(अंजलि ओझा)
नयी दिल्ली, 18 जनवरी (भाषा) जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजिल अंगमो ने जोधपुर की जेल में बंद अपने पति की दिनचर्या साझा करते हुए बताया कि दुनिया से कटे एकांत कोठरी में कैद हैं, लेकिन आत्मविश्वास और उम्मीदों से भरे हुए हैं।
वांगचुक 110 दिनों से अधिक समय से जेल में बंद हैं। उन्हें 26 सितंबर को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत गिरफ्तार किया गया था। उनकी गिरफ्तारी लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और क्षेत्र को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन के दौरान हिंसा और चार लोगों की मौत के दो दिन बाद की गई थी।
लद्दाख में ‘हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स’ (एचआईएएल)की सह-संस्थापक अंगमो ने ‘पीटीआई-भाषा’ के साथ साक्षात्कार में कहा कि वांगचुक आशावादी और उत्साह से भरे हुए हैं, कारागार में बंद होने के बावजूद उनके हौसले पस्त नहीं हुए हैं। उन्होंने बताया कि वांगचुक जेल में अपने अनुभवों पर एक किताब लिख रहे हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘सकारात्मक और आशावादी लोगों की एक अच्छी बात यह होती है कि वे हर चीज को सहजता से स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन वह जिन परिस्थितियों में रहते हैं, वे बहुत ही दयनीय और कठिन हैं।’’
अंगमो ने बताया कि वांगचुक एक कोठरी में फर्श पर कंबल बिछाकर सोते हैं और वहां पर कोई फर्नीचर नहीं है। उन्होंने बताया कि वह किताबें पढ़ते हैं, क्योंकि परिवार और वकीलों के अलावा उनका बाहरी दुनिया से कोई संपर्क नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि वांगचुक को जो अखबार मुहैया कराई जाती है, उसमें से भी उनसे संबंधित खबरें काट दी जाती हैं।
अंगमो के मुताबिक, कारावास में बंद जलवायु कार्यकर्ता और नवप्रवर्तक विपश्यना, योग और ध्यान साधना करते हैं और उन्हें मिलने वाले साधारण भोजन से संतुष्ट हैं। उन्होंने बताया कि परिवार को उनके लिए कुछ नाश्ता और फल लाने की अनुमति दी गई है, लेकिन जेल अधिकारी सूखे खुबानी लाने की अनुमति नहीं देते हैं, जो लद्दाख में एक प्रसिद्ध फल है।
अंगमो ने वांगचुक के स्वास्थ्य के सवाल पर बताया, ‘‘वह आम तौर पर बहुत आशावादी और सकारात्मक व्यक्ति हैं, जो हर चीज में सकारात्मकता देखते हैं। वह हर चीज में अच्छाई ढूंढते हैं, और इसलिए उन्होंने जेल में अपने जीवन को अपनी प्रगति का साधन बना लिया है। ठीक वैसे ही जैसे मैंने जेल से बाहर, दर-दर भटकते हुए, अपने जीवन को प्रगति का साधन बनाया है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘पहले दो महीनों तक हमने एक-दूसरे से अपनी समस्याओं के बारे में बात नहीं की। हमने मजबूत होने का दिखावा किया। हाल ही में उन्होंने हमें बताया कि उनके पास बिस्तर या कोई फर्नीचर नहीं है।’’
अंगमो ने बताया कि वांगचुक कंबल बिछाकर पर फर्श पर सो रहे हैं, और कोठरी छोटी होने की वजह से टहलने के लिए बहुत कम जगह है।
उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन वह अपना समय विपश्यना, सूर्य नमस्कार और योग करने में लगाते हैं। वह बहुत पढ़ते हैं। वह लगातार अलग-अलग किताबें मांगते रहते हैं। मैं भी उन्हें देने के लिए अपनी प्रेरणा के अनुसार अलग-अलग किताबें लाती रहती हूं।’’
अंगमो ने बताया, ‘‘मैंने उन्हें अलीपुर जेल में श्री अरबिंदो के कारावास में बिताए गए समय पर लिखे संस्मरण को दिया, ताकि उन्हें यह एहसास हो सके कि महात्मा गांधी, नेहरू और अन्य लोगों के अलावा उनके जैसा व्यक्ति भी जेल जा चुका है। लेकिन किताब देते समय मैंने मजाक में कहा कि जिस तरह श्री अरबिंदो को जेल के अंदर ज्ञान प्राप्त हुआ, उसी तरह जेल से बाहर आने पर आपको भी आत्मज्ञान प्राप्त होना चाहिए। उन्होंने कहा कि वे पूरी कोशिश करेंगे।’’
अंगमो ने खुलासा किया कि जेल में बिताए अपने अनुभवों पर वांगचुक जो किताब लिख रहे हैं, उसका शीर्षक संभवत:, ‘‘फॉरएवर पॉजिटिव’’ होगा।
उन्होंने कहा, ‘‘अगर वह कुछ चींटियों और उनके व्यवहार को देखते हैं, तो वह मुझसे चींटियों के व्यवहार पर किताबें लाने के लिए कहते हैं, क्योंकि चींटी समुदाय में बहुत एकजुटता और टीम भावना होती है। इसलिए, शायद वह इसका अध्ययन करना चाहते हैं।’’
अंगमो के मुताबिक, वांगचुक को धूपघड़ियों पर किताबें चाहिए थीं, क्योंकि उनके पास लंबे समय से घड़ी नहीं थी। उन्होंने कहा, ‘‘मैंने उन्हें जोनाथन लिविंगस्टन की ‘सीगल’, ‘मिस्टर गॉड, दिस इज अन्ना’ इत्यादि जैसी सभी मन को प्रसन्न करने वाली किताबें भी दी हैं।’’
उन्होंने बताया, ‘‘वांगचुक के पास फोन नहीं, टेलीविजन नहीं, यहां तक कि मैंने उन्हें जो अखबार दिए हैं, उनमें से भी उनसे या लद्दाख से संबंधित कुछ अंश काटकर दिए गए हैं। इसलिए, जब वह उन अंशों वाले अखबार को देखते हैं, तो उन्हें पता चल जाता है कि उस दिन जरूर उनके बारे में कुछ छपा होगा, या वह खबर लद्दाख के बारे में रही होगी।’’
अंगमो के मुताबिक, जेल अधिकारियों का उनके साथ ‘‘ यथासंभव’ अच्छा व्यवहार है, और कुछ कर्मचारियों ने तो अपने बच्चों की शिक्षा से संबंधित प्रश्नों के साथ उनसे संपर्क भी किया।
उन्होंने कहा, ‘‘मैं कहूंगी कि वे अपना काम कर रहे हैं। मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है। सोनम के लिए वे जितना भी कर रहे हैं, मैं उसकी सराहना करती हूं। वे हमारे और सोनम के प्रति अच्छे हैं। लेकिन वहां के कानून सख्त हैं, मैं उन्हें दोष नहीं देती।’’
अंगमो के मुताबिक, जेल में वांगचुक का एकमात्र संपर्क उन आरक्षियों या कर्मचारियों से होता है जो उन्हें खाना देने आते हैं।
भाषा धीरज दिलीप
दिलीप
यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.
