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Wednesday, 21 January, 2026
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10 साल में 56% से 274% तक: 2024-25 में BJP-कांग्रेस के चुनावी खर्च का अंतर कैसे बढ़ गया

चुनाव आयोग को दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, बीजेपी ने चुनाव और प्रचार पर 3,355 करोड़ रुपये खर्च किए, जो कांग्रेस के 896 करोड़ रुपये से कहीं ज्यादा हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि संसाधन फायदा देते हैं, लेकिन वोट की गारंटी नहीं होते.

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नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने 2024-25 में कांग्रेस से 274 प्रतिशत ज्यादा खर्च किया, जो पिछले दो लोकसभा चुनाव वर्षों की तुलना में बहुत बड़ा उछाल है. 2019-20 में यह अंतर 56 प्रतिशत था और 2014-15 में 59 प्रतिशत, जब कांग्रेस सत्ता में थी और चुनाव लड़ रही थी.

भारतीय चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में कांग्रेस ने चुनावों पर 896 करोड़ रुपये खर्च किए, जबकि बीजेपी ने ‘चुनाव और सामान्य प्रचार’ पर 3,355 करोड़ रुपये खर्च किए.

संसदीय चुनावों के अलावा, इस वित्त वर्ष में नौ विधानसभा चुनाव भी हुए—हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश और दिल्ली.

2019-20 में बीजेपी ने चुनावों पर 1,352 करोड़ रुपये खर्च किए थे, जबकि उसी वित्त वर्ष में कांग्रेस का खर्च 864 करोड़ रुपये था. उस साल 17वीं लोकसभा के चुनाव हुए थे, साथ ही आठ विधानसभा चुनाव भी हुए थे. वित्त वर्ष 2014-15 में बीजेपी ने चुनावों पर 925 करोड़ रुपये खर्च किए, जबकि कांग्रेस ने 582 करोड़ रुपये खर्च किए.

जहां कांग्रेस ने फंडिंग में बड़े अंतर को लेकर चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं, वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि पैसा ही अकेला फैसला करने वाला कारण नहीं है.

राजनीतिक विश्लेषक चंद्रचूड़ सिंह ने दिप्रिंट से कहा, “पहली नज़र में, क्योंकि बीजेपी शायद ज्यादा आक्रामक तरीके से चुनाव लड़ रही है और उसके पास ज्यादा पैसा है, इसलिए वह ज्यादा खर्च कर पा रही है, लेकिन यह देखना होगा कि खर्च किस तरह का है. सिर्फ ज्यादा खर्च करने से ही सवाल खड़े नहीं होते.”

उन्होंने कहा कि जब तक बीजेपी को मिलने वाला पैसा सही तरीकों से हासिल किया गया है, तब तक आलोचकों के लिए उंगली उठाना मुश्किल है.

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर चंद्रचूड़ सिंह ने कहा कि बीजेपी एक कॉरपोरेट संगठन की तरह काम करती है. उन्होंने कहा, “इसलिए चुनाव से ठीक पहले वह अपने संसाधनों को इकट्ठा कर पाती है, लोगों को जोड़ती है और उन्हें मैदान में भेजती है… बड़े पैमाने पर जन-मोबिलाइजेशन के लिए संसाधन चाहिए, जिनमें वित्तीय संसाधन भी शामिल हैं.”

हालांकि, सिंह ने यह भी कहा कि संसाधन बीजेपी को अपना नेटवर्क बढ़ाने में मदद करते हैं और इससे उसे चुनावी फायदा मिलता है, लेकिन उनका मानना है कि सिर्फ पैसा ही वोट नहीं दिलाता. “अगर ऐसा होता, तो बीजेपी कोई भी चुनाव नहीं हारती.”

पिछले साल के अंत में राज्यसभा में बोलते हुए कांग्रेस के कोषाध्यक्ष अजय माकन ने जिसे उन्होंने “लेवल प्लेइंग फील्ड” की कमी कहा, उस पर जोर दिया था.

उन्होंने बताया था कि बीजेपी का बैंक बैलेंस 2004 में 88 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024 में 10,107 करोड़ रुपये हो गया, जबकि कांग्रेस का उसी अवधि में 38 करोड़ रुपये से बढ़कर सिर्फ 133 करोड़ रुपये हुआ.

माकन ने कहा था, “2009 के बाद बीजेपी का बैंक बैलेंस 150 करोड़ रुपये था और कांग्रेस का 221 करोड़ रुपये, यानी 60:40 के अनुपात में कांग्रेस 1.47 गुना आगे थी.”

ग्राफिक्स: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट
ग्राफिक्स: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

उन्होंने आगे कहा, “2024 तक आंकड़े और भी चौंकाने वाले हो गए. 3,562 करोड़ रुपये से बढ़कर बीजेपी का बैंक बैलेंस 10,107 करोड़ रुपये हो गया, जो कांग्रेस के 133 करोड़ रुपये से 75 गुना ज्यादा है. लेवल प्लेइंग फील्ड कहां है? विपक्ष सत्ताधारी पार्टी से कैसे मुकाबला करेगा, जब अनुपात 99:1 हो?”

602 प्रतिशत की बढ़ोतरी

बीजेपी ने चुनाव और सामान्य प्रचार पर जो कुल 3,355 करोड़ रुपये खर्च किए, उनमें से बड़ा हिस्सा—1,124 करोड़ रुपये—इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर खर्च हुआ. यह 2019-20 की तुलना में 352 प्रतिशत ज्यादा है, जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर खर्च 249 करोड़ रुपये था.

2024-25 में बीजेपी ने हवाई जहाज और हेलीकॉप्टर पर 583 करोड़ रुपये खर्च किए. यह 2019-20 के 250 करोड़ रुपये के खर्च से दोगुना से भी ज्यादा है, जब पिछला संसदीय चुनाव हुआ था.

पार्टी द्वारा उम्मीदवारों को दी जाने वाली वित्तीय मदद भी कई गुना बढ़ी है—2014-15 में 88 करोड़ रुपये और 2019-20 में 198 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 312 करोड़ रुपये हो गई. यानी 10 साल में 255 प्रतिशत की बढ़ोतरी.

बीजेपी ने “विज्ञापन” पर खर्च भी 2019-20 के 400 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 2024-25 में 897 करोड़ रुपये कर दिया, यानी यह भी दोगुने से ज्यादा हो गया.

आय की बात करें तो, पार्टी को मिलने वाला स्वैच्छिक चंदा 2014-15 में 872 करोड़ रुपये था, जो 2019-20 में 3,427 करोड़ रुपये और 2024-25 में 6,124 करोड़ रुपये हो गया—यानी 10 साल में 602 प्रतिशत की बढ़ोतरी.

2024-25 में पार्टी के खातों के मुताबिक, बीजेपी के पास नकद और नकद के बराबर संपत्ति 9,996 करोड़ रुपये थी, जो 2019-20 के 3,510 करोड़ रुपये से लगभग तीन गुना है.

इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट
इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

साफ फर्क

जिन राज्यों में आमतौर पर बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होता है, वहां के विधानसभा चुनावों में खर्च के आंकड़ों में भी ऐसा ही रुझान दिखा.

उदाहरण के तौर पर, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव 2018 और 2023 में हुए. 2018-19 में बीजेपी ने चुनावों पर 792 करोड़ रुपये खर्च किए, जो कांग्रेस के 308 करोड़ रुपये से दोगुने से भी ज्यादा थे.

हालांकि, पिछले वित्त साल की तुलना में खर्च में हुई बढ़ोतरी की कहानी अलग थी. बीजेपी ने जहां 2017-18 में 567 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 2018-19 में 792 करोड़ रुपये खर्च किए, वहीं कांग्रेस ने 2017-18 में 29 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 2018-19 में 308 करोड़ रुपये खर्च किए—यानी 962 प्रतिशत की बढ़ोतरी.

कर्नाटक में बीजेपी शुरुआत में बहुमत से चूक गई थी, लेकिन एच.डी. कुमारस्वामी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार के गिरने के बाद, दलबदल के चलते 2019 में बीजेपी सत्ता में आ गई.

मध्य प्रदेश में भी ऐसा ही हुआ. कांग्रेस बहुत कम अंतर से चुनाव जीती और सत्ता में आई, लेकिन सरकार सिर्फ 15 महीने चली और दलबदल के बाद बीजेपी फिर से राज्य की सत्ता में लौट आई.

2023-24 में बीजेपी ने 1,754 करोड़ रुपये का भारी-भरकम खर्च किया, जो कांग्रेस के 619 करोड़ रुपये से लगभग तीन गुना था. कर्नाटक में कांग्रेस ने चुनाव जीता, जबकि मध्य प्रदेश में बीजेपी ने सत्ता बरकरार रखी.

छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस 2018 में सत्ता में आई थी, लेकिन 2023 के चुनावों में उसे हार का सामना करना पड़ा.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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