डीडवाना-कुचामन: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि भारत का दायित्व है कि वह दुनिया को केवल भाषणों या किताबों से नहीं, बल्कि अपने आचरण के माध्यम से मर्यादा सिखाए. उन्होंने कहा कि किताबों का ज्ञान और भाषण सुनना जरूरी है, लेकिन सही सीख व्यक्ति के व्यवहार से ही पूरी होती है.
डीडवाना-कुचामन जिले के छोटी खाटू कस्बे में ‘मर्यादा महोत्सव’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि आचरण और जीवन जीने की सही पद्धति शाश्वत है. यह बात हजार साल पहले भी कही गई थी और आगे भी प्रासंगिक रहेगी, हालांकि समय और परिस्थितियां बदलती रहती हैं.
उन्होंने कहा कि भारत के पूर्वज यह जानते थे कि भले ही लोग अलग-अलग दिखते हों, लेकिन मूल रूप से सभी एक हैं. इसी भावना से जीवन जीने पर मर्यादा अपने आप जीवन का हिस्सा बन जाती है. उन्होंने इस सिद्धांत को ‘धर्म’ बताया और कहा कि यही धर्म संसार को चलाता है.
भागवत ने कहा कि बाकी दुनिया इस सत्य को पूरी तरह नहीं समझ पाई, लेकिन हमारे पूर्वजों ने इसे पहचाना था. उन्होंने कहा कि जब सभी को अपना माना जाता है, तभी गरिमा और मर्यादा का भाव स्वतः विकसित होता है.
इससे पहले 18 जनवरी को एक अन्य कार्यक्रम में आरएसएस प्रमुख ने कहा था कि धर्म समस्त अस्तित्व को दिशा देता है और जैसे अग्नि जलाती है और जल बहता है, वैसे ही धर्म जीवन को संचालित करता है. उन्होंने यह भी कहा कि मनुष्य ईश्वर का कार्य करता है, लेकिन वह स्वयं ईश्वर नहीं है. भागवत के अनुसार, जब तक धर्म भारत का मार्गदर्शन करता रहेगा, तब तक देश ‘विश्वगुरु’ बना रहेगा.
