श्रीनगर: सोनी देवी और वीरेंद्र सिंह भंडारी अब दो तरह की ज़िंदगी जी रहे हैं—सुबह किसान और दिन में प्रदर्शनकारी. पिछले तीन साल से 19 साल की अंकिता भंडारी के माता-पिता सुबह गाय का दूध दुहने और अपनी बेटी के लिए न्याय की लड़ाई लड़ने की दिनचर्या में बंधे रहे हैं. सितंबर 2022 में अंकिता की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी और परिवार का आरोप है कि उसका यौन उत्पीड़न भी किया गया था. अब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से हुई एक मुलाकात, जिससे उन्हें न्याय और समाधान मिलने की उम्मीद थी, ने उनकी ज़िंदगी को एक बार फिर उलट-पुलट कर दिया है.
7 जनवरी को बैठक से बाहर निकलकर जब देवी रात के लिए सरकारी गेस्ट हाउस पहुंचीं, तो उनके व्हाट्सऐप पर लगातार मैसेज आ रहे थे, जिन्हें पढ़कर वे सन्न रह गईं.
एक मैसेज में लिखा था, “हमने अंकिता के लिए लड़ाई लड़ी और आप मुख्यमंत्री से मिलकर समझौता कर आईं.”
दो दिनों में पहली बार खाना खाने की तैयारी कर रहीं देवी ने थाली एक तरफ रख दी और फूट-फूटकर रो पड़ीं.
रोते हुए उन्होंने कहा, “मैंने मुख्यमंत्री से वही मांगें दोहराईं जो हम सड़कों पर उठाते आए हैं. मैंने कोई समझौता नहीं किया. अंकिता मेरी बेटी है. मैं कुछ पैसों के बदले उसका न्याय नहीं बेचूंगी. मुझे पता है मैंने क्या खोया है.”
ऋषिकेश के वनंतरा रिसॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट रही अंकिता की हत्या को लेकर उत्तराखंड में फिर से विरोध प्रदर्शन भड़क उठे. सहारनपुर की अभिनेत्री उर्मिला सनावर—जो खुद को पूर्व बीजेपी विधायक सुरेश राठौर की पत्नी बताती हैं, उन्होंने उनसे हुई बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग जारी की, जिसमें राजनीतिक रूप से जुड़े वीआईपी लोगों की कथित भूमिका का आरोप लगाया गया. इसके बाद अंकिता के परिवार ने मौजूदा सुप्रीम कोर्ट जज की निगरानी में सीबीआई जांच और तीनों दोषी ठहराए गए लोगों व ऑडियो में नाम लिए गए वीआईपी लोगों की कॉल डिटेल्स सार्वजनिक करने की मांग की.
हालांकि, राज्य सरकार ने आखिरकार सीबीआई जांच मान ली है, लेकिन अंकिता के माता-पिता के लिए यह जीत अधूरी है. आदेश में वह सुप्रीम कोर्ट-निगरानी शामिल नहीं है, जिसकी वे मांग कर रहे थे और जिसके बारे में उनका कहना है कि वही अपराध से जुड़े कथित “वीआईपी मेहमान” का पर्दाफाश कर सकती थी.
देवी ने कमज़ोर लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा, “यह एक सुविधाजनक आदेश है. सुप्रीम कोर्ट के जज की निगरानी में जांच क्यों नहीं? राज्य क्या छिपाना चाहता है? उन्हें लगता है कि हम गांव से हैं, इसलिए हमें कुछ नहीं पता.”
लेकिन यह आदेश हासिल करना भी अपने आप में एक बेहद कठिन लड़ाई थी.
धामी से हुई बैठक के अंदर की कहानी
7 जनवरी की दोपहर पौड़ी के जिला मजिस्ट्रेट का फोन आया. उन्होंने सोनी देवी और वीरेंद्र को बताया कि मुख्यमंत्री धामी उनसे मिलना चाहते हैं. फोन प्रेशर कुकर की सीटी की आवाज़ के बीच कट गया. दोपहर 1 बजे, जैसे ही दंपति खाना खाने बैठे, एक और कॉल आया कि पौड़ी की मुख्य सड़क पर उनके लिए एक कार खड़ी है.
वीरेंद्र ने कहा, “हमने खाना वैसे ही छोड़ दिया और सड़क तक पहुंचने के लिए एक घंटे पैदल चले, फिर कार ली.”
बैठक के दौरान अंकिता के माता-पिता ने दो मांगें रखीं: सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज की निगरानी में सीबीआई जांच और मामले में कथित रूप से शामिल वीआईपी की पहचान. बैठक के बाद अधिकारियों ने उन्हें एक पहले से लिखा हुआ बयान हस्ताक्षर के लिए दिया, लेकिन वीरेंद्र ने उस पर साइन करने से इनकार कर दिया.
उन्होंने कहा, “मैंने कहा कि मैं अपनी मांगें अपने हाथ से लिखूंगा. उन्हें लगा कि हम अनपढ़ हैं.” इसके बाद माता-पिता ने वहीं एक पत्र लिखा, उस पर हस्ताक्षर किए और अधिकारियों को सौंप दिया.

उस शाम वे सरकारी गेस्ट हाउस लौटे. उन्हें नहीं पता था कि बैठक से क्या हासिल हुआ, लेकिन दोनों को इस बात की राहत थी कि उन्होंने हार नहीं मानी.
बैठक के तुरंत बाद मुख्यमंत्री की एक तस्वीर वायरल हो गई, जिसमें वह माता-पिता के कंधों पर शॉल डालते दिख रहे थे. सोशल मीडिया और माता-पिता के फोन पर आलोचनाओं की बाढ़ आ गई. आरोप लगाए गए कि परिवार ने लड़ाई छोड़ दी है और सरकार से पैसे ले लिए हैं. वे न्याय मांगने गए थे, लेकिन लौटे तो उन पर विश्वासघात के आरोप लगने लगे.
वीरेंद्र ने कहा, “हमें रिश्वत देने की कोशिशें हुई हैं, सरकार की तरफ से भी और आरोपियों की तरफ से आए बिचौलियों की ओर से भी. लेकिन मैं कभी नहीं झुका.”

सोनी देवी भी अब एक जुझारू कार्यकर्ता बन चुकी हैं, प्रदर्शन करती हुईं, सत्ता से बातचीत करती हुई और अपनी बेटी के लिए न्याय की लड़ाई लड़ती हुई.
उन्होंने शांत स्वर में कहा, “मुख्यमंत्री हमारे राजा हैं और हम अपनी बेटी के लिए न्याय मांगने उनके पास गए थे.” समझौते के आरोपों ने उन्हें गहराई से परेशान किया है, खासकर तब, जब राज्य की प्रतिक्रिया उनकी मांगों को मुश्किल से ही पूरा करती है.
सचिवालय से फोन आया कि सीबीआई जांच का आदेश दे दिया गया है. इसके बाद माता-पिता ने दो दिन बाद अपना पहला भोजन किया.
लेकिन देवी ने कहा, “जब हमने अपने वकील से बात की, तो समझ आया कि यह आदेश अधूरा है.”
वीआईपी का सवाल
सोनी देवी और वीरेंद्र के लिए पिछले दो हफ्ते ऐसे रहे हैं जैसे लंबे समय से सुलगता ज्वालामुखी फट पड़ा हो. पौड़ी में उनका घर, जहां ठीक-ठाक सड़क भी नहीं है, वहां वक्त जैसे थम सा गया है. हर दिन बेटी अंकिता और न्याय की लड़ाई पर ही बातचीत होती है.
बाहर, पूरा उत्तराखंड सड़कों पर है. 1990 के दशक के आखिर में हुए राज्य आंदोलन के बाद पहली बार लोगों में इतनी बेचैनी दिखी है. राज्य आंदोलन में शामिल रहे लोग भी अब अंकिता के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं. 18 सितंबर 2022 को अंकिता की हत्या कर दी गई थी और छह दिन बाद उसकी लाश एक नहर से मिली थी. सबूत मिटाने के लिए रिसॉर्ट का एक हिस्सा भी तोड़ दिया गया था. उत्तराखंड हाई कोर्ट में दाखिल एक याचिका में, जिसमें जेसीबी चालक दीपक का बयान शामिल है, कहा गया कि बीजेपी विधायक रेणु बिष्ट ने यह तोड़फोड़ कराने का आदेश दिया था.
मई 2025 में कोटद्वार की सेशंस कोर्ट ने तीन आरोपियों—रिसॉर्ट के मालिक और पूर्व बीजेपी मंत्री विनोद आर्य के बेटे पुलकित आर्य, रिसॉर्ट के मैनेजर सौरभ भास्कर और असिस्टेंट मैनेजर अंकित गुप्ता को दोषी ठहराया और उम्रकैद की सज़ा सुनाई.
यह फैसला मामला खत्म करता हुआ दिखा. मामला शांत हो गया था, जब तक दिसंबर में सनावर ने राठौर के साथ हुई कथित बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग जारी नहीं की.
इन रिकॉर्डिंग्स में सनावर का दावा है कि राठौर ने उससे कहा था कि अंकिता की हत्या इसलिए की गई क्योंकि उसने दो वीआईपी—बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तराखंड प्रभारी दुष्यंत कुमार गौतम और बीजेपी उत्तराखंड महासचिव (संगठन) अजय कुमार को “अतिरिक्त सेवाएं” देने से इनकार कर दिया था.
विपक्ष ने बीजेपी पर हमला बोला. मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि अंकिता की हत्या के समय गौतम उत्तराखंड में मौजूद नहीं थे. राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच, अंकिता का परिवार और उत्तराखंड के लोग सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आए.
देवी ने कहा, “मुझे राजनीति से कोई मतलब नहीं है. शुरू से हम सीबीआई जांच और वीआईपी का नाम सार्वजनिक करने की मांग कर रहे हैं. उम्रकैद की सज़ा के बाद भी हमने कहा था कि और लोग शामिल हैं. किसी ने हमारी बात नहीं सुनी, जब तक यह ऑडियो लीक नहीं हुआ.”
हालांकि, राज्य सरकार ने वीआईपी का नाम लेने से इनकार कर दिया है, लेकिन अंकिता के माता-पिता ने चुप रहने से इनकार कर दिया है. उनकी लगातार लड़ाई ने आखिरकार धामी को उनसे मिलने के लिए मजबूर किया, लेकिन वह बैठक एक नई लड़ाई की शुरुआत बन गई.
नुकसान के साथ जीना
अंकिता की हत्या से आई उथल-पुथल और फिर समझौते के आरोपों के बाद, सोनी देवी को अपनी गाय राधा में एक अनोखा सहारा मिला. जब रातें असहनीय हो जाती थीं—जब यह सोच कि उनकी 19 साल की बेटी ने क्या-क्या सहा होगा, उन्हें सोने नहीं देती थी, तो देवी गौशाला की ओर दौड़ जाती थीं और गाय से बातें करती थीं.
देवी ने कहा, “राधा ने भी अंकिता के लिए लड़ाई लड़ी है. मैं घंटों उसके साथ बैठती थी और वही मुझे आगे लड़ते रहने की ताकत देता था.”
मुख्यमंत्री से मिलने के बाद जब वह घर लौटीं, तो सीधे अपनी गाय के पास गईं और फूट-फूटकर रो पड़ीं.
उन्होंने कहा, “मैं बेकाबू होकर रोई. मैंने सब कुछ उसके कानों में धीरे-धीरे कह दिया” यह कहते हुए वह अपनी उंगलियों की ओर देखती रहीं, जैसे अपने जज़्बातों को शब्दों में पिरोना मुश्किल हो रहा हो.
देवी के लिए उनकी गाय और उनका परिवार ही पूरी दुनिया थे. उनके सपने बहुत साधारण थे: अपने बच्चों को बड़ा होते देखना और वे कमाने लगें, ताकि वह एक दिन काम करना छोड़ सकें.
राजनीति और सत्ता की दुनिया से बहुत दूर, बेटी की मौत ने एक गांव की महिला को ऐसे अनजाने संसार में धकेल दिया, लेकिन इसी ने उनके भीतर एक ऐसी ताकत भी दिखा दी, जिसके बारे में उन्हें खुद भी पता नहीं था—एक शांत दृढ़ता.
देवी ने अपने साफ तौर पर कमज़ोर दिख रहे पति का हाथ थामते हुए कहा, “मेरे और मेरे पति के भीतर अपनी बेटी के लिए न्याय पाने की आग है. उसी ने हमें ज़िंदा रखा है; इसके बिना हम कब के मर चुके होते.”
उनकी ज़िंदगी आगे नहीं बढ़ पाई है. बड़े बेटे की शादी भी नहीं की, जबकि वे करना चाहते थे. हर दिन बातचीत का केंद्र अंकिता ही रहती है. देवी अक्सर बात करते-करते रुक जाती हैं, भावनाओं से भर जाती हैं और उन्हें चक्कर आने लगता है.
वह तीन साल से पेट में पत्थर जैसी पीड़ा के साथ जी रही हैं, लेकिन इलाज नहीं कराया है. उनके पति लगभग हर दिन बीमार रहते हैं. उनकी रहने की हालत इतनी खराब है कि मुख्यमंत्री से मिलकर लौटते समय रास्ते में वीरेंद्र पर एक भालू ने हमला कर दिया.
वीरेंद्र ने कहा, “हमारी बेटी की मौत ने हमारी ज़िंदगी उलट-पुलट कर दी है. हमें नहीं पता कि फिर से सामान्य कैसे हुआ जाए.”
आखिरी मैसेज
अंकिता का अपने एक दोस्त को भेजा आखिरी मैसेज आज भी उनके पिता को डराता रहता है: “मैं गरीब हूं, लेकिन 10,000 रुपये के लिए खुद को नहीं बेचूंगी.” उसने यह मैसेज एक “वीआईपी” की तरफ से मांगी गई “अतिरिक्त सेवाओं” के विरोध में लिखा था.
तब से ‘वीआईपी’ शब्द न सिर्फ अंकिता की अपनी पीड़ा का, बल्कि पूरे उत्तराखंड में फैले गुस्से का प्रतीक बन गया है.
पूरे राज्य में “वीआईपी को बचाना बंद करो” जैसे नारों के साथ विरोध प्रदर्शन होने लगे हैं.
देहरादून की सामाजिक कार्यकर्ता भावना पांडे, जो राज्य आंदोलन के समय भी आगे थीं, कहती हैं कि यह आंदोलन अब सिर्फ अंकिता तक सीमित नहीं रहा. यह पहाड़ों से आने वाली उन सभी लड़कियों को बचाने की लड़ाई बन गया है, जिन्हें पैसों के बदले “अतिरिक्त सेवाएं” देने के लिए मजबूर किया जाता है.
पांडे ने कहा, “ये लड़कियां गरीब होती हैं. वे रोजी-रोटी कमाने और परिवार का सहारा बनने के लिए पहाड़ों से आती हैं, लेकिन ये वीआईपी (अमीर-ताकतवर लोग) उनकी मजबूरी का फायदा अपने स्वार्थ के लिए उठाते हैं.”
इसके बाद सुर्खियां बनीं: “क्या है अंकिता हत्याकांड की वीआईपी थ्योरी” और “कौन है वह वीआईपी?”
देवी बताती हैं कि अंकिता एक होनहार छात्रा थी. उसने 12वीं की परीक्षा में 88 प्रतिशत अंक हासिल किए थे. उसकी पढ़ाई का खर्च पिता की खेती की कमाई और परिवार द्वारा बेचे गए दूध से चलता था.
देवी ने कहा, “वह बहुत समझदार थी और कुछ बड़ा करने का सपना देखती थी—एक दिन मैदानों में अपना खुद का घर होने का सपना.”
अंकिता के पिता वीरेंद्र अक्सर दीवार की ओर देखते रहते हैं, सोच में डूबे हुए और कभी-कभी वह खामोशी तोड़ते हुए बुदबुदाते हैं.
उन्होंने कहा, “मेरी बेटी ने कहा था कि इसमें कोई वीआईपी शामिल है. जब तक उस वीआईपी की पहचान नहीं हो जाती, मुझे चैन नहीं मिलेगा.”
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