नयी दिल्ली, 19 जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय राजधानी में विद्यालयों में शुल्क को विनियमित करने वाले नये कानून को लागू करने के समय को लेकर सोमवार को दिल्ली सरकार से सवाल किया।
न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने कहा कि शैक्षणिक वर्ष पहले से ही जारी है, ऐसे में दिल्ली स्कूल शिक्षा (शुल्क निर्धारण एवं विनियमन में पारदर्शिता) अधिनियम, 2025 का कार्यान्वयन भ्रामक और संभवत: अव्यावहारिक प्रतीत होता है।
न्यायालय निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों के संघों द्वारा अधिनियम और उसके बाद के नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है।
स्कूलों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि कानून को लागू करने का तरीका अधिनियम की योजना के विपरीत है।
न्यायालय ने कहा कि वह इस समय कानून में हस्तक्षेप करने के लिए इच्छुक नहीं है, लेकिन इस बात पर जोर दिया कि इसका कार्यान्वयन वैधानिक समय-सीमा के अनुरूप होना चाहिए।
दिल्ली सरकार ने हाल में इस अधिनियम को अधिसूचित किया है, जिसमें अनुमति प्राप्त शुल्क मदों, लेखांकन प्रक्रियाओं और अतिरिक्त शुल्कों पर प्रतिबंधों के संबंध में विस्तृत प्रावधान दिए गए हैं। साथ ही प्रति व्यक्ति शुल्क और कानून द्वारा अनुमोदित राशि से अधिक किसी भी प्रकार के शुल्क लेने पर रोक लगाई गई है।
उच्च न्यायालय ने 8 जनवरी को राष्ट्रीय राजधानी के निजी स्कूलों को शुल्क विनियमन समितियों के गठन का निर्देश देने संबंधी अधिसूचना पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था, लेकिन ऐसी समितियों के गठन की समय सीमा 10 जनवरी से बढ़ाकर 20 जनवरी कर दी थी।
उच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि स्कूल प्रबंधन द्वारा समितियों को प्रस्तावित शुल्क जमा करने की अंतिम तिथि 25 जनवरी से बढ़ाकर 5 फरवरी कर दी जानी चाहिए।
भाषा सुभाष दिलीप
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