आगरा: जाली दस्तावेज़ के जरिए आगरा में अवैध रूप से रह रहे 38 बांग्लादेशी नागरिकों को 13 जनवरी को देश से बाहर भेजा जाएगा. ये लोग विदेशियों अधिनियम के तहत तीन साल की जेल की सज़ा और हिरासत पूरी कर चुके हैं.
20 पुरुष, 10 महिलाएं और 8 बच्चों वाले इस समूह को शनिवार को कड़ी पुलिस सुरक्षा के बीच बस से पश्चिम बंगाल भेजा गया. इन्हें आगरा जिला जेल और एक बाल सुधार गृह से रिहा किए जाने के बाद भेजा गया. सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) इन्हें 13 जनवरी को कोलकाता में बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड को सौंपेगा.
उत्तर प्रदेश पुलिस ने इन सभी प्रवासियों को, जो सभी झुग्गियों में रहने वाले थे, 5 फरवरी 2023 की आधी रात को आगरा के सिकंदरा इलाके में आवास विकास कॉलोनी के सेक्टर 14 में छापेमारी कर पकड़ा था.
यह छापेमारी इस तरह समय तय करके की गई थी कि सभी लोग घरों में मौजूद हों. यह कार्रवाई भारत में होने वाले जी20 शिखर सम्मेलन से पहले खुफिया जानकारी और स्थानीय लोगों से मिली सूचनाओं के आधार पर की गई थी.
आगरा के एसीपी (लोकल इंटेलिजेंस यूनिट) दिनेश सिंह ने कहा, “अवैध प्रवासियों को कोलकाता में बीएसएफ को सौंपा जाएगा, जहां से 13 जनवरी को उन्हें देश से बाहर भेजा जाएगा.”
छापेमारी के दौरान जांचकर्ताओं को फर्ज़ी आधार कार्ड और अन्य पहचान पत्र मिले. पुलिस ने बताया कि ये लोग कई सालों से इलाके में रह रहे थे और इसी दौरान उन्होंने आधार और पैन कार्ड बनवा लिए थे. पुरुष कबाड़ी का काम करते थे और महिलाएं आसपास की कॉलोनियों में घरेलू काम करती थीं.
सिकंदरा थाने में मामला दर्ज किया गया और अदालत ने जुलाई 2025 में विदेशियों अधिनियम के उल्लंघन और फर्ज़ी पहचान व निवास दस्तावेज़ बनाने के आरोप में इन्हें तीन साल की जेल की सज़ा सुनाई. इस सज़ा में पहले से हिरासत में बिताया गया वक्त भी शामिल था. अच्छे आचरण के चलते शनिवार दोपहर रिहाई से पहले उनकी सजा कुछ दिनों के लिए कम कर दी गई.
आठ बच्चों, पांच लड़के और तीन लड़कियां, को एक बाल सुधार गृह में रखा गया था.
भारत का सीमा सुरक्षा बल इस निर्वासन की प्रक्रिया के लिए बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड के साथ समन्वय करेगा.
इसी तरह के एक मामले में, आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) ने 3 दिसंबर 2025 को दो बांग्लादेशी नागरिकों—मामुन शेख और सुनील, को देश से बाहर भेजा था. दोनों को 4 जनवरी 2022 को गिरफ्तार किया गया था और उनके पास से 50 सऊदी रियाल और 62 नकली नोट मिले थे. सज़ा पूरी करने के बाद उन्हें निर्वासित किया गया.
ये निर्वासन देश में अवैध प्रवासियों की पहचान और उन्हें बाहर भेजने की व्यापक मुहिम के बीच हो रहे हैं.
पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा-नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को सुझाव दिया था कि बांग्लादेश भेजे गए छह लोगों को “अस्थायी उपाय” के तौर पर वापस लाया जाए. अदालत ने कहा था कि इससे उन्हें अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए पूरी सुनवाई का मौका मिलेगा.
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा था, “अगर कोई व्यक्ति बांग्लादेश का अवैध प्रवासी है, तो हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन अगर कोई यह दिखाता है कि वह भारतीय नागरिक है और सबूत पेश कर सकता है, तो उसे सुने जाने का अधिकार है.”
इन अभियानों को अदालतों में चुनौती भी दी गई थी, क्योंकि दिल्ली-एनसीआर की झुग्गी बस्तियों से दर्जनों बंगाली भाषी मजदूरों को अवैध प्रवासी होने के शक में हिरासत में लिया गया था.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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