पिछले एक हफ्ते से भारत में असल में क्रिकेट पर बहस नहीं हो रही थी. ऊपर से सवाल सीधा था: क्या कोलकाता नाइट राइडर्स द्वारा बांग्लादेशी क्रिकेटर मुस्तफिज़ुर रहमान को बाहर करना सही फैसला था या गलत? लेकिन इसके बाद जो शोर मचा, उसने साफ कर दिया कि मामला कुछ और ही था. ड्रेसिंग रूम में कूटनीति घुस आई, पिच पर राष्ट्रवाद उतर आया और खेल की समझ की जगह वफादारी की परीक्षा होने लगी.
बीजेपी के एक नेता तो यहां तक कह गया कि बांग्लादेशी खिलाड़ी को टीम में रखने के लिए शाहरुख खान देशद्रोही हैं. केकेआर की सह-मालिकाना शाहरुख खान, जूही चावला और जय मेहता के पास है और यह फ्रेंचाइज़ी बीसीसीआई द्वारा तय किए गए सभी नियमों के तहत काम करती है. बांग्लादेश ने जवाब में आईपीएल के प्रसारण पर रोक लगा दी और यह कहते हुए कि खिलाड़ियों की सुरक्षा को लेकर चिंता है, यह घोषणा की कि वह 2026 टी20 वर्ल्ड कप के भारत में होने वाले अपने मुकाबले नहीं खेलेगा.
एक फ्रेंचाइज़ी का फैसला कूटनीतिक टकराव में बदल गया. जो बात खेल तक सीमित रहनी चाहिए थी, वह देशभक्ति और सीमाओं पर जनमत संग्रह बन गई.
यहां एक बेहद अहम फर्क है, जिसे जानबूझकर धुंधला कर दिया गया है.
युद्ध या आतंकी हमले के जवाब में किसी राष्ट्रीय टीम का बहिष्कार करना न तो नया है और न ही गलत. मैंने खुद भी पहले ऐसा तर्क दिया है—जब पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादी हमलों में निर्दोष नागरिक मारे गए, तब यह उम्मीद करना कि भारत ऐसे खेले जैसे कुछ हुआ ही नहीं, नैतिक रूप से खोखला था. ऐसे मौकों पर क्रिकेट टीम उस देश का प्रतीक बन जाती है जिसका वह प्रतिनिधित्व करती है और फिर भी, तब भी बीसीसीआई ने संकल्प की जगह कमाई को चुना और जनता की भावना को नज़रअंदाज़ कर दिया, क्योंकि भारत–पाकिस्तान मैच छोड़ना बहुत ज्यादा मुनाफे वाला सौदा होता है.
लेकिन मुस्तफिज़ुर का मामला अलग है. यह न तो राष्ट्रीय मैच था, न दो झंडों के बीच मुकाबला और न ही ऐसा मौका जब कोई टीम राज्य का प्रतीक बनकर खेल रही हो. यह एक निजी फ्रेंचाइज़ी लीग है, जो इसी विचार पर बनी है कि दुनिया भर के खिलाड़ी साथ आकर क्रिकेट खेलें और राजनीति को बाउंड्री के बाहर छोड़ दें.
मुस्तफिज़ुर रहमान बांग्लादेश का नहीं, कोलकाता का प्रतिनिधित्व कर रहे थे—ठीक वैसे ही जैसे सालों से कई विदेशी खिलाड़ी भारतीय फ्रेंचाइज़ियों के लिए खेलते आए हैं. सिर्फ उनकी राष्ट्रीयता के कारण उन्हें अलग करना चुनिंदा और सुविधाजनक नैतिक सोच को दिखाता है और अगर राष्ट्रीय हित, अल्पसंख्यकों पर अत्याचार और अन्याय सच में कसौटी हैं, तो फिर निरंतरता की मांग कहीं ज्यादा सख्त और असहज फैसलों की होगी—ऐसे फैसले, जिन्हें बीसीसीआई बार-बार लेने से बचता रहा है.
रिश्ते सुधारकर फिर तोड़ना
इस पूरे मामले को और भी हैरान करने वाली बात इसका वक्त है. महज़ एक हफ्ते पहले भारत बिल्कुल अलग संकेत दे रहा था. विदेश मंत्री एस जयशंकर ढाका गए थे और बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री खालिदा ज़िया के जनाज़े में शरीक हुए थे. इसे दोनों देशों के रिश्तों को संभालने और एक नया अध्याय शुरू करने की कोशिश के तौर पर देखा गया—एक ऐसा संदेश जो मरम्मत, भरोसे और इस धारणा को रोकने से जुड़ा था कि यूनुस सरकार के तहत बांग्लादेश भारत से दूर होकर चीन और पाकिस्तान की ओर झुक रहा है.
इस पृष्ठभूमि में मुस्तफिज़ुर विवाद बिल्कुल उलटा संदेश देता है—सिर्फ बांग्लादेशी सरकार या उसके नेतृत्व को नहीं, बल्कि सीमा के उस पार देख रहे आम बांग्लादेशियों को भी.
जब किसी निजी भारतीय लीग में एक बांग्लादेशी क्रिकेटर को ऐसे कारणों से किनारे किया जाता है जिनका खेल से कम ही लेना-देना है, तो यह सरकार की नाकामियों और लोगों की पहचान के बीच का फर्क मिटा देता है. परिपक्व लोकतंत्र ऐसे प्रभाव नहीं बनाते; इसी तरह वे नैतिक आधार और रणनीतिक पकड़, दोनों खो देते हैं.
इसका मतलब यह नहीं है कि भारत की चिंताएं गलत हैं.
यूनुस सरकार कई मोर्चों पर असफल रही है—सबसे गंभीर रूप से अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं की सुरक्षा में, जिन पर हमले बढ़े हैं. भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को “लैंडलॉक्ड” कहने जैसी टिप्पणियां सिर्फ लापरवाह ही नहीं, बल्कि ऐसे क्षेत्र में चिंताजनक भी हैं जहां भूगोल, भरोसा और सहयोग गहराई से जुड़े हैं. भारत के पास विरोध करने की पूरी वजह थी और उसने सही तरीके से ऐसा किया भी.
बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा या वहां के राजनीतिक नेतृत्व के फैसलों को लेकर भारत की चिंताओं की लड़ाई कूटनीति, दबाव और सिद्धांतों के साथ संवाद के जरिए लड़ी जानी चाहिए, न कि व्यक्तिगत खिलाड़ियों को नुकसान पहुंचाकर. वरना हम वही करने लगते हैं, जिसका हम विरोध करने का दावा करते हैं: नाराज़गी बढ़ाना, पहचान को और कठोर बनाना और भारत-विरोधी आवाज़ों के लिए यह कहना आसान बना देना कि नई दिल्ली सरकार और जनता में फर्क नहीं करती. लंबे समय में, ऐसे प्रतीकात्मक कदम फायदे से ज्यादा नुकसान ही करते हैं.
साथ ही, बांग्लादेश एक अहम सच्चाई को नज़रअंदाज़ करता दिख रहा है: भारत लगातार उसका सबसे भरोसेमंद पड़ोसी रहा है. “नेबरहुड फर्स्ट” नीति से लेकर आर्थिक सहयोग और मानवीय मदद तक, भारत ने मुश्किल वक्त में बांग्लादेश का साथ दिया है. रिश्तों को सुधारने के बजाय, यूनुस सरकार ने आईपीएल प्रसारण पर रोक और भारत में होने वाले वर्ल्ड कप से हटने जैसे कदम उठाकर तनाव बढ़ाने का रास्ता चुना है. ऐसे फैसले भले ही देश के भीतर अंक बटोर लें, लेकिन लंबे समय के रिश्तों को नुकसान पहुंचाते हैं.
शाहरुख खान पर हुए हमले इस पूरे मामले को और भी निराशाजनक बना देते हैं. बीसीसीआई के अपने फैसले के तहत उपलब्ध खिलाड़ी को टीम में शामिल करने पर उन्हें “देशद्रोही” कहना न सिर्फ गलत है, बल्कि बेवजह है. इससे क्रिकेट का मामला हिंदू–मुस्लिम बहस में बदल जाता है, जिसकी भारत को और ज़रूरत नहीं है. ऐसी भाषा सस्ती लोकलुभावन राजनीति को दिखाती है, जहां कम-ज्ञात नेता सिर्फ सुर्खियों और पहचान के लिए बड़े नाम को निशाना बनाते हैं.
इन हमलों के पीछे एक गहरी असहजता भी है. शाहरुख खान जैसे लोग उनकी राजनीति को चुनौती देते हैं—वह मुस्लिम हैं, फिर भी हिंदुओं समेत हर समुदाय में लाखों लोग उन्हें प्यार करते हैं. यह सच्चाई उनके नैरेटिव में फिट नहीं बैठती और साफ तौर पर उन्हें परेशान करती है, लेकिन यह एक बड़ी बहस है और शायद इसके लिए अलग लेख की ज़रूरत है.
(आमना बेगम अंसारी एक स्तंभकार और टीवी समाचार पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय आमना एंड खालिद’ नाम से एक साप्ताहिक यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)
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