बेंगलुरु, 22 जनवरी (भाषा) केंद्र द्वारा कर्नाटक के साथ कथित अन्याय और मनरेगा को निरस्त कर उसके स्थान पर ‘वीबी- जी राम जी’ योजना लागू करना, उन विवादित बिंदुओं में से थे जिनके कारण राज्यपाल थावरचंद गहलोत और राज्य सरकार के बीच गतिरोध उत्पन्न हुआ, और अंततः बृहस्पतिवार को राज्यपाल के अभिभाषण को लेकर विवाद खड़ा हो गया।
राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने बृहस्पतिवार को यहां राज्य विधानमंडल के संयुक्त सत्र में अपना परंपरागत अभिभाषण केवल तीन वाक्यों (सरकार द्वारा तैयार किए गए विस्तृत भाषण के पहले और आखिरी वाक्यों समेत) में समाप्त कर दिया जिसे लेकर मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की।
मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने राज्यपाल पर अपना खुद का विचार व्यक्त करने का आरोप लगाया और उन्हें केंद्र सरकार की ‘‘कठपुतली’’ करार दिया।
राज्य सरकार द्वारा तैयार किए गए संबोधन में 122 अनुच्छेद थे और आपत्ति मुख्य रूप से उनमें से 10 अनुच्छेदों को लेकर थी।
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार चाहती थी कि राज्यपाल केंद्र की नीतियों की आलोचना करने वाले इन 10 अनुच्छेदों को पढ़ें।
राज्यपाल के अभिभाषण में कहा गया कि राज्य को कर हस्तांतरण, केंद्र प्रायोजित योजनाओं और विशेष योजनाओं में अन्याय का सामना करना पड़ा है।
राज्य सरकार द्वारा मीडिया को आधिकारिक तौर पर जारी किए गए अभिभाषण में कहा गया है, ‘‘केंद्र सरकार को इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में अग्रणी भूमिका निभाने वाले कर्नाटक को आर्थिक रूप से दबाने से पूरे देश पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।’’
सरकार और लोक भवन के बीच विवाद का असली मुद्दा नया ग्रामीण रोजगार कानून ‘विकसित भारत – जी राम जी’ प्रतीत होता है।
राज्य की सत्ताधारी कांग्रेस ने इसे ‘वीबी ग्राम जी’ कह कर संबोधित किया, जबकि इसका नाम ‘वीबी-जी राम जी’ होना चाहिए था।
राज्यपाल के आधिकारिक अभिभाषण में कहा गया है कि मनरेगा को निरस्त कर केंद्र सरकार ने ग्रामीण दिहाड़ी मजदूरों, छोटे किसानों और महिलाओं को रोजगार और बेरोजगारी भत्ते के उनके अधिकारों से वंचित कर दिया है।
इसमें कहा गया, ‘‘मेरी सरकार इस प्रगति-विरोधी कदम की कड़ी निंदा करती है। मनरेगा को राष्ट्रव्यापी मान्यता प्राप्त थी और यह प्रगति का प्रतीक था, लेकिन केंद्र सरकार ने इसे भुला दिया है।’’
भाषा शफीक अविनाश
अविनाश
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