जम्मू, 11 जनवरी (भाषा) कश्मीरी पंडितों के एक संगठन ने समुदाय के खिलाफ हुई हिंसा और उसके विस्थापन को कानूनी रूप से “नरसंहार” घोषित करने की मांग दोहराते हुए घाटी में केंद्र के प्रत्यक्ष संरक्षण में एक अलग भू-भाग स्थापित किए जाने की मांग की है।
विस्थापित कश्मीरी पंडितों का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रमुख संगठन पनुन कश्मीर ने यह मांग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को संबोधित पांच पन्नों के एक ज्ञापन में उठाई है।
संगठन ने यहां ज्ञापन जारी करते हुए कश्मीर घाटी से समुदाय के विस्थापन को स्वतंत्र भारत के सबसे गंभीर अपराधों में से एक बताया और कहा कि लक्षित हत्याओं, धमकियों और धार्मिक सफाए के बाद कश्मीरी पंडित पिछले 35 वर्षों से अधिक समय से आंतरिक निर्वासन में जीवन बिता रहे हैं।
संगठन के महासचिव कुलदीप रैना द्वारा हस्ताक्षरित ज्ञापन में कहा गया, “शुरुआत में जिसे एक अस्थायी संकट माना गया था, वह संस्थागत उदासीनता के कारण स्थायी अन्याय में बदल गया है। पनुन कश्मीर का मानना है कि कोई भी प्रशासनिक राहत, कल्याणकारी पैकेज या पुनर्वास योजना न्याय के दो मूलभूत कदमों—नरसंहार की औपचारिक कानूनी मान्यता और एक अलग, सुरक्षित भू-भाग —का विकल्प नहीं हो सकती।”
संगठन ने अपनी सात प्रमुख मांगों को रेखांकित करते हुए पनुन कश्मीर द्वारा प्रस्तावित नरसंहार विधेयक, 2020 को लागू करने की मांग की।
ज्ञापन में कहा गया कि नरसंहार को नाम नहीं दिए जाने से न तो जवाबदेही तय हो पाई और न ही भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने की कोई गारंटी बनी।
संगठन ने कहा कि अलग भू-भाग (होमलैंड) की मांग सीधे तौर पर नरसंहार की मान्यता से जुड़ी है और बिना क्षेत्रीय सुरक्षा के 1990 से पहले जैसी परिस्थितियों में वापसी न तो व्यावहारिक है और न ही नैतिक।
इस संदर्भ में 1991 के मार्गदर्शन प्रस्ताव का उल्लेख करते हुए कहा गया कि अलग भू-भाग की परिकल्पना सुरक्षा, सांस्कृतिक अस्तित्व और गरिमा के ढांचे के रूप में की गई थी।
भाषा
राखी अविनाश
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