नई दिल्ली: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को निर्देश दिया है कि जो लोग झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतें दर्ज कराते हैं, उनके खिलाफ अनिवार्य रूप से लिखित शिकायत दर्ज की जाए. कोर्ट ने चेतावनी दी है कि ऐसा न करने पर संबंधित पुलिस अधिकारी अभियोजन के लिए जिम्मेदार होंगे.
14 जनवरी के एक आदेश में, जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि ने फैसला सुनाया कि जब भी पुलिस किसी आरोपी को बरी करते हुए क्लोजर रिपोर्ट जमा करती है, तो उन्हें शिकायतकर्ता और गवाहों के खिलाफ औपचारिक शिकायत दर्ज करनी होगी, अगर झूठी, तुच्छ या गुमराह करने वाली जानकारी के माध्यम से पुलिस तंत्र का दुरुपयोग किया गया हो.
कोर्ट ने राज्य के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया कि वे सभी पुलिस अधिकारियों को यह आदेश जारी करें कि पालन न करने पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 199(b) के तहत कार्रवाई होगी. यह धारा कानूनी निर्देशों की अवहेलना करने वाले लोक सेवकों को दंडित करती है.
कोर्ट ने कहा, “उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया जाता है कि राज्य के सभी पुलिस अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का आदेश दें कि अगर जांच पूरी होने पर आरोपी को बरी करने वाली अंतिम रिपोर्ट अदालत में दाखिल की जाती है, तो हर ऐसे मामले में, जहां झूठी, तुच्छ या भ्रामक जानकारी देकर पुलिस तंत्र का दुरुपयोग किया गया हो, लिखित शिकायत दर्ज की जाए.”
यह 32 पन्नों का फैसला एक वैवाहिक विवाद से जुड़ा है. दक्षिण कोरिया के सियोल में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत एक महिला ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया था. उन्होंने अलीगढ़ की एक अदालत द्वारा जारी समन को चुनौती दी थी, जो उनके पति की ओर से आपराधिक धमकी और अपमान की शिकायत पर जारी किया गया था.
बेंच ने आयुक्तों, पुलिस अधीक्षकों, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों, जांच अधिकारियों और थाना प्रभारियों को भी निर्देश दिया कि जिन मामलों में क्लोजर रिपोर्ट आरोपी के पक्ष में जाती है, वहां झूठी जानकारी देने वाले सूचनाकर्ताओं और गवाहों के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज की जाए.
कोर्ट ने कहा, “न्यायिक मजिस्ट्रेट या अदालतें भी जांच अधिकारी या पुलिस को यह निर्देश देंगी कि वे एफआईआर के सूचनाकर्ता और गवाहों के खिलाफ धारा 195(1)(a) सीआरपीसी के तहत लिखित शिकायत दाखिल करें, जो वैध प्राधिकरण की अवमानना से संबंधित है. इसका समकक्ष प्रावधान धारा 215(1)(a) बीएनएसएस है. यह तब लागू होगा जब लोक सेवक को उसकी कानूनी शक्ति का उपयोग कर कथित आरोपी को नुकसान पहुंचाने के इरादे से झूठी जानकारी दी गई हो.”
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 2023 का है, जब महिला के पति ने अलीगढ़ के क्वार्सी थाने में उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 504 और 507 के तहत शिकायत दर्ज कराई थी. पति का आरोप था कि उसकी पत्नी और उसके लिव-इन पार्टनर सोशल मीडिया पर अश्लील भाषा का इस्तेमाल कर उसकी बदनामी कर रहे हैं.
शिकायत कथित तौर पर वैवाहिक संबंधों में टूटन के बाद दर्ज कराई गई थी. आरोप था कि पत्नी सियोल में अपनी यूनिवर्सिटी के एक व्यक्ति के साथ रिश्ते में थी. पति ने बच्चे की अभिरक्षा की मांग भी की थी.
पुलिस को आरोपों के समर्थन में कोई सबूत नहीं मिला और उसने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी. पति ने इस फैसले का विरोध किया, जिसके बाद अलीगढ़ की एक अदालत ने सीआरपीसी की धारा 190(1)(b) के तहत महिला को समन जारी कर दिया. यह धारा मजिस्ट्रेट को यह अधिकार देती है कि पुलिस द्वारा कोई मामला न बनने की रिपोर्ट देने के बावजूद वह कार्यवाही शुरू कर सकता है.
महिला ने इन समनों को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी, जिसके बाद यह आदेश पारित हुआ.
हाई कोर्ट का फैसला और प्रक्रियागत खामियां
महिला की समन रद्द करने की याचिका खारिज करते हुए जस्टिस गिरी ने कहा कि अभियोजन पक्ष की शुरुआत से ही कानूनी कमियां थीं.
महिला की ओर से दलील दी गई कि उसने कोई अपराध नहीं किया और पति के आरोपों के समर्थन में कोई सबूत नहीं है. वहीं, पति के वकीलों ने कहा कि अलीगढ़ अदालत द्वारा जारी समन में कोई कानूनी खामी नहीं है.
कोर्ट ने कहा कि दोनों अपराधों में अधिकतम दो साल की सजा का प्रावधान है और ये जमानती व गैर-संज्ञेय अपराध हैं. इसलिए यह मामला वारंट केस नहीं, बल्कि समन केस है और इसकी सुनवाई मजिस्ट्रेट द्वारा की जानी चाहिए.
इसके बावजूद, थाना प्रभारी ने सीआरपीसी की धारा 154 के तहत एफआईआर दर्ज कर दी, जो संज्ञेय अपराधों से संबंधित है. कोर्ट ने इसे कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया और कहा कि अधिकारी को धारा 155 के तहत गैर-संज्ञेय अपराध की रिपोर्ट दर्ज करनी चाहिए थी.
कोर्ट ने कहा, “थाना प्रभारी ने इसे सीआरपीसी की धारा 155 के तहत गैर-संज्ञेय रिपोर्ट मानने के बजाय, धारा 154 के तहत एफआईआर दर्ज कर दी. यह धारा 173 बीएनएसएस के अनुरूप संज्ञेय अपराध मानकर की गई कार्रवाई थी, जो मामले की शुरुआत से ही कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है.”
कोर्ट ने अलीगढ़ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए. कोर्ट ने कहा कि महिला को समन जारी करने से पहले धारा 223 बीएनएस के प्रावधान के अनुसार सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया. इस प्रावधान के तहत मजिस्ट्रेट को संज्ञान लेने से पहले आरोपी को अनिवार्य रूप से सुनना होता है.
इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि पति के आरोपों पर क्लोजर रिपोर्ट दाखिल होने के बावजूद, जांच अधिकारी ने उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 177 और 182 के तहत लिखित शिकायत दर्ज नहीं की. ये धाराएं लोक सेवक को झूठी जानकारी देने और किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने के इरादे से गलत सूचना देने से संबंधित हैं.
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