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Tuesday, 24 February, 2026
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कुपोषण से निपटने के लिए सरकार के पास इच्छाशक्ति होनी चाहिए: मेलघाट मामले में अदालत ने कहा

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मुंबई, 19 जनवरी (भाषा) बंबई उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण के कारण शिशुओं और गर्भवती महिलाओं की मृत्यु से निपटने के लिए ‘‘बहुत कम’’ कदम उठाने को लेकर सोमवार को राज्य सरकार को फटकार लगाई।

आदिवासी क्षेत्र मेलघाट में बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं की मौत को उजागर करने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति रविंद्र घुगे और न्यायमूर्ति अभय मंत्री की पीठ ने कहा कि सरकार को इस मुद्दे से निपटने के लिए इच्छाशक्ति और तत्परता दिखानी चाहिए।

अदालत को जब यह जानकारी मिली कि कुपोषण के कारण 115 से अधिक शिशुओं, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं की मौत हो चुकी है, तो उसने इन आंकड़ों पर हैरानी जतायी।

सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि मौत के ये सभी मामले कुपोषण के कारण नहीं हैं और इसके पीछे कई अन्य कारण भी होते हैं।

अतिरिक्त सरकारी वकील पी बी सामंत ने कहा कि इन क्षेत्रों में ज्यादातर महिलाओं की शादी 13 या 14 साल की उम्र में ही हो जाती है और फिर वे तुरंत गर्भवती हो जाती हैं। ऐसे मामलों में कभी-कभी प्रसव समय से पहले हो जाता है, जिससे चिकित्सा संबंधी जटिलताएं उत्पन्न होती हैं।

अदालत ने सरकार से आग्रह किया कि वह मूल कारण का पता लगाए और फिर उससे प्रभावी ढंग से निपटने के लिए उपाय करे।

उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की, ‘‘समस्याएं कई हैं। सरकार के पास उन समस्याओं को दूर करने की इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प होना चाहिए।’’

अदालत ने कहा कि सरकार को विशेष उपाय करने होंगे और सबसे ज्यादा जरूरतमंद लोगों को बुनियादी चिकित्सा सुविधाएं और साधन उपलब्ध कराने होंगे।

उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘इस दिशा में बहुत कम कदम उठाए जा रहे हैं। सरकार को ऐसे मामलों में बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करने का रवैया अपनाना होगा ताकि पिछले दो-तीन दशकों में देखी जा रही सामान्य कारणों से मौत की घटनाएं दोबारा नहीं हों।’’

भाषा सुरभि अविनाश

अविनाश

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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