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Monday, 12 January, 2026
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ट्रंप 1991 के बाद अमेरिका की बनाई दुनिया को बिखेर रहे हैं. वह दूसरी महाशक्ति को स्वीकार नहीं करते

मल्टीपोलैरिटी की तमाम बातों के बावजूद, डॉनल्ड ट्रंप जानते हैं कि दुनिया अभी भी यूनिपोलर है और वे बिना किसी दिखावे के अपनी ताकत दिखा रहे हैं.

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अपने 80 साल से ज्यादा के इतिहास के ज्यादातर हिस्से में संयुक्त राष्ट्र ने एक बंटी हुई दुनिया की अध्यक्षता की है. वह न तो शांति सुनिश्चित कर सका और न ही समृद्धि. यहां तक कि यूरोप में भी, जहां 20वीं सदी के पहले हिस्से में हुए युद्धों ने दुनिया को झकझोर दिया और इसी वजह से इस संगठन की स्थापना हुई, वहां यूरोपीय संघ ने शांति और समृद्धि के लिए संयुक्त राष्ट्र से ज्यादा काम किया.

हकीकत यह है कि नियम-आधारित व्यवस्था की सबसे ऊंची संस्था और सबसे बड़ा प्रतीक होने के बावजूद, संयुक्त राष्ट्र हमेशा ताकतवर देशों की रियलपॉलिटिक पर एक परत भर रहा है. अब, वेनेजुएला के मौजूदा राष्ट्रपति का अपहरण करके और अमेरिका को 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकालकर, ट्रंप उस परत को हटा रहे हैं और दुनिया को उसके असली रूप में सामने ला रहे हैं. यह एक ऐसी दुनिया है जहां ताकत ही सही है, मेरा तरीका या कोई रास्ता नहीं, और जो लगभग डार्विनवादी किस्म की है.

1945 से 1991 के बीच के वर्षों में दुनिया में दो महाशक्तियां थीं, अमेरिका और सोवियत संघ. ये दोनों दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अपनी मर्जी से दखल देते थे. कभी प्रॉक्सी युद्धों के जरिए, तो अक्सर सीधे तौर पर. दो महाशक्तियों के होने से दुनिया को शायद संतुलन और नियंत्रण का अहसास मिलता था, लेकिन यह कोई संस्थागत व्यवस्था नहीं थी और सोवियत संघ के टूटने तक ही कायम रही.

1990 के दशक में आया एकध्रुवीय विश्व अपेक्षाकृत ज्यादा सहयोगी नजर आया. यह ‘इतिहास के अंत’ जैसा दौर था, जहां एक राजनीतिक विचारधारा, लोकतंत्र, और एक आर्थिक अनिवार्यता, मुक्त बाजार, देशों को परिभाषित करने वाली थी. वास्तव में, यही एक बड़ा कारण था कि एकध्रुवीय दुनिया डार्विनवादी नहीं लगी. आर्थिक ग्लोबलाइज़ेशन और उसका मुख्य औजार, मुक्त बाजार, को 1980 के दशक में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और ब्रिटेन की तत्कालीन प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर ने बढ़ावा दिया. 1991 तक, पूर्व दूसरा विश्व, यानी यूरोप का कम्युनिस्ट ब्लॉक, बाजार आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ चुका था. यहां तक कि विकासशील देशों का ‘तीसरा विश्व’ भी बाजारों के वादे को अपनाने लगा, जिसकी अगुवाई दुनिया की दो सबसे ज्यादा आबादी वाले देशों, चीन और भारत, ने की.

अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने ग्लोबलाइज़ेशन के इस दौर को आगे बढ़ाने में भूमिका जरूर निभाई. हालांकि इसमें संयुक्त राष्ट्र की भूमिका कम रही. ज्यादा अहम थे ब्रेटन वुड्स की जुड़वां संस्थाएं, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ और विश्व बैंक. इन दोनों ने लैटिन अमेरिका से लेकर अफ्रीका और एशिया तक के विकासशील देशों में संरचनात्मक बाजार सुधार और वित्तीय अनुशासन को बढ़ावा दिया और इसके लिए वित्तीय मदद भी की. विश्व व्यापार संगठन यानी डब्ल्यूटीओ ने अपने पूर्ववर्ती जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ्स एंड ट्रेड यानी गैट की जगह ली, ताकि सीमाओं के पार वस्तुओं का मुक्त प्रवाह सुनिश्चित किया जा सके.

बेशक, ब्रेटन वुड्स संस्थानों पर अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों का दबदबा रहा है. अमेरिका के पास इन दोनों संगठनों के बोर्ड के फैसलों पर प्रभावी वीटो था और अब भी है. इन संस्थानों की बौद्धिक दिशा रीगन और थैचर द्वारा अपनाए गए विचारों से प्रभावित रही. डब्ल्यूटीओ भले ही ‘एक देश, एक वोट’ के सिद्धांत पर आधारित हो, लेकिन यह पहल भी अमेरिका के नेतृत्व में ही हुई थी.

ग्लोबलाइज़ेशन का दौर

असल में, ग्लोबलाइज़ेशन का दौर अमेरिका के नेतृत्व में दुनिया को एक क्रम में ढालने का प्रयास था. इसके फायदे समान रूप से नहीं बंटे, फिर भी दुनिया के बड़े हिस्से ने इसे अपनाया. कुछ सबसे बड़े और प्रभावशाली देशों ने इसका पूरा लाभ उठाया. चीन और भारत ने करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला, जो संयुक्त राष्ट्र के विकास कार्यक्रमों या सहायता प्रयासों से कभी संभव नहीं हो पाता.

कुल मिलाकर एशिया ने अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से बेहतर प्रदर्शन किया. और भले ही ग्लोबलाइज़ेशन के दौर में अमेरिका को देशों को अपनी सैन्य ताकत से धमकाने या सैन्य गठबंधनों में जबरन शामिल करने की जरूरत नहीं पड़ी, यह समय पूरी तरह एकध्रुवीय और अमेरिका के वर्चस्व वाला था. अफगानिस्तान, इराक, फिलिस्तीन, रवांडा, बुरुंडी और कांगो में युद्ध हुए, जिनमें अमेरिका ने या तो दखल दिया या दखल नहीं दिया. इनके नतीजों या संघर्षों को अपने इलाके से बाहर किसी और देश ने प्रभावित नहीं किया.

आखिरकार मुक्त बाजार अर्थशास्त्र अपने ही घर में 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के साथ ढह गया. “मोटे मुनाफाखोर” बैंकरों और वित्तीय संस्थानों को बचाया जाना, जबकि आम मजदूरों की नौकरियां मुक्त व्यापार या तकनीकी बदलाव के कारण चली गईं, स्वाभाविक रूप से गुस्से और प्रतिक्रिया को जन्म देने वाला था. ट्रंप उसी प्रतिक्रिया का रूप थे. चीन का उभरकर अमेरिका के लिए एक वास्तविक खतरा बन जाना, उन आशंकाओं को और बढ़ाने वाला था, जिसने ट्रंप को हवा दी.

अपने दूसरे कार्यकाल में ट्रंप की प्रतिक्रिया यह रही कि उन्होंने उस व्यवस्था को तोड़ना शुरू कर दिया, जिसे अमेरिका ने 1945 से, और खास तौर पर 1991 के बाद से संभाल कर रखा था, जब मुकाबले के लिए कोई दूसरी महाशक्ति बची नहीं थी.

व्यापार पहला निशाना बना, क्योंकि इसका असर पुराने मैन्युफैक्चरिंग बेल्ट के औसत अमेरिकी मतदाता पर सीधे पड़ता था. यही बात श्रम की अपेक्षाकृत आसान आवाजाही पर भी लागू होती है. इसके बाद वैश्विक व्यवस्था की संस्थाएं स्वाभाविक रूप से निशाने पर आ गईं. संयुक्त राष्ट्र, जो अपने पूरे इतिहास में काफी हद तक अप्रभावी रहा है, आसान लक्ष्य है. हैरानी की बात यह है कि ट्रंप ने पूरे ढांचे से बाहर निकलने के बजाय चुनिंदा संगठनों और एजेंसियों से ही अमेरिका को अलग किया है.

बहुध्रुवीयता की तमाम चर्चाओं के बावजूद, ट्रंप जानते हैं कि दुनिया अभी भी एकध्रुवीय है और वह बिना किसी आवरण के ताकत का इस्तेमाल कर रहे हैं. व्यापार से लेकर युद्ध तक, ताकत ही सही है. खासकर तब, जब कोई देश दबाव बनाने वाले अमेरिका की लाइन पर नहीं चलता. किसी बिंदु पर चीन एक बराबरी की ताकत बन जाएगा. तब दुनिया फिर बदलेगी. तब तक, एक बंटी हुई दुनिया, जहां हर कोई अपने लिए है, और एकमात्र महाशक्ति को चलते-चलते ही आपसी व्यवहार के नियमों पर दोबारा सोच करना होगा.

लेखक वेदांता के चीफ इकोनॉमिस्ट हैं. वह @nayyardhiraj पर ट्वीट करते हैं. विचार व्यक्तिगत हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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