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Wednesday, 14 January, 2026
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नियुक्ति संबंधी निर्णय लालू के आधिकारिक कामकाज का हिस्सा नहीं : सीबीआई

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नयी दिल्ली, 13 जनवरी (भाषा) जमीन के बदले नौकरी घोटाले के मामले में प्राथमिकी रद्द करने की पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद की याचिका का विरोध करते हुए, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने मंगलवार को उच्च न्यायालय में कहा कि रेलवे में नियुक्तियों के संबंध में राजद प्रमुख ने जो निर्णय लिये थे, वे मंत्री के तौर पर उनके सार्वजनिक कर्तव्य के दायरे में नहीं आते और केवल महाप्रबंधक ही ऐसा निर्णय ले सकते है।

सीबीआई की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू ने न्यायमूर्ति रविंदर डुडेजा के समक्ष तर्क दिया कि लालू के खिलाफ कार्यवाही के वास्ते भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम की धारा 17ए के तहत पूर्व स्वीकृति प्राप्त करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उनके आचरण को ‘उनके आधिकारिक कार्यों या कर्तव्यों के निर्वहन’ के दायरे में नहीं माना जा सकता है।

राजू ने कहा, ‘‘हमारा मामला यह है कि लालू को अपने आधिकारिक कर्तव्यों या कार्यों के निर्वहन में कोई सिफारिश करने या निर्णय लेने की आवश्यकता नहीं थी। इसलिए, जो भी निर्णय लिया गया या सिफारिश की गई, वह उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के अंतर्गत नहीं आती। सिफारिश या निर्णय केवल महाप्रबंधकों द्वारा ही लिया जा सकता था। मंत्री की इसमें कोई भूमिका नहीं थी।’’

उन्होंने कहा,‘‘इसलिए, नियुक्ति के मामलों में, नियुक्ति का निर्णय लेने में रेल मंत्री की कोई भूमिका नहीं थी। यह रेल मंत्री के रूप में उनके सार्वजनिक कर्तव्यों के निर्वहन से संबंधित नहीं था। लालू की इसमें कोई भूमिका नहीं थी।’

सीबीआई की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल डी पी सिंह ने अदालत में कहा कि संबंधित महाप्रबंधकों के खिलाफ कार्यवाही के लिए धारा 17ए के तहत मंजूरी विधिवत ली गई।

न्यायमूर्ति डुडेजा ने मामले की आगे की सुनवाई अगले सप्ताह के लिए सूचीबद्ध की।

अधिकारियों ने बताया कि ‘जमीन के बदले नौकरी’ का मामला लालू प्रसाद के रेल मंत्री रहने के दौरान (2004 से 2009 तक) मध्यप्रदेश के जबलपुर में भारतीय रेलवे के पश्चिम मध्य जोन में की गई समूह डी नियुक्तियों से संबंधित है। आरोप है कि इन नियुक्तियों के बदले में राजद प्रमुख के परिवार या सहयोगियों को उन लोगों ने जमीन दी थी, जिन्हें नौकरी मिली थी।

लालू प्रसाद और उनकी पत्नी, दो बेटियों, अज्ञात सरकारी अधिकारियों और निजी व्यक्तियों के खिलाफ 18 मई, 2022 को यह मामला दर्ज किया गया था।

लालू प्रसाद ने उच्च न्यायालय में दायर अपनी याचिका में प्राथमिकी के साथ-साथ 2022, 2023 और 2024 में दाखिल किये गये तीन आरोपपत्र और संज्ञान के परिणामी आदेशों को रद्द करने का अनुरोध किया है।

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने लालू प्रसाद की ओर से पहले यह तर्क दिया था कि जांच और प्राथमिकी, साथ ही इस मामले में जांच और बाद में दाखिल आरोपपत्र कानूनी रूप से मान्य नहीं हो सकते, क्योंकि जांच एजेंसी भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम की धारा 17ए के तहत पूर्व स्वीकृति प्राप्त करने में विफल रही थी।

याचिका में यह भी कहा गया है कि सक्षम न्यायालय के समक्ष मामला बंद करने के लिये रिपोर्ट दाखिल किये जाने के बाद सीबीआई की प्रारंभिक जांच बंद कर दी गई थी। उसके करीब 14 साल बाद 2022 में प्राथमिकी दर्ज की गई।

याचिका में कहा गया है, ‘‘पिछली जांच और उनकी ‘क्लोजर रिपोर्ट’ को छुपाकर नई जांच शुरू करना कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग है। याचिकाकर्ता को निष्पक्ष जांच के उसके मौलिक अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन करते हुए एक अवैध, प्रेरित जांच का शिकार बनाया जा रहा है।’’

इसमें कहा गया है कि वर्तमान पूछताछ और जांच दोनों की शुरुआत अमान्य है क्योंकि दोनों को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत अनिवार्य अनुमोदन के बिना शुरू किया गया है।

सीबीआई ने आरोप लगाया है कि लालू प्रसाद के रेल मंत्री के रूप में 2004 से 2009 तक के कार्यकाल के दौरान मध्यप्रदेश के जबलपुर स्थित भारतीय रेलवे के पश्चिम मध्य जोन में ग्रुप डी श्रेणी में जो नियुक्तियां की गयी थीं उसके बदले में राजद सुप्रीमो के परिवार के सदस्यों या सहयोगियों के नाम पर भूखंड दिये गये थे।

सीबीआई ने यह भी दावा किया कि नियुक्तियां नियमों का उल्लंघन करते हुए की गई थीं और लेन-देन में बेनामी संपत्तियां शामिल थीं, जो आपराधिक कदाचार और साजिश के बराबर है।

आरोपियों ने आरोपों से इनकार करते हुए दावा किया है कि मामला राजनीति से प्रेरित है।

भाषा राजकुमार दिलीप

दिलीप

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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