—आपसी सहयोग से एक विश्व महासंघ स्थापित कर सकती हैं, जिसमें न्यूनतम पुलिस शक्तियां हों और एक विश्व न्यायालय हो जो अंतरराष्ट्रीय संबंधों तक सीमित विश्व कानून की व्याख्या करे. आंतरिक मामलों को स्थानीय स्वायत्तता पर छोड़ दिया जाए.

वर्तमान संयुक्त राष्ट्र संगठन को इसी दिशा में सुधारा जाए या समाप्त कर उसके स्थान पर नया संगठन बनाया जाए. तब तक राष्ट्र सामूहिक सुरक्षा के आधार पर आगे बढ़ें—सभी राष्ट्र एक संधि में बंधें कि यदि किसी एक पर आक्रमण हो तो सभी उसकी रक्षा के लिए आगे आएं.

परंतु मार्क्स का अंतरराष्ट्रीयतावाद विद्यमान राष्ट्रीय संरचनाओं के उन्मूलन और सभी देशों के उन वर्गों तथा मध्यवर्गों के विरुद्ध शत्रुता पर आधारित है जिन्हें वह नेतृत्वकारी वर्ग नहीं मानते. यह वर्ग-संघर्ष पर आधारित है, जो पूर्णतः अनावश्यक और मिथ्या सिद्धांत है—यहूदियों पर गैर-यहूदियों द्वारा किए गए उत्पीड़न की नस्ली स्मृति से उत्पन्न सार्वभौमिक घृणा से अधिक प्रेरित है, मार्क्स यहूदी वंश से थे.

वर्ग-संघर्ष पर आधारित होने के कारण, मार्क्सवाद पर आधारित कोई भी राज्य अनिवार्य रूप से अन्य सभी राष्ट्रों के विरुद्ध कटु और सर्वव्यापी विरोध की स्थिति में आ जाएगा. यही हम सोवियत रूस और उसकी विचारधारा अपनाने वाले कम्युनिस्ट राष्ट्रों, जैसे चीन, में देखते हैं.

इसलिए वे तब तक सुरक्षित महसूस नहीं कर सकते जब तक वे पूरे विश्व को जीत न लें. विभिन्न कम्युनिस्ट राज्यों के बीच अंतर केवल गति, पद्धति और युद्ध-रणनीति के समय निर्धारण का है.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अंतरराष्ट्रीय साम्यवाद तथा सोवियत शक्तियों—रूस और चीन—की एजेंट के रूप में अपनी वास्तविक स्थिति को छिपा रही है. उसे देशभक्त के रूप में मान्यता देकर और कम्युनिस्ट राज्यों से बातचीत की जिम्मेदारी सौंपकर सम्मान दिलाया जा रहा है. यह तो हद ही है.

यह लेख सेंटर फ़ॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इस लेख का प्रकाशन मूलरूप से 1 अगस्त 1963 को “द इंडियन लिबर्टेरियन” पत्रिका में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


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