प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पश्चिम बंगाल आना केवल चुनावों से ठीक पहले ही पसंद है. मोदी जब आते हैं, तो मुख्यधारा का मीडिया ढोल-नगाड़ों के साथ उनका स्वागत करता है—“भारी भीड़ वाली रैलियों” और जोशीले स्वागत के दृश्य लगातार दिखाए जाते हैं; बीजेपी की आईटी सेल के उत्साही कार्यकर्ता मोदी-केंद्रित हैशटैग तेज़ कर देते हैं और कमांडो दौड़ते हुए, लिमोज़ीन काफिलों की सुरक्षा के साथ पूरा तमाशा चलता है. मोदी, एक राजनीतिक पर्यटक की तरह, बंगाल केवल एक ही मिशन के साथ आते हैं: बंगाल सरकार पर हमला करना और उसके लोगों का अपमान करना.
2021 के विधानसभा चुनाव से पहले, मंच से गरजते हुए मोदी ने देश की उस समय की इकलौती महिला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का मज़ाक उड़ाया और कहा—“दीदी ओह दीदी.”
इस बार, विधानसभा चुनाव से पहले, मालदा की एक रैली में मोदी ने चिल्लाकर कहा कि बंगाल में “घुसपैठियों” को वोटर बनाया जा रहा है और “फूट डालने की राजनीति” पूर्वी भारत के सभी राज्यों की पहचान है. पिछले हफ्ते सिंगुर की एक रैली में मोदी ने फिर बंगाल के युवाओं को “घुसपैठियों” से सावधान रहने को कहा, जिन्हें टीएमसी कथित तौर पर “सुरक्षा” दे रही है.
ममता बनर्जी तीन बार की मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने बार-बार बंगाल के मतदाताओं का भरोसा जीता है: उन्होंने 2011 में 184 सीटें जीतीं, 2016 में 211 सीटों के साथ और बेहतर प्रदर्शन किया और 2021 के विधानसभा चुनाव में 215 सीटें जीतकर और भी बेहतर नतीजा हासिल किया.
इन जीतों को “घुसपैठियों” का नतीजा बताना, समझदार बंगाल मतदाता के जनादेश का बड़ा अपमान है—ऐसा मतदाता जो हमेशा शासन की ज़रूरतों और लोकतांत्रिक व सांस्कृतिक मूल्यों की समझ के आधार पर सोच-समझकर फैसला करता है. बंगाल का मतदाता ज़ोरदार समर्थन दे सकता है, लेकिन उतनी ही तेज़ी से अपना समर्थन वापस भी ले सकता है. वाम मोर्चे ने 2006 में तीन-चौथाई बहुमत के साथ बड़ी जीत दर्ज की थी, लेकिन सिर्फ पांच साल बाद वह पूरी तरह बिखर गया.
बंगाली पहचान का अपमान
बंगाल के मतदाता की समझ का कभी अपमान या कम आंकना नहीं चाहिए; लेकिन मोदी ठीक यही करते हैं. बंगाल के प्रति एक घमंडी पूर्वाग्रह मोदी सरकार की पहचान बन गया है—पूरे राज्य को हिंसक अराजकता की जगह बताकर बदनाम करना, “बंगाली” शब्द को चिढ़ाते हुए “बंगाली/बंगाली” कहना, बंगाल की सांस्कृतिक पहचान पर अजीब हमले करना, जैसे मशहूर फुटबॉल क्लब मोहन बागान को “मोहन बेगन” कहना या बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को “बंकिम दा” कहना, या “कोलकाता” शब्द को ठीक से न बोल पाना और उसे “कालकोट्टा” या “कोलकॉट्टो” जैसा बना देना—ये सब छिपा हुआ तिरस्कार, ताना मारने वाली हंसी और बंगाल की पहचान के प्रति आक्रामक बदतमीजी दिखाते हैं. चाहे इसे कितनी भी जल्दी ढकने या वापस लेने की कोशिश की जाए, बीजेपी और संघ परिवार की बंगाल-विरोधी सोच बार-बार सामने आ ही जाती है.
यहां बीजेपी की बंगाल-विरोधी सोच के दस उदाहरण दिए गए हैं.
1) मोदी और उनके भरोसेमंद नंबर दो, गृह मंत्री अमित शाह के लिए बंगाल का मतलब “घुसपैठिए” लगता है. घुसपैठिए, घुसपैठिए, घुसपैठिए—यही मोदी-शाह की रट है.
बंगाल के जीवंत समाज, उसकी जोशीली छात्र बिरादरी, उसकी समृद्ध सांस्कृतिक ज़िंदगी, प्रगतिशील महिला आंदोलन, प्रकाशन संस्थान, थिएटर समूह, बौद्धिक मंच, उद्योग संगठन, सक्रिय क्लब और संघ, जो मिलकर बंगाल की जीवंत नागरिक तस्वीर बनाते हैं—इन सबकी कोई कद्र नहीं की जाती.
घुसपैठियों की बात बार-बार दोहराकर, मोदी सरकार दरअसल अपनी ही राष्ट्रीय सुरक्षा की नाकामियों को उजागर करती है. आखिर सीमाओं की सुरक्षा केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी है. फिर “घुसपैठिए” इतनी बड़ी संख्या में कैसे आ रहे हैं? कश्मीर से दिल्ली तक सीमा-पार आतंकवाद को रोकने में मोदी सरकार क्यों नाकाम रही? सीमा सुरक्षा बल, जो सीधे गृह मंत्रालय के अधीन है, अपने कर्तव्य निभाने में क्यों विफल हो रहा है?
आंकड़े वास्तव में बंगाल में किसी तथाकथित “घुसपैठिया” बाढ़ को नहीं दिखाते. घुसपैठियों का शोर सिर्फ एक डर पैदा करने वाला बहाना है, ताकि पूरे राज्य और उसके लोगों को बदनाम और निशाना बनाया जा सके.
अगर सच में बंगाल इतना कानून-रहित और घुसपैठियों से भरा होता, तो क्या वह पश्चिमी देशों के अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों के लिए दूसरी सबसे ज्यादा देखी जाने वाली जगह बनता?
2) बीजेपी और संघ परिवार बंगला भाषा के प्रति लगातार तिरस्कार दिखाते हैं. पिछले साल दिल्ली पुलिस के एक सर्कुलर में बंगला बोलने वाले बंगाल के प्रवासी मजदूरों की भाषा को “बांग्लादेशी” भाषा कहा गया. बीजेपी की आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने दिल्ली पुलिस का समर्थन किया और कहा कि ‘बंगाली’ नाम की कोई भाषा ही नहीं है.
बंगला बोलने वाले प्रवासी मजदूरों को बीजेपी शासित राज्यों में गिरफ्तार किया गया और यहां तक कि बांग्लादेश भेज दिया गया. जैसे बंगला बोलना ही किसी को बाहरी और “बांग्लादेशी” होने के शक के दायरे में ला देता हो. संघ परिवार की हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान वाली सोच में बंगला बोलना राष्ट्र-विरोधी अपराध माना जाता है.
3) संसद में वंदे मातरम् पर बहस के दौरान, राष्ट्रीय गीत के 150 साल पूरे होने पर, बीजेपी वक्ताओं ने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचना पर दावा किया, लेकिन बंगाल की सांस्कृतिक हस्तियों का नाम ठीक से बोलने की भी ज़हमत नहीं उठाई. मोदी ने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को “बंकिम दा” कहा, केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने उन्हें “बंकिम दास चटर्जी” कहा और बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर ने दो बार वंदे मातरम् को “वंदे भारत” कहा.
4) इसी वंदे मातरम् बहस ने भारत के महान आधुनिक कवि और हमारे राष्ट्रगान के रचयिता रवींद्रनाथ टैगोर के बारे में भी अज्ञान दिखाया.
इतिहास की गलत बातें फैलाई गईं कि कांग्रेस ने गीत के कुछ हिस्से हटाए थे, जबकि सच यह है कि 1937 में खुद टैगोर की सलाह पर स्वतंत्रता आंदोलन की सभाओं में गाए जाने के लिए गीत को छोटा किया गया था.
बीजेपी सरकार ने हाल ही में मनरेगा कानून से ‘महात्मा’ गांधी शब्द हटा दिया और ग्रामीण रोज़गार से जुड़े इस कानून का नाम बदलकर नया मसौदा बनाया. गांधी को ‘महात्मा’ की उपाधि टैगोर ने ही दी थी, जिसे मोदी सरकार ने नज़रअंदाज़ किया.
यह इस बात से भी दिखता है कि मनरेगा का नाम बदलकर 2025 G-RAM G कानून लाने का जोश है. क्या आज कोई भी शीर्ष बीजेपी नेता टैगोर की किसी कविता का एक पैराग्राफ सुना सकता है? अब तक इसका कोई सबूत नहीं है.
5) मोदी के नेतृत्व वाला केंद्र बार-बार बंगाल के जायज़ और संविधान से तय फंड रोकता रहा है. आवास योजना का पैसा अटका है, मनरेगा का पैसा अटका है. केंद्र पर बंगाल के दो लाख करोड़ रुपये से ज्यादा बकाया है, जिसमें 52,000 करोड़ रुपये मनरेगा के हैं.
प्राकृतिक आपदाओं के समय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को ही जमीन पर मौजूद देखा जाता है—ज़रूरत के वक्त जनता के बीच, राहत और कल्याण कार्यों की खुद निगरानी करते हुए.
2016 में कोलकाता में एक पुल गिरने पर मोदी ने बेरहमी से इसे “ईश्वर की लीला” कहा, जबकि मुख्यमंत्री बनर्जी हादसे की जगह पर दिन-दिन भर बैठकर राहत और पुनर्निर्माण कार्य को आगे बढ़ाती रहीं.
6) बीजेपी और संघ परिवार बंगाल में महिलाओं के खिलाफ हुए अपराधों पर बार-बार राजनीति करते हैं.
बीजेपी ने संदेशखाली में “सामूहिक बलात्कार” की पूरी तरह झूठी कहानी गढ़ने की कोशिश की, दुर्गापुर हॉस्टल केस को राजनीतिक बनाया गया, लेकिन जब कुछ तथ्य सामने आए तो बीजेपी को पीछे हटना पड़ा. एनसीआरबी ने कोलकाता को लगातार चार साल देश का सबसे सुरक्षित शहर बताया है. 2023 में महिलाओं के खिलाफ अपराध की दर में यह देश में तीसरे नंबर पर सबसे कम था—केवल कोयंबटूर और चेन्नई से पीछे.
7) बीजेपी का बंगाल चेहरा सुवेंदु अधिकारी, बीजेपी की “वॉशिंग मशीन” राजनीति का बड़ा फायदा पाने वाला है. टीएमसी में रहते हुए भ्रष्टाचार और रिश्वत के मामलों में आरोपी रहे अधिकारी, 2021 में बीजेपी में शामिल होते ही अचानक “साफ-सुथरे” दिखने लगे और बीजेपी ने उन्हें बंगाल में “हिंदू” मुद्दे का नेता बनाकर पेश किया.
यह भी बंगाल के मतदाता के प्रति एक ठंडी, घमंडी और उपदेश देने वाली सोच दिखाता है. क्या बीजेपी सच में मानती है कि बंगाल की जनता को अधिकारी के पलटवार और उनके संदिग्ध रिकॉर्ड की जानकारी नहीं है?
8) जब कोई राज्य विकास में आगे बढ़ता है और कारोबार के लिए खुद को खोलता है, तो खुद को “विकसित भारत” बताने वाली बीजेपी को इसकी तारीफ करनी चाहिए. बंगाल ने फरवरी 2025 में बंगाल बिजनेस समिट आयोजित किया, कोलकाता एक आईटी हब के रूप में उभर रहा है, टाटा समूह का बंगाल में स्वागत किया गया है, और न्यू टाउन में नए-नए टाउनशिप वाम मोर्चा के वर्षों की सुस्ती से निकलकर उद्यमिता, पर्यटन और खुलेपन के नए दौर में जाने की राज्य सरकार की इच्छा दिखाते हैं. महिलाओं के नेतृत्व वाले एमएसएमई में बंगाल देश में नंबर एक है. फिर भी बीजेपी और उससे जुड़े मीडिया द्वारा की जाने वाली बदनाम करने और नाम लेकर कोसने की लगातार मुहिम में इन कोशिशों को कभी मान्यता नहीं मिलती.
9) बीजेपी की बंगाल-विरोधी सोच हिंदू-मुस्लिम को बांटने की उसकी खुली और गुप्त साजिशों में दिखती है.
बंगाल की विरासत अनोखे रूप से साझा और विविध है; नया जगन्नाथ मंदिर बना है, ईद और क्रिसमस खुले तौर पर मनाए जाते हैं, कोलकाता की दुर्गा पूजा को यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का दर्जा मिला है. जैसा कि ममता बनर्जी कहती हैं, “धर्मो जार जार, उत्सव शोबार”—हर किसी का अपना धर्म है, लेकिन त्योहार हम सब साथ मनाते हैं. बीजेपी की ध्रुवीकरण की कोशिशों के बावजूद समुदायों के बीच बंगाल की पुरानी दोस्ती और भाईचारा आज भी कायम है.
विविधता और साथ रहने की जड़ों वाले समाज में धार्मिक नफरत का ज़हर घोलना बंगाल के साथ बहुत बड़ा अन्याय है. खासकर इसलिए क्योंकि इस राज्य ने 18वीं सदी के अंत से 20वीं सदी की शुरुआत तक महान ‘बंगाल पुनर्जागरण’ देखा, जिसने पूरे राज्य में बहुलता, खुलेपन और सुधारवादी मूल्यों को फैलाया.
10) बीजेपी-संघ परिवार की बंगाल-विरोधी सोच का आखिरी और सबसे साफ उदाहरण ममता बनर्जी और बंगाल की महिला सार्वजनिक हस्तियों के खिलाफ उसके नेताओं द्वारा इस्तेमाल की गई बेहद पितृसत्तात्मक और महिला-विरोधी भाषा है.
एक महिला ज़मीनी नेता, जिसने संघर्ष के दम पर राजनीति की ऊंचाई तक पहुंच बनाई—तीन बार की मुख्यमंत्री, कई बार केंद्रीय मंत्री और सात बार की सांसद—ममता बनर्जी न सिर्फ भारत में बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में एक अनोखी राजनीतिक शख्सियत हैं, जहां बेनजीर भुट्टो से लेकर इंदिरा गांधी, सिरिमावो भंडारनायके से लेकर शेख हसीना तक, महिला नेताओं ने पुरुष पूर्वजों से नेतृत्व विरासत में पाकर पहचान बनाई.
ममता बनर्जी के कोई पुरुष मार्गदर्शक नहीं रहे. बल्कि, उन्होंने पुरुष-प्रधान नेटवर्क से बाधाएं और हाशिए पर धकेले जाने का सामना किया, और फिर पूरी तरह अपने दम पर एक सफल राजनीतिक पार्टी और आंदोलन खड़ा किया. भारतीय राजनीति की बेहद असमान दुनिया में महिला नेतृत्व वाला एक राजनीतिक स्टार्टअप—यह किसी चमत्कार से कम नहीं है.
बीजेपी की बंगाल-विरोधी सोच उसे बंगाल की पहचान और उपलब्धियों को देखने से अंधा कर देती है, लेकिन 2026 में मतदाता यह सुनिश्चित करेंगे कि बीजेपी की आंखें एक तेज़ी से विकसित होते, सुरक्षित, सौहार्दपूर्ण और सांस्कृतिक रूप से जीवंत राज्य की सच्चाई देख सकें.
लेखिका अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की सांसद (राज्यसभा) हैं. उनका एक्स हैंडल @sagarikaghose है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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