नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने फर्ज़ी एप्पल सपोर्ट कॉल सेंटर चलाने के आरोपी सात लोगों को गुरुवार को ज़मानत दे दी. कारण यह रहा कि पुलिस किसी भी पीड़ित की पहचान नहीं कर पाई, न ही पैसों के लेन-देन (मनी ट्रेल) को साबित कर सकी. पुलिस ने कोर्ट को यह भी बताया कि वह अब भी अमेरिका की फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (एफबीआई) से मदद का इंतज़ार कर रही है.
ये गिरफ्तारियां पिछले महीने दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच द्वारा उत्तर दिल्ली के गुलाबी बाग इलाके में एक फ्लैट पर छापा मारने के बाद हुई थीं. पुलिस का दावा था कि उसने एक अवैध कॉल सेंटर के जरिए अमेरिकी नागरिकों को ठगने वाले अंतर्राष्ट्रीय धोखाधड़ी रैकेट का भंडाफोड़ किया है.
यह छापा एक सूचना के आधार पर मारा गया था. पुलिस अधिकारियों ने आरोपियों से लैपटॉप और मोबाइल फोन जब्त किए और कहा कि इनमें VoIP सॉफ्टवेयर और अंतर्राष्ट्रीय नंबरों के इस्तेमाल के सबूत मिले हैं.
आरोपियों को ज़मानत देते हुए अदालत ने कहा कि छापे के तीन हफ्ते से ज्यादा समय बाद भी जांच में किसी एक भी पीड़ित की पहचान नहीं हो सकी है. न तो किसी विदेशी नागरिक की शिकायत सामने आई है और न ही कोई पक्का मनी ट्रेल मिला है.
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (उत्तर) प्रियंका राजपूत की अदालत ने पाया कि जांच अभी शुरुआती चरण में है. जांच अधिकारी ने माना कि पुलिस पीड़ितों की पहचान और पैसों के लेन-देन से जुड़ी जानकारी के लिए एफबीआई का इंतज़ार कर रही है, और इसमें 30 से 60 दिन और लग सकते हैं.
अदालत ने कहा कि पुलिस के पास आरोपियों को किसी खास धोखाधड़ी से जोड़ने के लिए “कोई ठोस सबूत” नहीं है. अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन का मामला लगभग पूरी तरह आरोपियों के बयान (पुलिस के सामने दिए गए कबूलनामे) पर टिका है, जो बिना स्वतंत्र पुष्टि के सबूत के तौर पर मान्य नहीं होते.
मजिस्ट्रेट ने यह भी कहा कि आरोपियों को अनिश्चित समय तक न्यायिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता और डिजिटल सबूतों से छेड़छाड़ की संभावना बहुत कम है. 50,000 रुपये के निजी मुचलके और उतनी ही राशि की ज़मानत पर उन्हें रिहा किया गया.
पुलिस के अनुसार, आरोपी टोल-फ्री नंबरों का इस्तेमाल कर खुद को एप्पल सपोर्ट का अधिकारी बताकर अमेरिकी नागरिकों को ठगते थे. पीड़ितों को स्क्रीनकनेक्ट और अन्य ऐप्स के जरिए अपने कंप्यूटर का रिमोट एक्सेस देने के लिए गुमराह किया जाता था. एक बार एक्सेस मिलने पर, आरोपियों ने कथित तौर पर पीड़ितों को बिटकॉइन और अन्य क्रिप्टोकरेंसी खरीदने के लिए मजबूर किया, जिसे बाद में उनके साथियों के वॉलेट में ट्रांसफर कर दिया जाता था.
दिल्ली पुलिस ने इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 318(4) और 319 के तहत केस दर्ज किया है, जो धोखाधड़ी और पहचान बदलकर अपराध करने से जुड़ी हैं.
आरोपियों की ओर से पेश हुए वकील गुरमुख सिंह अरोड़ा ने पुलिस जांच में प्रक्रियागत कमियों की ओर इशारा किया. उन्होंने कहा कि पुलिस ने भले ही छापे को “गुप्त सूचना” के आधार पर बताया हो, लेकिन इस संबंध में कोई डेली डायरी (डीडी) एंट्री दर्ज नहीं की गई.
डेली डायरी हर पुलिस थाने में रखी जाने वाली अनिवार्य रिकॉर्ड बुक होती है, जिसमें महत्वपूर्ण घटनाएं और सूचनाएं दर्ज की जाती हैं.
उन्होंने यह भी कहा कि इतने बड़े कथित ऑपरेशन के बावजूद न तो किसी स्वतंत्र सार्वजनिक गवाह को छापे या गिरफ्तारी में शामिल किया गया और न ही जब्त किए गए डिवाइस चालू हालत में पाए गए—वे “बंद या गैर-ऑपरेशनल” थे.
अरोड़ा ने दलील दी, चूंकि अब तक न कोई पीड़ित पहचाना गया, न किसी विदेशी नागरिक की शिकायत आई और न ही कोई मनी ट्रेल साबित हुआ, इसलिए आरोपियों को जेल में रखना गलत है.
मजिस्ट्रेट ने माना कि फिलहाल अभियोजन का मामला लगभग पूरी तरह आरोपियों के बयानों पर ही आधारित है. साक्ष्य कानून के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, ऐसे बयान बिना स्वतंत्र पुष्टि के अदालत में मान्य नहीं होते.
आदेश में कहा गया है, “अब तक न तो किसी पीड़ित की पहचान हुई है, न किसी प्रभावित व्यक्ति की शिकायत मिली है और न ही कोई मनी ट्रेल…स्थापित हुई है.” अदालत ने यह भी कहा कि सबूत डिजिटल हैं और पहले ही जब्त किए जा चुके हैं.
क्योंकि लैपटॉप और फोन पुलिस की हिरासत में हैं, इसलिए सबूतों से छेड़छाड़ की संभावना बहुत कम है. अदालत ने यह भी कहा कि चूंकि मुख्य गवाह या तो पुलिस अधिकारी हैं या अज्ञात विदेशी नागरिक, इसलिए गवाहों को डराने-धमकाने की आशंका भी नहीं है.
अदालत ने अभियोजन की यह दलील खारिज कर दी कि आरोपियों को इसलिए हिरासत में रखना ज़रूरी है क्योंकि कॉल सेंटर के सह-आरोपी/मालिक अब भी फरार हैं.
अदालत ने कहा, “अन्य लोगों का कथित रूप से फरार होना अपने आप में मौजूदा आरोपियों की दोषसिद्धि साबित नहीं करता और न ही उनकी लगातार न्यायिक हिरासत को सही ठहराता है.”
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