नई दिल्ली: जनवरी की ठंड में तीस हजारी अदालत का पश्चिमी विंग रोज़ की तरह दोपहर के समय चहल-पहल से भरा रहता है. फाइलें इधर-उधर जाती दिखती हैं, वकील तेजी से आते-जाते हैं और कैंटीन खचाखच भरी रहती है. लेकिन अदालत परिसर की इस रोज़मर्रा की हलचल के बीच बातचीत अब मामलों से ज्यादा दिल्ली बार काउंसिल के चुनाव लड़ रहीं महिलाओं को लेकर हो रही है.
दिल्ली बार काउंसिल, जो देश की सबसे बड़ी बार काउंसिल है, एक वैधानिक निकाय है. यह राजधानी में कानूनी पेशे को नियंत्रित करती है, जिसमें वकीलों का नामांकन, अनुशासनात्मक कार्रवाई और कल्याण से जुड़े उपाय शामिल हैं. हालांकि, ऐतिहासिक रूप से बार काउंसिल के नेतृत्व में महिला वकीलों की मौजूदगी बहुत कम रही है.
पिछले साल 8 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट के एक निर्देश ने इस स्थिति को बदलने की कोशिश की. कोर्ट ने दिल्ली बार काउंसिल की 25 निर्वाचित सीटों में से पांच सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का आदेश दिया.
फरवरी 2026 में होने वाले चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, इतिहास बनता दिख रहा है. यह बदलाव अब अदालत परिसरों में बातचीत का मुख्य विषय बन गया है.
अधिवक्ता अंजू दीक्षित दोपहर के शुरुआती समय में अपनी ग्रे रंग की थार से उतरती हैं. वह रोहिणी कोर्ट में प्रचार करने के बाद लौट रही हैं. तीस हजारी कोर्ट के सिविल विंग से गुजरते हुए, उन्हें पहचानने वाले साथी वकील बार-बार रोकते हैं और आने वाले चुनावों के बारे में जानना चाहते हैं.

दीक्षित करीब तीन दशकों से वकालत कर रही हैं. फिर भी, यह पहला मौका है जब वह बार काउंसिल का चुनाव लड़ रही हैं.
वह कहती हैं, “यह आरक्षण पहली बार हुआ है, इसलिए हमने थोड़ी हिम्मत जुटाई. भगवान ने हमें बहुत काबिलियत दी है. अब महिलाओं को आगे आना चाहिए.” पहली बार चुनाव लड़ने की खुशी उनके चेहरे पर साफ झलकती है.
बार काउंसिल क्या करती है और यह क्यों मायने रखती है
देश के सबसे बड़े और विविध कानूनी समुदायों में से एक का संचालन करने वाली दिल्ली बार काउंसिल लंबे समय तक एक विरोधाभास रही है, क्योंकि इसके नेतृत्व में ऐतिहासिक रूप से लगभग पूरी तरह पुरुषों का वर्चस्व रहा है.
बार काउंसिल के चुनाव हर पांच साल में होते हैं. नामांकित वकील 25 सदस्यों का चुनाव करते हैं, जो बाद में पेशे से जुड़ी नीतियों और प्रशासन को आकार देते हैं.

अब तक दिल्ली बार काउंसिल में केवल दो महिलाएं चुनी गई थीं. लेकिन 2026 में यह रिकॉर्ड आखिरकार चुनौती के सामने है.
इस बार 25 में से पांच निर्वाचित सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं, जबकि दो और सीटें सह-नामांकन के जरिए भरी जाएंगी. यह संरचनात्मक अवसर न्यायिक हस्तक्षेप से बना है, लेकिन इसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी चुनाव लड़ने को तैयार महिलाओं पर है.
जनवरी 2026 तक 1.65 लाख से अधिक पंजीकृत वकीलों के साथ दिल्ली बार काउंसिल देश की सबसे बड़ी बार काउंसिल है.
सुप्रीम कोर्ट ने तब हस्तक्षेप किया, जब महिलाओं ने अदालत का रुख करते हुए देश भर की बार काउंसिलों में नेतृत्व पदों से महिलाओं के संरचनात्मक बहिष्कार की ओर ध्यान दिलाया. कोर्ट ने कहा कि कानूनी पेशे में महिलाओं की संख्या बढ़ने के बावजूद, बार काउंसिलों में संस्थागत सत्ता अब भी भारी तौर पर पुरुषों के हाथ में है.
राजनीतिक चुनावों की तरह शोरगुल वाले मुकाबलों के बजाय, बार काउंसिल के चुनाव छोटे और निजी स्तर पर लड़े जाते हैं. कोर्टरूम के बाहर एक बातचीत, कैंटीन के पास हाथ मिलाना, या व्हाट्सएप पर भेजा गया एक संदेश.
कई महिला उम्मीदवारों का कहना है कि कोर्ट का काम और प्रचार साथ-साथ संभालने से उनके दिन लंबे हो गए हैं और ब्रेक कम मिले हैं. लेकिन इसके साथ ही उनकी मौजूदगी ज्यादा महसूस की जा रही है.
कोर्ट से कोर्ट, चैंबर से चैंबर
सिविल और कमर्शियल कानून की वकील वाणी सिंघल के लिए यह बदलाव बहुत पहले हो जाना चाहिए था.
वह हाथ जोड़कर अपना चुनावी पोस्टकार्ड थमाते हुए कहती हैं, “पहले बार काउंसिल लगभग पूरी तरह पुरुषों की थी. महिलाओं की समस्याओं को देखने के लिए कोई महिला नजरिया नहीं था.”
वह कहती हैं कि शौचालयों की कमी, शिकायत दर्ज करने की व्यवस्था का अभाव और रोजमर्रा की अपमानजनक स्थितियों जैसे मुद्दों को शायद ही कभी संस्थागत समस्याओं के रूप में देखा गया. “महिलाएं होंगी तो प्राथमिकताएं बदलेंगी.”
अधिवक्ता अनुष्का अरोड़ा कोर्ट के समय के बीच छोटे-छोटे प्रचार कार्यक्रमों और क्लाइंट मीटिंग्स को संभालती हैं. 2018 में नामांकित हुई अरोड़ा कहती हैं कि आरक्षण ने युवा वकीलों के लिए नेतृत्व को अब पहुंच के भीतर कर दिया है.
वह कहती हैं, “इससे महिलाओं को आगे आने का आत्मविश्वास मिला है.” चैंबर में प्रचार के लिए एक साथी वकील को फोन करते हुए वह जोड़ती हैं, “अगर मैं चुनी जाती हूं, तो यह सिर्फ महिलाओं की बात नहीं होगी. यह युवा वकीलों की आवाज़ को भी सुना जाने का मौका होगा.”

एडवोकेट मोबिना खान का अभियान अपेक्षाकृत सादा है. यह गलियारों और चैंबरों में आमने-सामने की बातचीत से आकार ले रहा है. रेलवे एम्पैनलमेंट से मुकदमेबाज़ी की ओर आने के बाद, खान कहती हैं कि वकील बार-बार अपनी वही समस्याएं उनके सामने रखते हैं.
“सामान्य वकीलों के लिए बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं. लोग ऐसे व्यक्ति को चाहते हैं जो सच में उनकी बात सुने और उपलब्ध रहे.” वह कहती हैं, और जोड़ती हैं कि उनके एजेंडे में सामान्य श्रेणी के वकीलों के लिए 24 घंटे की हेल्पलाइन भी शामिल है.
अदालतों में उनकी चिंताएं उनके रोज़मर्रा के अनुभवों से जुड़ी हैं. असुरक्षित कार्यस्थल, प्रैक्टिस में सम्मान की कमी, और शिकायत निवारण के लिए स्पष्ट मंचों का अभाव. कुछ लोग कल्याण से जुड़े मुद्दों की बात करते हैं. युवा वकीलों के लिए सहायता, वरिष्ठ वकीलों के लिए पेंशन, और काउंसिल के कामकाज में पारदर्शिता.

प्रैक्टिस और चुनाव प्रचार के बीच संतुलन बनाना एक चुनौती बना हुआ है. कई महिला उम्मीदवार मानती हैं कि उनके अदालत के काम पर असर पड़ा है, जहां जूनियर और सहयोगी मामलों को संभालने में मदद कर रहे हैं. फिर भी, कई इसे थकाने वाला नहीं बल्कि उत्साह देने वाला अनुभव बताती हैं. इसे खुद को दिखाने, सुने जाने और गंभीरता से लिए जाने का मौका मानती हैं.
जो बात उन्हें एकजुट करती है, वह यह भावना है कि सिर्फ इस दौड़ में होना ही एक बदलाव का संकेत है.
यह अब साफ है कि महिला उम्मीदवारों की मौजूदगी. आत्मविश्वासी, मुखर और दिखाई देने वाली. ने इस मुकाबले को बदल दिया है. जिन गलियारों में कभी नेतृत्व को पुरुष-प्रधान माना जाता था, वहां अब महिलाएं जगह नहीं मांग रही हैं. वे उस पर दावा कर रही हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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