नई दिल्ली: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी गैर-मान्यता प्राप्त मदरसे को तब तक कोई सरकारी अनुदान नहीं मिलेगा, जब तक उसे मान्यता नहीं मिल जाती. लेकिन केवल मदरसा शिक्षा बोर्ड से मान्यता न होने के आधार पर उसके कामकाज को रोकने का अधिकार अधिकारियों को नहीं है.
ऐसा करते हुए जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने पिछले साल मई में उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती के जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी द्वारा पारित उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें राज्य बोर्ड से मान्यता न मिलने के कारण मदरसा अहले सुन्नत इमाम अहमद रज़ा को बंद करने का निर्देश दिया गया था.
संबंधित मदरसे ने जिला अधिकारी के आदेश को चुनौती देते हुए कोर्ट का रुख किया था.
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो अधिकारियों को इस आधार पर मदरसे के कामकाज को रोकने की इजाज़त दे कि उसे मान्यता नहीं मिली है.
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मदरसा शिक्षा बोर्ड याचिकाकर्ता मदरसे के छात्रों को अपने द्वारा आयोजित परीक्षाओं में बैठने की अनुमति देने के लिए बाध्य नहीं होगा.
कोर्ट ने कहा कि छात्र राज्य सरकार से संबंधित किसी भी उद्देश्य के लिए मदरसे से प्राप्त अपनी योग्यता का लाभ उठाने के हकदार नहीं होंगे.
अंत में कोर्ट ने आदेश दिया कि आदेश की प्रति पेश होने के 24 घंटे के भीतर मदरसे के प्रवेश द्वार पर लगी सील खोल दी जाए.
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि उत्तर प्रदेश गैर-सरकारी अरबी और फारसी मदरसा मान्यता, प्रशासन और सेवा विनियम, 2016 का नियम 13 यह कहता है कि एक गैर-मान्यता प्राप्त मदरसे को कोई राज्य ग्रांट नहीं मिलेगी, लेकिन यह नहीं कहता कि ऐसे मदरसे को बंद कर दिया जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि वे सरकार से कोई ग्रांट नहीं मांग रहे थे.
सुप्रीम कोर्ट ने पहले अंजुम कादरी बनाम भारत संघ मामले में 2025 के अपने फैसले में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया था.
पहली श्रेणी, जो संविधान के अनुच्छेद 30(1) के तहत संरक्षित है, उन मदरसों से संबंधित है जो राज्य से कोई सहायता या मान्यता नहीं चाहते हैं. दूसरी श्रेणी उन मदरसों की है जो सहायता चाहते हैं. तीसरी श्रेणी उन मदरसों की है जो केवल मान्यता चाहते हैं, लेकिन सहायता नहीं.
अनुच्छेद 30(1) सभी धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और संचालित करने का मौलिक अधिकार देता है, ताकि वे अपनी संस्कृति, लिपि और भाषा की रक्षा कर सकें.
याचिकाकर्ता मदरसे ने दलील दी थी कि वह पहली श्रेणी में आता है क्योंकि उसने न तो मान्यता मांगी थी और न ही सहायता, और इसलिए वह संविधान के तहत संरक्षित है.
राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि गैर-मान्यता प्राप्त मदरसा अनावश्यक समस्याएं पैदा कर सकता है, क्योंकि छात्रों को उससे मिली योग्यता के आधार पर कोई लाभ नहीं मिलेगा.
इन दलीलों को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि केवल गैर-मान्यता प्राप्त होने के आधार पर किसी मदरसे के कामकाज पर रोक लगाने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: फाइल्स में नाम नहीं, फैसलों में छाप: RSS का अधिवक्ता परिषद कैसे अदालतों को प्रभावित कर रहा है
