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Sunday, 25 January, 2026
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मुंबई-ठाणे से बाहर शिंदे गुट की शिवसेना का असर घटा, सहयोगी बीजेपी ने बढ़ाई पकड़

नगर निकाय चुनावों में भाई-भतीजावाद, नेतृत्व की अनुपस्थिति और कैडर के कमजोर होने से शिंदे की शिवसेना सिमटकर एमएमआर तक रह गई, जबकि मजबूत संगठन और संसाधनों के दम पर बीजेपी ने शहरी महाराष्ट्र में बढ़त बनाई.

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मुंबई: शिवसेना के चुनाव चिन्ह पर बना बाघ कभी पूरे महाराष्ट्र में दहाड़ता था. आज उसके निशान हल्के पड़ते दिख रहे हैं. 15 जनवरी को हुए नगर निगम चुनावों ने एक चिंताजनक सच्चाई सामने रख दी—मुंबई महानगर क्षेत्र (एमएमआर) के बाहर, एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना राज्य सरकार में अपने ही सहयोगी बीजेपी के सामने ज़मीन खोती जा रही है.

इस महीने महाराष्ट्र की 29 नगर निगमों में हुए चुनावों में बीजेपी ने कुल 2,869 में से 1,400 सीटें जीत लीं, जबकि शिवसेना (शिंदे) को केवल 399 सीटें मिलीं और वह काफी पीछे दूसरे स्थान पर रही.

इन 399 सीटों में से चौंकाने वाली बात यह है कि 250 सीटें—यानी 62 प्रतिशत, सिर्फ ठाणे बेल्ट और मुंबई से आईं. इस सुरक्षित दायरे से बाहर, वह पार्टी जिसने पिछले साल लोकसभा और विधानसभा चुनावों में, और हालिया नगर परिषद चुनावों में भी ठीक-ठाक प्रदर्शन किया था, नगर निगम चुनावों में संघर्ष करती दिखी.

जिन क्षेत्रों में शिंदे ने लोकसभा और विधानसभा चुनावों के दौरान मजबूत प्रदर्शन किया था—छत्रपति संभाजीनगर, नासिक, परभणी, सोलापुर, वहां नगर निगम चुनावों में पार्टी का असर काफी कम हो गया.

यह गिरावट उस गुट के लिए हैरान करने वाली थी, जिसने 2024 में लड़े गए 15 लोकसभा सीटों में से 7 सीटें जीती थीं और उसी साल 81 में से 58 विधानसभा सीटें हासिल की थीं. इसमें कोंकण-रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग और कोल्हापुर के साथ-साथ पारंपरिक मराठवाड़ा गढ़ में भी जीत शामिल थी.

2014 से 2018 के बीच अविभाजित शिवसेना के प्रदर्शन से तुलना भी अहम है. उस समय, संयुक्त शिवसेना ने पूरे राज्य में 2,700 में से 489 नगर निगम सीटें जीती थीं और बीजेपी की 1,099 सीटों के बाद दूसरे स्थान पर रही थी.

इस साल हुए नगर निगम चुनावों में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) को कुल 155 सीटें मिलीं.

ज़मीनी हकीकत

राजनीतिक विश्लेषक जयदेव डोले के मुताबिक, हालिया नगर निगम चुनावों में शिंदे शिवसेना के कमज़ोर प्रदर्शन की एक बड़ी वजह उम्मीदवारों के चयन और संसाधनों के गलत इस्तेमाल में रही.

उन्होंने कहा, “कई विधायकों और सांसदों ने अपने रिश्तेदारों को टिकट दे दिए, जिससे वे प्रचार के लिए दूसरी जगह जा ही नहीं पाए. उन्होंने अपनी पूरी ताकत अपने बेटे-बेटियों को जिताने में लगा दी. नतीजा यह हुआ कि बाकी इलाकों में संसाधनों पर ध्यान ही नहीं दिया गया.”

डोले ने बताया कि संगठनात्मक कमजोरियां इससे भी गहरी हैं, जहां बीजेपी का वोट बैंक पूरी तरह सुरक्षित रहा और उसने सभी संसाधनों का असरदार इस्तेमाल किया—यहां तक कि विरोधियों को कमज़ोर भी किया—वहीं शिंदे गुट के नेताओं के पास “कोई ठोस एजेंडा नहीं था और न ही ऐसे दमदार वक्ता थे जो माहौल बदल सकें.”

राजनीतिक विश्लेषक संजय पाटिल ने दिप्रिंट से बातचीत में इस अंतर को ढांचागत कारणों से जोड़ा. उन्होंने कहा कि बीजेपी, एक बड़ी पार्टी होने और व्यापक हिंदुत्व अपील के कारण, अपने वोट आधार को लगातार मजबूत कर रही है, जबकि शिवसेना राज्य में सिर्फ कुछ बिखरे इलाकों तक ही सीमित रह गई है.

पाटिल ने कहा, “एमएमआर के बाहर शिवसेना का कोई मजबूत संगठनात्मक ढांचा नहीं है. एकनाथ शिंदे के अलावा उनके पास कोई बड़ा नेता नहीं है.” उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय पार्टी होने के कारण बीजेपी की मजबूत अपील उसे न सिर्फ विपक्ष, बल्कि सहयोगी दलों के वोट भी काटने में मदद करती है.

नगर निगम चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन, उससे एक महीने पहले हुए नगर परिषद और नगर पंचायत चुनावों से अलग रहा, जहां शिंदे गुट ने 288 में से 53 अध्यक्ष पद जीते थे. उन चुनावों में पार्टी ने सोलापुर, छत्रपति संभाजीनगर, रायगढ़, नासिक और कोंकण जिलों में अच्छा प्रदर्शन किया था.

पाटिल ने फर्क समझाते हुए कहा कि नगर परिषदें छोटे और संभालने योग्य इलाके होती हैं, जहां पार्टी के 50 से ज्यादा विधायक अपना प्रभाव बेहतर ढंग से डाल पाए.

उन्होंने कहा, “शिवसेना के पास 50 से ज्यादा विधायक हैं और परिषद चुनावों में वे छोटे इलाकों पर फोकस कर सके. वहां वे अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल कर पाए, जिससे पार्टी को फायदा हुआ, लेकिन नगर निगम बड़े शहर होते हैं और वहां बीजेपी का शहरी वोटरों पर ज्यादा असर है.”

मुंबई के बाहर, एक वार्ड में मतदाताओं को चार बार वोट डालना पड़ा क्योंकि वार्डों को छोटे हिस्सों में बांटा गया था. पाटिल ने कहा, “इसलिए लोगों ने उन्हें वोट दिया जिन्हें चारों में जीतने की ज्यादा संभावना लगी, और इसी वजह से वे बीजेपी की ओर झुके.”

छत्रपति संभाजीनगर: एक चेतावनी

सबसे ज्यादा गिरावट छत्रपति संभाजीनगर (पहले औरंगाबाद) में देखने को मिली. 2017 में, अविभाजित शिवसेना 115 सदस्यीय निगम में 29 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी. उसके बाद AIMIM को 25 और बीजेपी को 22 सीटें मिली थीं.

2026 में तस्वीर पूरी तरह बदल गई. बीजेपी 57 सीटों पर पहुंच गई, AIMIM को 33 सीटें मिलीं, शिंदे शिवसेना सिर्फ 13 सीटों पर सिमट गई और शिवसेना यूबीटी को छह सीटें मिलीं.

शिंदे शिवसेना के जिला प्रमुख राजेंद्र जंजाल ने दिप्रिंट से कहा कि पार्टी ज़मीन पर कमज़ोर हुई और नतीजे उम्मीद से बिल्कुल उलट रहे. उन्होंने कहा कि बीजेपी को भी करीब 30 सीटों की उम्मीद थी, लेकिन वह 57 जीत गई.

जंजाल ने कहा, “हमें उम्मीद थी कि बीजेपी के साथ गठबंधन होगा, इसलिए हमने पूरी तैयारी नहीं की. बाद में जब गठबंधन घोषित नहीं हुआ, तो आखिरी समय में उम्मीदवार ढूंढने पड़े और पूरी रणनीति फिर से बनानी पड़ी.”

उन्होंने बीजेपी पर विधायकों के फंड के गलत इस्तेमाल का आरोप लगाया, लेकिन आंतरिक समस्याओं को भी स्वीकार किया—खासतौर पर नेताओं के बीच आपसी खींचतान, रिश्तेदारों को टिकट देना और एक-दूसरे के खिलाफ प्रचार करना.

उन्होंने कहा, “हमारी पार्टी नेताओं की पार्टी बन गई, ज़मीनी कार्यकर्ताओं की नहीं, हमें विधायकों और सांसदों की बात माननी पड़ी और इसी वजह से हमारा संगठन कमजोर हुआ. शिवसेना जो कभी कैडर आधारित थी, अब वैसी नहीं रही.”

उन्होंने आगे कहा, “अगर हम कैडर आधारित पार्टी बने रहते, तो बीजेपी से अलग भी हो सकते थे. आगे के लिए पार्टी का पुनर्गठन बेहद ज़रूरी है. इसके अलावा, शिवसेना यूबीटी ने भी हमारे वोट काटे और वोट बंटवारे का नुकसान हमें सीटों में हुआ.”

सोलापुर: नेतृत्व की कमी, संसाधनों का फर्क

सोलापुर की 102 सीटों वाली नगर निगम में बीजेपी ने 87 सीटें जीतकर बड़ी बढ़त बना ली, जो पहले 49 थीं. वहीं शिंदे शिवसेना सिर्फ चार सीटों पर सिमट गई, जबकि अविभाजित शिवसेना ने पहले 21 सीटें जीती थीं.

एक स्थानीय पदाधिकारी ने कहा कि शिंदे और अन्य शीर्ष नेताओं ने अपना पूरा ध्यान ठाणे और मुंबई क्षेत्र पर ही लगाया, जिससे जिला उपेक्षित रह गया. बीजेपी ने अलग चुनाव लड़ा, जबकि शिंदे शिवसेना और एनसीपी (अजित पवार गुट) ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा. तालमेल की कमी के चलते दोनों सहयोगी दलों ने कम से कम 20 सीटों पर एक-दूसरे के खिलाफ उम्मीदवार उतार दिए.

पदाधिकारी ने कहा, “न तो शिंदे और न ही अजित पवार ने सोलापुर में कोई रैली या भाषण दिया.”

उन्होंने बताया कि शिंदे एमएमआर में ही अटके रहे और अजित पवार पुणे और आसपास तक सीमित रहे.

उन्होंने कहा, “इसके अलावा, सोलापुर में बीजेपी के तीन विधायक हैं, इसलिए फंड का अच्छा वितरण हुआ, जो हमारी पार्टी के साथ नहीं था.”

बीजेपी की जिला प्रमुख रोहिणी तडवलकर ने कहा कि पार्टी ने ज़मीनी स्तर पर बेहतर तालमेल के साथ काम किया, जिसका नतीजा मिला.

उन्होंने कहा, “हमारे पास कोई बड़ा स्टार प्रचारक नहीं था, लेकिन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की एक बड़ी रैली हुई, जिससे हमें फायदा हुआ. इस बार हमने बिना किसी सहयोगी के चुनाव लड़ा, जिससे कई कार्यकर्ताओं को मौका मिला और उन्होंने पूरे जोश से काम किया.”

उन्होंने कहा, “यह भविष्य में ‘शत-प्रतिशत’ बीजेपी की दिशा में एक कदम है.”

उन्होंने आगे कहा कि एयरपोर्ट हो या अन्य विकास कार्य, संरक्षक मंत्री जयकुमार गोरे और फडणवीस ने पर्याप्त फंड जारी किए.

जयदेव डोले ने मराठवाड़ा और आसपास के इलाकों पर बात करते हुए कहा कि जब बीजेपी और शिवसेना दोनों के विधायक और मंत्री मौजूद हों, तो जिस मंत्री का कद और विभाग बड़ा होता है, उसी के पास ज्यादा फंड जाता है.

उन्होंने कहा, “इस तरह का फंड वितरण चुनावी रणनीति पर बड़ा असर डालता है और क्षेत्र में नेताओं की लोकप्रियता को भी प्रभावित करता है.”

नासिक: पकड़ बनी रही, लेकिन गिरावट साफ

नासिक में भी, जहां शिवसेना (शिंदे) ने एनसीपी (अजित पवार गुट) के साथ मिलकर चुनाव लड़ा, नतीजे गिरावट की ओर इशारा करते हैं. हालांकि, यह अन्य नगर निगमों जितनी तेज़ नहीं थी. 122-सदस्यीय निगम में बीजेपी ने अपनी सीटें 66 से बढ़ाकर 72 कर लीं, जबकि शिंदे शिवसेना 2017 की 35 सीटों से घटकर 26 पर आ गई.

बीजेपी के नासिक जिला प्रमुख सुनील केदार ने पार्टी विधायकों की मौजूदगी को फंड के बेहतर इस्तेमाल का कारण बताया.

उन्होंने कहा, “सबसे अहम बात यह रही कि हमारा ज़मीनी कैडर मजबूत और एकजुट रहा. हम हमेशा लोगों के बीच रहते हैं और उन्हें विकास कार्य दिखाते हैं.”

उन्होंने बताया कि स्थानीय इकाई अकेले चुनाव लड़ना चाहती थी, लेकिन शीर्ष नेतृत्व के निर्देश पर शिवसेना और एनसीपी (एपी) से बातचीत की गई. केदार ने कहा, “हम अकेले जाना चाहते थे क्योंकि 122 सीटों के लिए हमारे पास 1,200 इच्छुक उम्मीदवार थे. गठबंधन में जाना हमारे लिए फायदेमंद नहीं होता.”

आगे की राह

2022 में शिवसेना के विभाजन के बाद, एकनाथ शिंदे को महायुति सरकार 1.0 में महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनाया गया और उन्होंने ठाणे क्षेत्र से बाहर अपना आधार बढ़ाने की कोशिश की. लोकसभा चुनावों में छत्रपति संभाजीनगर, नासिक, ठाणे, परभणी और बुलढाणा में जीत और बाद में विधानसभा चुनावों में इन इलाकों के साथ कोंकण-रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग और कोल्हापुर में सफलता से यह लगा कि गुट पूरे राज्य में अपनी पकड़ बना रहा है.

नगर परिषद चुनावों ने भी इस धारणा को मजबूत किया. लेकिन नगर निगम चुनावों ने इस विस्तार की सीमाएं उजागर कर दी हैं.

ठाणे बेल्ट—ठाणे, कल्याण-डोंबिवली, नवी मुंबई और उल्हासनगर और मुंबई में मिले नतीजों का श्रेय शिंदे के व्यक्तिगत संबंधों, प्रशासनिक कामकाज और मजबूत स्थानीय नेटवर्क को दिया जा रहा है, लेकिन पार्टी को अपने नेटवर्क और असर को बढ़ाने के लिए इससे कहीं ज्यादा करना होगा, खासकर तब जब सामने एक ताकतवर बीजेपी है, जो अपने छोटे सहयोगी के लिए ज़मीन छोड़ने के मूड में नहीं दिखती.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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